सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

भैया मेरे वोटों की कीमत मत गिराना

फोटो-गूगल से साभार 


जमाने से एक गाना रक्षाबंधन के दिन सुनते आ रहे हैं। भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना। क़ुछ इसी तर्ज पर आजकल केजरीवाल के लिए एक गाना देश की  जनता गा रही है  , यूँ कहिये मजबूरी में गा रही है कि भैया केजरीवाल देश की दरिंदा राजनैतिक पार्टियों से तंग आकर तुम्हे जो वोट दिया उसका सत्यानाश मत करो । वैसे दिल्ली की जनता तो अपना वोट देकर पछता ही रही है. उम्मीद थी कि लीक से हटकर एक आम आदमी गद्दी पर आसीन हुआ है। ठन्डे दिमाग और अपनी सूझ-बुझ से अगर शासन कर लिया तो जनता के वारे-न्यारे हो जायेंगे।शुरुवात अच्छी रही, लेकिन कहते हैं कि सफलता आसानी से नहीं पचती ।आवेश में आपा खो गयी आप ने आम आदमी के हाथ में आयी सत्ता गवां दी. हस्तिनापुर की सत्ता ठीक से अभी सम्भली भी नहीं कि आप सेना के सैनिक पुरे हिंदुस्तान पर कब्जे की फ़िराक में लग गए. आप का कुनबा बिखरने लगा। बिखरा क्या दूसरी पार्टियों ने साजिश के तहत बिखरा दिया।।सड़क से आम आदमी पार्टी की शुरुआत हुयी थी आज सत्ता गवांकर एक बार फिर सड़क पर है केजरीवाल एंड पार्टी। दिल्ली में पुरानी कहावत सच हो गयी है कि न खेलूँगा न खेलने दूंगा।  कांग्रेस ने एक तरफ समर्थन देकर केजरीवाल की बोलती नाक दबाई तो दूसरी ओऱ सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली भाजपा को सत्ता से दूर भी रखा.। वह कुछ हद तक पहले और अब राष्ट्रपति शासन लगवा कर सफल रही लेकिन छीछालेदर हो गया आम आदमी के वोटों का जो अपने भले के लिए इन नेताओ को देकर पूरी तरह ठगा गया। एक बार फिर आम जनता की  समस्याएं  जस की तस हैं।चुनाव का इन्तेजार है जो फिर उसी के पैसों पर लड़े जायेंगे। परंपरागत पार्टियां भाजपा,कांग्रेस और सपा-बसपा - कम्युनिस्ट सभी को बहुत संतुष्टि मिल गयी है कि अच्छा हुआ केजरीवाल थक-हार गया.  ज़नता को भी लगने लगा है की राजनीति  शायद सामान्य लोगों का काम नहीं है। शायद सिसोदिया और सोमनाथ का भी नहीं।अन्ना हजारे भी मन ही मन खुश हैं कि अच्छा हुआ केजरीवाल हार गया. ऐसे ही बाबा रामदेव खुश हुए थे जब उनसे अलग होकर अन्ना अकेले रामलीला मैदान में उतर पड़े थे।लेकिन बिना लोकपाल अनशन से उठना पड़ा था। ख़ैर जीत हार होती रहती है। ।फ़िलहाल  मुख्यमंत्री बनकर निकले केजरीवाल अब आम आदमी भी नहीं रहे। उनकी पार्टी को पहले हर दिन २ लाख रूपये चंदा मिलते थे अब रोजाना २३ से २५ लाख मिल रहे है फिर आम आदमी उन्हें कहना देश के असली आम आदमी को गाली देना होगा। एक बार फिर कांग्रेस और भाजपा को गरिया कर अरबिंद बाबू देश का मसीहा बनने के लिए चिल्ला रहें हैं. अब जो भाजपा कांग्रेस को नहीं चाहते वो केजरीवाल को वोट देंगे इस फरियाद के साथ की भईया मेरे वोटो की कीमत मत गिराना वर्ना बेहतर है कि  कांग्रेस-बीजेपी-बीएसपी-सपा आदि धूर्त नेताओ वाली पार्टियों को ही वोट दे दें यानि  नेकी कर दरिया में डाल। नहीं वोट देने से तो बेहतर है किसी लूले- लंगड़े को ही वोट दे दिया जाये अपने लोकतंत्र के नाम पर, देश के नाम पर, आखिर अपना अधिकार जो है !




शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

गरीबों को चुनावी लालीपॉप बाँट रही सरकार

यूपीए सरकार के दिन जैसे जैसे लड़ते जा रहे हैं वैसे वैसे वह हर बार कि तरह गरीबों और मुसलामानों को लुभाने कि कोशिश करने लगी है। सड़क पर मजदूरों के लिए खुद का मकान ,ठेला खोमचा लगाने वालों को मकान और रोजगार के लिए लाखों का कर्ज, इंदिरा आवास योजना कि तर्ज पर राजीव आवास योजना कि घोसणा सहित और दर्जनो योजनाए। .वओ भी सब गरीबों के लिए। भाजपा कहती है कि यह सब य़ह सब चुनावी ललिपॉप है ,राहुल गांधी कहते है यह गरीबों का हक़ है जो यूपीए सरकार उन्हें देना चाहती है…सवल ये है कि ४ साल पहले दे देती तो क्या हो जाता। जरुरी तो नहीं कि जिस जनता कि इतनी चिंता करो भी और उसे ५ सालों  तक तड़पाओ भी.
फ़ोटो -गूगल से साभार 

ऐसी ही एक योजना का ३१ जनवरी को ऐरोली के पटनी ग्राउंड पर २० हजार लोगों कि मौजूदगी में केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने   उद्घाटन किया था ।भुखमरी मिटाने और अन्न के कानूनी अधिकार देने के मकसद से प्रारम्भ हुयी इस महत्वाकाँक्षी योजना से ४५ फीसदी शहरी और ७६ फीसदी ग्रामीण इलाकों को लाभ देने का एलान किया गया. कृषि मंत्री ने उम्मीद जतायी कि अब कोई भी गरीब अन्न के अभाव में भूखा नहीं रहेगा.लेकिन सरकार कि इस योजना में शुभारंभ के दिन ही घपला शुरू हो गया.राशन वालों ने १ आदमी पर ५ किलो अनाज कि बजाये केवल २-३ किलो दिया बाकी निगल गए.अब भी यही सिलसिला जारी है.न कोई देखने वाला है न कोई सुनने वाला। . अंधेर नगरी चौपट राजा, टेक शेर भाजी टेक सेर खाझा। सरकार ने सोचा होगा गरीबों के नाम पर फिर चुनाव कि बैतरणी पार होने का मौका मिलेग। लेकिन हो रहा है उल्टा। .... 
योजना में  ६०  हजार आय वाले  एक ब्यक्ति को प्रति माह ५ किलो अनाज जबकि अंत्योदय के तहत ४४ हजार से कम आय वालो को प्रति माह ३५ किलो अनाज मिलेगा।राशन दुकानो से मिलने वाले खाद्यान्न में १ रुपये किलो ज्वार-बाजरा, २ रुपये  किलो गेहूं और ३ रूपये किलो चावल देने का प्रावधान है अन्न सुरक्षा अभियान संस्था कहती है कि  इससे पौने ८ करोड़ राशन कार्ड धारकों को भले ही लाभ मिलेगा लेकिन १.७७ करोड़ ऐसे जरुरत मंद लोग इस  से वंचित रह जायेंगे जिनके पास राशन कार्ड ही नही है.मांग है कि अनाज के साथ दाल और तेल का भी वितरण होना चाहिए।

पैसों के लिए ही ये संसद चलती है;

फोटो-गूगल से साभार 
ना राजा -रंक  कोई,सब केवल पैसा है ,
कर लो भई जो चाहे,जब मुट्ठी में पैसा है. 
पैसों के लिए ही ये , संसद चलती है;
पैसों की खातिर ही सियासत रंग बदलती है।।

साहस औ लाचारी -अभिमान ये पैसा है।।१।।
भगवान ये पैसा है,ईमान ये पैसा है।।

पैसों के पीछे हैं,नेता -अफसर भागे।
हर कोई बस यारों ,पैसा-पैसा मांगे।
कपडे ,ताबूत-कफ़न मे, पैसों की जरुरत है,
पैसा ही पूजा है,अरदास-इबादत है।।

ईशा -अल्ला-अपना रहमान ये पैसा है।।२।।@
भगवान ये पैसा है,ईमान ये पैसा है।

हो जाते पूत-कपूत,जो नहीं कमाते है.
पैसों के खातिर ही,सब रिश्ते-नाते है,
जब जेब रहे खाली .बिन पैसे-बिन पाई। 
वैरी हो जाते- सब बीबी-बच्चे-भाई।।

माँ-बाप की चाहत में ,संतान ये पैसा है।।३।।@
भगवान ये पैसा है,ईमान ये पैसा है।

पैसों के पावों  पर, ये दुनिया चलती है.
कहते हैं पैसों से, तकदीर बदलती है;
पैसों की बदौलत ही सब रौशनाई है।
पैसों से ही बजती,आँगन में शहनाई है।।  ..

तंगी से कर दे घर, शमशान ये पैसा है।।५।।@ 
भगवान ये पैसा है-ईमान ये पैसा है।।

ईशा -अल्ला-अपना रहमान ये पैसा है।।
 भगवान ये पैसा है-ईमान ये पैसा है।
                        ---सुधीर शर्मा

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

लोग हमें ’’एलियंस’’ कहते हैं

माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली दो सगी बहनॉ की दास्तान 
"हमारे मां-बाप ने हमारे सपने के लिए सब कुछ त्याग दिया. हमारा यही कहना है कि अपनी लड़कियों को घर में बंद कर, पिंजरे में कैद करके नहीं रखिए, उन्हें उड़ने दीजिए."

ताशी और नुंगशी मलिक दुनिया की पहली जुड़वां बहने हैं जिन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी क्लिक करेंमाउंट एवरेस्ट की चढ़ाई की. ये कारनामा उन्होंने 19 मई 2013 को किया था.इस बारे में नुंगशी मलिक कहती हैं, "लोग वही काम करते हैं जो हो चुका है क्योंकि उन्हें लगता है कि उसी में सफलता है. लेकिन हमारा मक़सद है ज़िंदगी में जो अलग और मुख़्तलिफ़ हो, वो किया जाए. इसलिए लोग हमें ‘’एलियंस’’ भी कहते हैं."साल 2009 में स्कूली शिक्षा ख़त्म करने के बाद कुछ अलग और ‘एंडवेंचरस’ करने की ख़्वाहिश थी जिसकी वजह से मलिक बहनों ने पर्वतारोहण को चुना. इसका प्रशिक्षण लेने के बाद साल 2010 से मई 2013 के बीच भारत और विदेश की कुछ चोटियों पर चढ़ने के बाद किसी भी और पर्वतारोही की ही तरह ताशी और नुंगशी ने भी नज़रें टिका दीं एवरेस्ट पर.
जोखिम भरा काम

ताशी कहती हैं, "2010 में पहली बार पहाड़ की चोटी पर कदम रखना बहुत अलग अनुभव था. उसके बाद से ही मैं माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई का सपना देखने लगी. मुझे सोते वक्त, खाते वक्त, हर वक्त एवरेस्ट ही दिखाई देता था."

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

लोकतंत्र का खून मैंने नहीं किया




हाल में कांग्रेस के युवराज टीवी पर साक्षात्कार देते हुए एक ऐसा सच बोल गए जिसने समाज के एक पुराने जख्म को कुरेद दिया। पले-पुसे, नपे-तुले राजनेता के लिए तो यह दुर्घटना ही है। परंतु राजनीति की रपटीली राहों पर ऐसा होता है। कभी जानबूझकर, तो कभी अनजाने में। यह सब सोचा-समझा था या 500 करोड़ की पॉलिश की पहली चमक, हम इस बहस में नहीं पड़ते।

'84 का जिक्र पूरे समाज में सिहरन पैदा करता है। समाज की सोती टीस उभारना वैसे भी कम बड़ा अपराध नहीं, परंतु यदि इसके पीछे आगामी संसदीय सत्र में साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा(निरोधक) विधेयक को आगे ठेलने की किंचित भी मंशा है तो यह अपराध अक्षम्य हो जाता है।
पन्ने पलटिए, सिख दंगा साम्प्रदायिक हिंसा नहीं, राजनैतिक दल द्वारा भड़काई वह आग थी जिसमें एक व्यक्ति की मौत पूरे समाज के मातम में बदल गई। तब के उन्मादी हुल्लड़बाज अगर आज भी ठसक के साथ कलफ लगे कुर्ते की बाहें चढ़ाते दिखते हैं तो इसकी जिम्मेदार न्यायपालिका नहीं कुनबापरस्ती को सलाम बजाते कांग्रेसी राज की वह मानसिकता है जिसने पीडि़तों को झिंझोड़ा और दोषियों को नहीं छेड़ा।
लोकतंत्र को घुन की तरह खाते, लोगों को बांटते- काटते इस वंशवाद ने समाज को कितने गहरे घाव दिए, लोक और तंत्र दोनों को खोखला करती अराजकता को किस तरह हर मौके पर पोसा, आज यह जांचने का वक्त है।
व्यक्ति का कुशलक्षेम राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता है, यह सर्वमान्य है किसे इस बात से विरोध होगा। किंतु इसी बिन्दु की आड़ में मनमानी का बिगुल फूंकना, लोकतंत्र को पार्टी या वंश समर्थक भीड़ का बंधक बना छोड़ना क्या राष्ट्र के विरुद्ध अपराध नहीं? अब अपराधी संगठित हो रहे हैं। गिरोहबंदी इस देश और समाज की ताकत के खिलाफ है। जिस देश विरोधी सुर की गूंज कल सलाहकार परिषद् तक थी आज उसी अराजकता का विस्तार राजपथ पर लोटते लोकतंत्र के रूप में हमने देखा है।
दूसरा अध्याय था राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् का आवरण ओढ़ संवैधानिक जिम्मेदारियों से परे, देश की चुनी हुई सरकार पर संदिग्ध और लांछित पृष्ठभूमि के लोगों द्वारा हुक्म चलाना।
तीसरा अध्याय है राष्ट्रविरोधी परोक्ष धाराओं का प्रत्यक्ष मिलन और देश की छाती पर चढ़कर अराजकता का खुला ऐलान।
आपातकाल में इंदिरा, '84 में राजीव और यूपीए कार्यकाल में सोनिया गांधी जो काम बंद कमरों में कर रही थीं अरविंद केजरीवाल और सोमनाथ भारती वही अराजक आलाप आज सड़कों पर कर रहे हैं। ऐसे में पुख्ता तौर पर कोई कैसे कह सकता है कि भविष्य को लेकर कुनबे  और ह्यक्रांतिह्ण के तार नहीं जुड़े हैं। प्रधानमंत्री के किसी अध्यादेश पर बौखलाने वाले युवराज एक अराजक मुख्यमंत्री को सबक सिखाने सड़क पर नहीं उतरते बल्कि उससे कुछ सीखने को आतुर दिखते हैं तो यह अकारण नहीं है। साक्षात्कार में आम आदमी सी भोली मुद्रा भी और दंगे का जिक्र भी अकारण नहीं है।
जिन हाथों ने '84 में सिखों को निशाना बनाया आज वही 'साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा(निरोधक) विधेयक' लहराने और हिन्दू सहिष्णुता पर कुल्हाड़ी चलाने के लिए बढ़े हैं। दुस्साहस और सादगी का यह छलावा कितना घातक है, हमें समझना होगा।
भला दिखता कोई चेहरा बुदबुदाता है, 'पेड़ गिरता है जमीन हिलती ही है', लोग माफ कर देते हैं।
'आम' दिखता कोई आदमी अदालतों को ललकारता है, पुलिसकर्मियों में बगावत के बीज बोता है, लोग फिर माफ कर देते हैं।
टी.वी.स्क्रीन पर पसीना पोंछता कोई मासूम चेहरा अपना दामन बचाते हुए कहता है कि दाग दूसरों ने दिए हैं...भला लोग कब तक माफ करेंगे।
समाज को लहूलुहान करने वाले चेहरे भोले हैं मगर इन हाथों में बर्छियां हैं। जिन्हें हम माफ करते रहे, उन्होंने देश और लोकतंत्र को साफ करने की ठानी है।
भय और अराजकता की ओर धकेलती इन सियासी गिरोहबंदियों के खिलाफ लड़ाई सिर्फ इसलिए मद्धम नहीं पड़नी चाहिए क्योंकि हमलावरों के चेहरे बड़े भोले हैं।

--पांचजन्य से साभार 

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

सरकार ने दिया भोजन का अधिकार

गरीबों को १ रूपये में मिलेगा अनाज

शुक्रवार १ फरवरी से महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा योजना लागू हो गयी है। ३१ जनवरी को ऐरोली के पटनी ग्राउंड पर शुक्रवार दोपहर २० हजार लोगों कि मौजूदगी में केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने इसका  उद्घाटन किया।भुखमरी मिटाने और अन्न के कानूनी अधिकार देने के मकसद से प्रारम्भ हुयी इस महत्वाकाँक्षी योजना से ४५ फीसदी शहरी और ७६ फीसदी ग्रामीण इलाकों को लाभ मिलने वाला है. 
 कृषि मंत्री ने उम्मीद जतायी कि अब कोई भी गरीब अन्न के अभाव में भूखा नहीं रहेगा.फिलहाल ६०  हजार तक  आय वाले  एक ब्यक्ति को प्रति माह ५ किलो अनाज जबकि अंत्योदय के तहत ४४ हजार से कम आय वालो को प्रति माह ३५ किलो अनाज मिलेगा।राशन दुकानो से मिलने वाले खाद्यान्न में १ रुपये किलो ज्वार-बाजरा, २ रुपये  किलो गेहूं और ३ रूपये किलो चावल देने का प्रावधान है. कृषि मंत्री ने बताया कि चावल में प्रति किलो २३ रूपये जबकि गेहूं में १८ रूपये कि रियायत दी जा रही है जिससे राज्य  सरकार को १४०० करोड़ की सब्सिडी का बोझ वहन करना पड़ेगा। सीएम पृथ्वी राज चव्हाण ने कहा कि हमारी सरकार लोक हितकारी है इसलिए गरीबों के लिए नुकसान के बावजूद ऐसे अभियान चलाती रहेगी।फिलहाल खाद्य गारंटी योजना को पारदर्शी तरीके से लागू करने कि जरुरत है। इसकी नुक्ता चीनी करते हुए अन्न सुरक्षा अभियान संस्था ने कहा कि इससे पौने ८ करोड़ राशन कार्ड धारकों को भले ही लाभ मिलेगा लेकिन १.७७ करोड़ ऐसे जरुरत मंद लोग इस  से वंचित रह जायेंगे जिनके पास राशन कार्ड ही नही है.संस्था ने अनाज के साथ दाल और तेल का भी वितरण करने की मांग की है. 
 अन्न उत्पादन पर किसानों की सराहना
 पवार ने कहा कि पहले हमें अपने देश की जरूरतों के लिए बाहर से अनाज आयात करना पड़ता था,  लेकिन किसानों कि मेहनत , उन्नत बीज और आधुनिक कृषि तकनीकों की वजह से इतना अन्न उत्पादन हो रहा है कि हर साल लाखों टन खाद्यान्न विदेशों में निर्यात किया जा रहा है. इस खाद्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत देश के ८२ करोड़ लोगो को जबकि महाराष्ट्र में ७.९० करोड़ गरीबों को सस्ता अनाज मिलेगा।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

संविधान नहीं मानता महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता

सरकार ने कहा-नहीं देंगे उपाधि 


सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में मंत्रालय ने कहा कि इसका कारण यह है कि देश का संविधान शैक्षिक और सैन्य उपाधि के अलावा कोई और उपाधि देने की इजाजत नहीं देता. लखनऊ की दस साल की बच्ची ऐश्वर्या पराशर ने कहा कि वे अपील करेंगी कि सरकार संविधान में संशोधन करें ताकि महात्मा गांधी को यह उपाधि दी जा सके.छठी कक्षा में पढ़ने वाली ऐश्ववर्या के पिता संजय शर्मा ने बताया कि उनकी बेटी सात साल की उम्र से आरटीआई के तहत जानकारी लेती आई हैं.

'राष्ट्रपिता' क्यों?

ऐश्वर्या ने यह पूछा था कि गांधीजी को 'राष्ट्रपिता' क्यों कहा जाता है और क्या उन्हें यह उपाधि दी गई है.इसके जवाब में उसे बताया गया कि गांधीजी को ऐसी कोई उपाधि नहीं दी गई है.इसके बाद उसने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने के लिए अधिसूचना जारी करने के लिए कहा.ऐश्वर्या की यह अर्जी गृह मंत्रालय को भेजी गई और पूछा गया कि उसके आवेदन पर क्या कार्यवाही की गई है.गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' का खिताब न दिए जाने के लिए संवैधानिक मजबूरियों का हवाला दिया.मंत्रालय का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 8(1) शैक्षिक और सैन्य खिताब के अलावा सरकार को कोई और उपाधि देने की इजाजत नहीं देता।

बुधवार, 29 जनवरी 2014

मरते हुए देश को बचाओ साथियों

खारा  कहीं गंगा का किनारा हो न जाए.
बुझा हुआ शोला फिर अंगारा न हो जाए
नष्ट भ्रष्ट भाग्य फिर हमारा हो न जाए
टुकड़े-टुकड़े देश फिर दुबारा हो न जाए। .
सो रहे शहीदों को जगाओ साथियों। .
मरते हुए देश को बचाओ साथियों। .

यह देश किसी एक कि जागीर नहीं है.
किसी एक कड़ी कि जंजीर नहीं है
किसी परिवार कि तस्बीर नहीं है
किसी एक बेटे कि तकदीर नहीं है।
 द्वार-द्वार अलख ये जगाओ साथियों
मरते हुए देश को बचाओ  साथियों।।
-----गोपाल दास नीरज

हिरनी संभल कर रहो यहां शिकारी बहुत हैं

मुंबई। एनसीपी नेता और महाराष्ट्र महिला आयोग की सदस्य आशा मिरगे ने महिलाओं को बलात्कार के लिए जिम्मेदार बताकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आशा मिरगे ने महिलाओं के साथ लगातार हो रहे यौन शोषण के लिए उनके पहनावे को जिम्मेदार ठहराया है। आशा मिर्जे महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस की सहयोगी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की नेता भी हैं। मिर्जे ने नागपुर में हुई पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं की बैठक में कहा कि महिलाओं का रहन-सहन और पहनावा बलात्कार की घटनाओं को बढ़ावा देता है। मिरगे यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने कहा कि रेप महिला के कपड़े, चाल चलन और गलत जगह पर रहने से होते हैं। उन्होंने कहा कि 20-25 फीसदी युवतियां सजगता के आभाव में दुष्कर्म का शिकार बनती हैं।

निर्भया और फोटो पत्रकार ही दोषी! 
कोर्ट ने जहाँ बलात्कारियों को दोषी मानते हुए कारवाई का आदेश दिया है वहीँ जराज्य महिला आयोग कि अध्यक्षा खुद लड़कियों को दोषी मन रही हैं. दिल्ली के निर्भया गैंग रेप मामले में पीड़िता को ही दोषी ठहराते हुए मिरगे ने कहा कि रात को वो दोस्त के साथ फिल्म देखने क्यों गई थी? यही नहीं मिर्जे ने मुंबई के शक्ति मिल्स परिसर में महिला फोटो पत्रकार के मामले में कहा कि महिला को सुनसान जगह जाने की क्या जरूरत थी।
मिरगे ने एनसीपी की महिला इकाई के सम्मेलन में कहा कि मैं आपको एक कविता सुनाती हूं, सावन में हिरणी संभलकर रहो नहीं तो कोई शिकारी शिकार कर लेगा। इसके बाद उन्होंने कहा, हिरणी ही क्यों कहा? हिरण क्यों नहीं?.. क्योंकि हिरणी को ही संभलकर जीने की जरूरत है। पर हम संभलकर जीते हैं क्या? ..संभलकर रहना चाहिए। इस उम्र में भी मैं मिर्ची के पैकेट साथ रखती हूं। संभलकर ही जीना चाहिए।
आशा के बयान के बारे में जब एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक से पूछा गया तो, उन्होंने इससे पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कहा, न तो मैंने आशा के बयान को सुना है और न ही मुझे इसके बारे में कोई जानकारी है। यदि उन्होंने ऐसा कुछ कहा है, तो यह उनकी व्यक्तिगत राय है।
 राष्ट्रीय महिला आयोग ने मिरगे के इस बयान को शर्मनाक बताया और नोटिस जारी कर 7 दिनों के भीतर जवाब मांगा है

सोमवार, 27 जनवरी 2014

लता के साथ १ लाख ४२००९ ने गाया-जरा याद करो कुर्बानी

मुंबई 1962 में चीन से युद्ध में शहीद हुए भारतीय जवानों की याद में 1963 में गाए गए गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों...' का स्वर्ण जयंती समारोह मुंबई में मनाया गया। इस गाने को गाने वाली मशहूर गायिका लता मंगेशकर को बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी ने सम्मानित किया। समारोह में परमवीर चक्र, महावीर चक्र और अन्य वीरता पुरस्कार प्राप्त 100 से अधिक लोगों को भी सम्मानित किया गया। इस मौके पर बीजेपी के पीएम कैंडिडेड नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर कवि प्रदीप ने यह गीत नहीं लिखा होता तो शायद 1962 के शहीद हमें याद न होते। लता ने 27 जनवरी 1963 को पहली बार यह गीत गाया था। लता के साथ वहां मौजूद 1,42,009
 लोगों ने सुर मिलाए। लता ने कहा कि नरेंद्र मोदी मेरे भाई हैं। उनसे सम्मान पाकर मैं खुश हूं। उन्होंने बताया कि जब पहली बार मैंने यह गीत गाया था तो पंडित नेहरू बहुत खुश हुए थे। इंदिरा गांधी ने अपने दोनों बच्चों से मुझे मिलवाया था। अब तक देश के बाहर 101 शो में मैं यह गाना गा चुकी हूं।

ये है 34 लाख का फोन नंबर, क्या आपने इसे डायल किया?

नई दिल्ली। देश के बड़े शहरों में कॉल ऑन कैब का प्रचलन काफी तेजी से बढ़ गया है। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन या घर से बाहर निकलते समय लोग इन कैब ऑपरेटर्स को कॉल कर गाड़ी बुलाते हैं। लोगों के लिए यह एक बड़ी सुविधा है। बस एक नंबर डायल करो और आपके पास कैब पहुंच जाती है। इतना ही नहीं कैब सर्विसेज 24 घंटे आपकी सर्विस में हाजिर रहती हैं। ऐसे में लोगों को कंपनी याद नहीं रहती। उनको याद रहता है तो नंबर। इन नंबरों को खरीदने के लिए लोग लाखों रुपये खर्च करने के लिए भी तैयार हैं। अब जिस प्रकार से शहरों में कैब सर्विस का बोलबाला बढ़ा है, ठीक उसी प्रकार इन ऑपरेटर्स के बीच प्रतिस्पर्धा भी खूब बढ़ी है। इस समय शहर में न जाने कितनी कैब सर्विसेज मौजूद हैं। यदि दो-चार को छोड़ दें तो बाकी सभी का नाम याद रख पाना मुश्किल हैं। कैब ऑपरेटिंग बिजनेस एक बात की जबर्दस्त होड़ मची हुई है वो है संपर्क के लिए टेलिफोन नंबर्स की। .आखिर इनके पास कैसे पहुंचता है आपका मोबाइल नंबर? जी हां, यदि आप बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई या फिर ऐसे ही बड़े महानगरों में रहते हैं तो आपको सड़क पर फर्राटा भरती कुछ ऐसी जरूर दिख जाती होंगी जिन पर बड़े-बड़े शब्दों में मोबाइल या फिर टेलीफोन नंबर लिखे होते हैं। इन नंबरों की खासियत ये होती है कि ये नंबर आपको यदि 1 से 2 बार दिख जाएं तो आपको हमेशा याद रहेंगे। इसका मुख्य कारण इनका यूनिक और फैंसी होना है। फिर चाहे आपको कैब सर्विस का नाम याद आये या फिर ना आये लेकिन आपको वह नंबर जरूर याद रहेगा। इसी होड़ में बीते दिनों चेन्नई में कुछ अजीबो-गरीब वाकया हुआ। चेन्नई के बीएसएनएल ऑफिस ने फैंसी पीएनटी नंबर्स के लिए नीलामी का कार्यक्रम आयोजित किया। जिसमें एक फैंसी और यूनिक नंबर '20002000' को भी शामिल किया गया। इस नंबर को पाने के लिए लगभग 16 लोगों ने बढ़-चढ़ कर बोली लगाई। जिसमें चेन्नई के ही एक कैब ऑपरेटर रवि ट्रैवेल्स ने पूरे 33.93 लाख रुपये की सबसे ज्यादा बोली लगाकर इस नंबर को हासिल कर लिया।