शनिवार, 30 दिसंबर 2017

सुधीर शर्मा की कहानी-नयी राहें

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किचन में स्टोव फरफराए जा रहा था और उसकी लौ पर खिचड़ी पक रही थी. मानो आज वक्त कुछ ज्यादा ही लग रहा था. अंजू को कूकर की तीसरी सीटी का इंतजार था. नजर नॉब पर टिकी थी, लेकिन कान बरामदे में बड़बड़ा रही सास पद्मा की ओर थे. स्टोव की फरफराहट के बीच भी पद्मा की शिकायती आवाज साफ सुनाई दे रही थी. वह दिन चढ़े सोएगी तो देर नहीं होगी. खुद का खयाल तक नहीं रखती फिर पति का खयाल कैसे रखेगी. ससुर रंगनाथ होठों पर उंगली लगा चुप रहने का इशारा करते रहे लेकिन पद्मा बुदबुदाती रही. हालांकि अंजू खीझ संभालते हुए खामोश तो रह गयी लेकिन उसके दिलोदिमाग में दर्द भरता चला गया. उसे क्या पता था कि देर से जगने पर इतनी हाय-तौबा मच जाएगी. उसका मन अंदर ही खुद से भिड़ गया था. न जाने आंख क्यों न खुली. वह खुद से बतियाए जा रही थी. अनपढ़ क्या जानेंगे कार्पोरेट की नौकरी क्या होती है. हजारों की पगार के लिए 8 घंटों तक बॉस की बकबक सुननी पड़ती है. कमाएंगें तब न जानेंगे. एक तो घर का काम काज उपर से दुनिया भर की तिमारदारी. आज आफिस लेट पहुंचने पर बॉस ने भी खूब सुनाया था. वह कुछ आर्गूमेंट भी नहीं कर सकी थी. बस सब कुछ सुनते रह गई थी. उसका मन वेदना से सराबोर हो गया था. आज मायके में होती तो सब कुछ छोडक़र चल देती. साफ बोल देती- इतना काम उससे नहीं होगा.
घर और आफिस की किचकिच नस्तर बनकर उसके दिमाग में चुभ रहे थे. वह अपना दुखड़ा शेयर करना चाहती थी, लेकिन कहे किससे. पति का मूड अक्सर बेगाना ही दिखता. अंबरीश के घर में बहू बनकर आए डेढ़ साल हो गए, लेकिन उसे नहीं पता कि आखिरी बार वह खुलकर कब  हंसी थी. बेटी को विदा करते हुए उसकी मां मंजू ने हाथ जोडक़र कहा था कि घर की इज्जत हाथ सौंप रही हूं, ख्याल रखना. लेकिन यहां तो कोई दर्द सुनने वाला भी नहीं दिखता था. ससुराल आकर मानो वह और भी अकेली हो गई हो थी. भयभीत मन लिए उसने दरवाजे पर दस्तक दिया तो छोटी ननद ने अनमने से डोर खोला और किनारे हो गई. घर में घुसते ही सास ससूर सबके चेहरे पर अनमनापन था, मानो वह कोई अजनबी घर में आ पहुंचा हो.
वह  न चाहकर भी मुस्कराते-देखते अंदर चली गई. पद्मा ने अंबरीश से पूछ ही लिया. बहू अकेली देर रात तक नौकरी करेगी तो लोग क्या कहेंगे.अंबरीश सुनता रहा, लेकिन अंजू को लगा कि बरामदे में जाकर अभी कह दे कि लोग तो बाद में कहेंगे-पहले अपनी जुबान पर तो ताला लगाओ.वह मन में ही फरियाद कर रही थी,तभी रंगनाथ बोल पड़े. अंबरीश, बहू अब नौकरी नहीं करेगी. ससुर की तल्ख आवाज मानो उसके कानों में गरम शीशा उड़ेल गई हो. उसका मन चीख-चीखकर रोने को हुआ. आवाज तो रोक ली,लेकिन उसके आंसू धार बनकर बह निकले.रात में भी वह निबाला नहीं खा सकी.ननद की जिरह के बाद भी वह खाट पर खामोश पड़ी रही बेजान-बेजुबान.
उसे मायके की याद आने लगी थी. मम्मी का प्यार उसके अंतर्मन में हिलोरे लेने लगे.नैनो में अश्रुजल उभरे जरुर, लेकिन वह पलकों में ही पी गयी.मायके में जरा सा सिर क्या चकराने लगता, मम्मी दौडक़र गोद में भर लेती. मेरा लाला तुम्हें क्या हुआ है. मेरे बच्चे और न जाने क्या-क्या.. दवा के साथ ढेर सारा प्यारा और लाखों दुआएं.मन में कई बार सवाल उठता बीमारी सिर्फ कहने से भला खत्म होती है क्या, लेकिन मम्मी की प्यार भरी सांत्वना में गजब की ताकत थी. पापा कहते हर मां के हाथ में जादू होता है. मां सहला कर बच्चों की पीड़ा हर लेती है. वो दिन..भी क्या थे..
पिता ब्रह्मानंद इलेक्ट्रिक कंपनी में इंजीनियर थे. कई सालों तक मंजू मां नहीं बन सकी तो दोनों कई मठों-मंदिरों के चक्कर काटे. कई जगह आशीष मांगे तब अंजू के रूप में पहली संतान मिली. मंजू की गोद भरी तो मन-आंगन में खुशियों के अंबार लग गए. कईयों ने बेटी पैदा होने पर तंज कसा.ब्रह्मानंद दहेज के लिए पैसे जुटाना शुरू कर दो.वे कहते बेटियां तो लक्ष्मी का रूप होती हैं, जिनके घर पैदा होती हैं वहां भी और जिनके घर जाती हैं वहां भी खुशहाली से भर देती हैं.मंजू को पति की बात पर गर्व होता. गांव में कई ऐसे परिवार थे जहां बेटी पैदा होने पर किचकिच रोज की बात थी. दिन, महीने साल गुजरे.बच्चे अब बड़े होने लगे थे.
मंजू पर पहाड़ तब टूटा जब ब्रह्मानंद एक दुर्घटना में सबको पीछे छोड़ गए.पत्नी के सामने अकेलापन था और मासूम बच्चों के सामने पूरी जिन्दगी.कई महीनों तक मंजू बांवरी बनी रही.उसने तो सोचा भी नहीं था कि बंद इंजन में तकनीक की जान भरने वाला इंजीनियर इस तरह अचानक खुद बेजान हो जाएगा.एक बेवा के सहारे दो बेटियां थी एक अनबूझ बेटा.पिता के बाद अंजू ने ही घर को संबल दिया.
जिन्दगी जीने के लिए नौकरी चाहिए थी और उसके लिए पढ़ाई जरुरी थी. अंजू सुबह खुद क्लास जाती और शाम को छोटे बच्चों को ट्यशन पढ़ाती मम्मी कहती ये सब बंद क्यों नहीं कर देती. उसका जवाब होता मै तो तुम्हारी चाय के लिए खर्च जुटाती हूं. हालांकि सब जानते थे कि अंजू की मेहनत से ही घर रेंगता है.दिन- महीने-बरस यूं ही तंगी और बाप की यादों के साए में गुजरते चले गए. अंजू ने जब नौकरी करने का निर्णय लिया तो तब भी मंजू ने समझाया. लोग क्या कहेंगे जवान बेटी से नौकरी कराती है. खुद बैठकर रोटी तोड़ती है.लेकिन यहां भी अंजू का हौसला जीता. वह कार्पोरेट कंपनी में पब्लिक कोआर्डिनेटर बन गई. मंजू सोचती अगर इंजीनियर साब होते तो कितने खुश होते, लेकिन तकदीर को भला कौन  पढ़ पाया है. इसी तकदीर का ही तो खेल है कि जवान बेटी अब तक कुंवारी बैठी थी. मंजू के आंखों में चिंता के बादल छा गए.
रिश्तेदारों ने शादी की बात निकाली. आखिर बेटी है कब तलक घर में बिठाओगी..लेकिन दहेज की मांग सुनकर मंजु की रुह कांप जाती. बेटी के सगाई के लिए कईयों के सामने हाथ जोड़े. सबने यही कहा-वो जमाना चला गया जब बेटियां बिन दहेज बिदा हो पाएं..उसके मन में सवाल उभरते .फिर गरीब-बेसहारों की बेटियां आखिर कहां जाएंगी. क्या उनकी तकदीर में कुंवारी रहना ही लिखा है..सोचना मजबूरी भी थी और नियति भी.
            कई महीने बाद पहाड़ी वाले बाबा आए तो जाते जाते एक रिश्ता बता गए. घर में तीन बहनों पर एक लडक़ा था..जिन्दा मां-बाप और खुद का कारोबार .टेक्निीशियन बेटे के लिए पढ़ी-लिखी बहू की दरकार थी. जो चार लोगों के परिवार को संभाल सके. बात आगे बढ़ी तो अंजू के लिए रिश्ते की तलाश यहीं पर खत्म हो गयी. सच कहते हैं कि जोडिय़ां तो उपर वाला आसमान में बनाता है यहां जमीन पर तो लोग केवल रिश्ते जोड़ते हैं. धूम धड़ाके के साथ अंजू ससुराल चली गयी.. वहां जहां उसे नए लोगों को अपना परिवार बनाना था. जहां वह बहू थी एक घर की.                             
                     अब जन्म देने वाली मां की जगह सासू मां थी पद्मा. अंबरीश पद्मा का इकलौता बेटा था.इसलिए नयी बहू से सास के अरमान भी ढेर सारे थे. पद्मा अक्सर कहती- बहू जरा बड़ों के सामने संभल कर पांव डाला करो..लेकिन शहर में पली बढ़ी अंजू के लिए ऐसी बातें से खीझ होती. लड़कियां अंतरिक्ष में पहुंच गयीं और यहां घर में भी पांव संभाल कर रखना है..सास साड़ी पहनकर काम करने की जिद करती, अंजू नाइटी एवं गाऊन में कम्फर्ट महसूस करती. हर रोज ऑफिस से घर पहुंचने के बीच इस तरह के न जाने कितने ही खयाल अंजू के जेहन में तैरते रहते.आज सासूमां कुछ बोल न दे. वह हर बार कोशिश में यही रहती कि कोई शिकायत न हो. लेकिन होता कुछ और ही था. यह सिलसिला थमा नहीं बल्कि रिश्तों में नयी दरार बनाता हुआ हद से पार होता गया. वह भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस करती रही..अंजू को आज लग रहा था मानो उसके रास्ते ससुराल वालों से अलग हैं, शायद सोच और जीने का तरीका भी..वह उस रास्ते पर चलना और जीना चाहती थी जिसमें तंग सोच न हो, नयी चीजों की जगह हो. उसका सम्मान हो. ..आखिर सुख और सहूलियत से जीने का हक तो सबका है. लेकिन अंबरीश का परिवार कुछ बंधुआ संस्कारों में जीने का आदी था. ससूर रंगनाथ भी पद्मा के की हां में हां के कायल थे.शायद सब एक ही रास्ते के मुसाफिर..या फिर एक जैसे..           
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 शादी में मिले डायनिंग टेबल और कुर्सी को रंगनाथ कहते ये सब अमीरों के ठाट-बाट हैं..उन्हें फर्श पर बैठकर खाने में सुकून मिलता . उनकी अपनी दलील भी होती. बीस पचास हजार कमाने वालों के घर फ्रिज और वाशिंग मशीन चलेगा तो बचेगा क्या...-हाथ से कपड़े धोएंगे तो कौन से बाजू कट जाएंगे. अंजू कहती जब घर में सुविधाएं हैं तो उसका उपयोग करने में हर्ज क्या है. पद्मा चिल्ला उठती-चार दिन की बहूरिया होकर बड़ों से जुबान लड़ाती है .अंबरीश खामोश होकर सब कुछ सुनता रहता..अंजू को याद है कि तीन महीने पहले ननद के खिलाफ एक छोटी सी शिकायत क्या कर दी,  अंबरीश ने उसे ही कटघरे में खड़ा कर दिया था. तुम हमारे परिवार में कलह मचाना चाहती हो..मेरी बहन पर इल्जाम मत लगाया करो.. और भी न जाने क्या ..अबंरीश यह सुनने को भी तैयार नहीं हुआ कि आखिर उसके  बहन की गलती क्या थी.                     
             अंबरीश के घर वालों की प्रॉब्लम अंजू की नौकरी थी जिसे वह छोडऩा नहीं चाहती थी लेकिन पद्मा उसे गलत संगत का नतीजा करार देती. औरतें कमाती हैं तो मर्द की इज्जत नहीं रहती..बीबी के लिए मां का तंज अंबरीश को अंदर तक चीर जाता लेकिन वह बोल कुछ भी नहीं पाता. मां से नाराजगी का गुस्सा अक्सर वह बीबी पर निकाल देता.बात हद से गुजरी तो अंजू ने ससुराल छोड़ने का फैसला कर लिया.
             अंजू बेसुध मायके पहुंची तो मां मंजू का कलेजा कांप गया. मुश्किल मालूम हुई तो आंसू थमने से रहे. जिस घर में बेटी को सुख भोगने विदा किया उस घर से वह दुखी होकर लौट आए तो बेवा मां के पास रोने के सिवा और होगा भी क्या. वह सवाल पूछना चाहती थी कि आखिर उसकी बेटी का कसूर क्या है ..वह रोते  हुए जिद करने लगी..मेरे साथ चलो देखें तो सही कौन सा गुनाह कर दिया बेटी ने..लेकिन अंजू ने यह कहकर मां का और दिल बैठा दिया कि अब वह उस घर में लौटना नहीं चाहती. ब्याहता बेटी के भटकाव भरे इन शब्दों से मंजू अंदर तक थर्रा गयी थी. वह समझाना चाहती थी कि बेटी - इतनी जल्दी जिन्दगी का फैसला नहीं करते..सुख दुख-प्यार तकरार तो जीवन  का हिस्सा हैं. पति के साथ रहने में ही शादीशुदा औरत का सम्मान होता है. लेकिन बेटी की हालत देखकर वह चाहकर भी तत्काल कोई फैसले पर नहीं पहुंच सकी.
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मायके में महीने भर गुजर गए लेकिन ससुराल से कोई खोज खबर लेने तक नहीं आया. इस हालत से मां मंजू व्याकुल थी कि कहीं अंबरीश ने हमेशा के लिए छोड़ दिया तो बेटी का क्या होगा. वह इश्वर से प्रार्थना करती कि वही कुछ रास्ता निकाल दे. वहां ससुराल में भी कम तकलीफें नहीं थी. बिना बताए बहू के घर छोड़ देने से ससूर रंगनाथ की खूब किरकीरी हुई. रिश्तेदारों में अंजू का घर छोड़ना बदनामी का बड़ा कारण बन गया. लोग पद्मा को भी ताने मारते. एक बहू को नहीं संभाल पायी..दो चार होतीं तो क्या होता.  अकेले रोटी तोड़ने की आदत है..तो भला बहू कैसे खपेगी. अनपढ़ पद्मा पर पढ़ी-लिखी और पैसे कमाने वाली बहू नहीं संभाल पाने का भी आरोप लगता. इसे तो गांव की देहाती गुलाम चाहिए थी. अंबरीश के चाल -चलन पर भी उंगलियां उठी. आदत बूरी होगी..वर्ना चार दिन की आयी बहू  घर और पति को छोडक़र थोड़े ही जाती. सवाल अंजू पर भी उठे. रंगनाथ को गहरा झटका तब लगा, जब बेटी के लिए रिश्ते ढूंढते समय परिवार के रहन सहन पर सवाल खड़े हो गए..सवाल सामाजिक प्रतिष्ठा का भी था ..चारो ओर से घिरे रंगनाथ ने पत्नी पद्मा को खूब खरी खोटी सुनाई. कुल पुरोहित ने भी समझाया-घर की इकलौती बहू को यूं मायके नहीं छोड़ते.रंगनाथ बहू को बेटी बनाकर रखना सीखो, वर्ना तु्म्हारी बेटी भी कल बहू बनकर जाएगी. सोचो यही हाल तुम्हारी बेटी के साथ भी ऐसा हो तो क्या होगा.कुलपुरोहित ने खुशहाल जीवन का मंत्र दिया. बहू को बेटी समझकर वापस बुलाओ, सारी टेंशन मिट जाएगी. अंजू के मायके जाने के बाद बेचैन बेटे की हालत का खयाल आया तो रंगनाथ की आत्मा व्याकुल हो उठी. उन्होंने सोंचा बहू नहीं आयी और मामला कानूनी दाव-पेंच में फंसा तो घर तबाह हो जाएगा. फैसला हुआ बहू को वापस बुलाने में ही भलाई है. वर्ना बेटियों की शादी में रोड़ा न फंस जाए.
           आज चार महीने बाद जब अंबरीश ससुराल पहुंचा तो पति को अरसे बाद सामने देखकर अंजू की आंखे डबडबा गयीं. वह दर्द का गुबार पीते  हुए उसके नैन बेदम होकर बह निकले. उसके मन में आया कि अंबरीश को पकडक़र पूछे कि आखिर उसने अपनी ब्याहता को लावारिस क्यों छोड़ दिया था..लेकिन पति को एक नजर देखने के बाद उसकी सारी हिम्मत हार गयी. गम का दबाव कम हुआ तो मंजू ने बेटी को सजा-सवांर कर बिदा किया. अंजू बिदा हुई तो इस बार उसके साथ अनुभवों के कई सिखावन और साथ गए..अंबरीश ने पत्नी की अवहेलना पर शर्मिंदगी जताई और गलतियां नहीं दुहराने का वादा किया. मंजू ने हाथ बढ़ाकर बेटी दामाद को गोद में भर लिया. आशीष के साथ गाड़ी गुबार छोड़ते हुए नयी उम्मीद और आशाओं के रास्ते पर रवाना हो गयी...अंजू और अंबरीश के लिए जिन्दगी का नया सफर शुरू हो गया था..

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

भतीजे संग बोली UP की बुआ -हमें 'यूपीकोका' नहीं चाहिए


उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जैसे ही विधानसभा में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) की तर्ज पर माफिया और संगठित अपराध से निपटने के कड़े प्रावधान वाला विधेयक यूपीकोका पेश किया जानी दुश्मन बने भतीजे और बुआ का सुर एक हो गया. बहती गंगा में कांग्रेस ने भी हाथ धो लिया. सबने जोर की आवाज लगाई..हमें गुंडे बदमास चाहिए..यूपीकोका नहीं. गजब के हैं सन्यासी मुख्यमंत्री योगी जी उन्हें नहीं पता जिसे जनता का खून पसंद है उन्हें कोका या यूपीकोका कहां भाएगा..लेकिन ये ठहरे सन्यासी..सबकुछ छटपट सुधारने के पीछे पड़े हैं. वे नहीं जानते कि यूपी की जनता जो गुंडों मवालियों और अपहरणकर्ताओं माफियाओं के प्रभाव में जीने की आदी हो गयी है वह इतनी जल्दी भला आपका बदलाव कहां हजम कर पाएगी.  यकीन नहीं हो रहा..तो .एन्टी रोमियो..का हश्र देख लीजिए..नादान थे योगी चले थे दूसरों की बहन बेटियों को सुरक्षित करने हालत ऐसी हो गयी कि मीडिया ने ऐसा घेरा कि उनकी खुद की कुर्सी सुरक्षित रखनी भारी पड़ गयी. हारकर एन्टी रोमियों अभियान से एन्टी होना पड़ गया. खैर बात यूपीकोका की हो  रही है, जिसको लेकर यूपी की बुआ और भतीजे आजकल एक हो गए हैं. जो विकास के नाम पर एकजुट नहीं हुए वे यूपीकोका पर एक हो गए हैं.एक सुर में राग अलाप रहे हैं तो कुछ तो बात होगी.  जानकार तो यही कहते हैं कि जिन पार्टियों की नींव में गुंडे बदमास और माफिए कंधा लगाकर खड़े हों वे भला ऐसे यूपीकोका का विरोध नहीं तो क्या योगी का अभिनंदन करेंगे. तो क्या वाकई योगी का कानून समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी या कांग्रेस के खिलाफ है..

जरा एक नजर डालते हैं..आप भी देखिए
सीएम योगी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण (यूपीकोका) विधेयक 2017 में आतंक फैलाने या बलपूर्वक, हिंसा द्वारा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए विस्फोटकों या अन्य हिंसात्मक साधनों का प्रयोग कर किसी की जान या संपत्ति को नष्ट करने या राष्ट्र विरोधी, अन्य लोक प्राधिकारी को मौत की धमकी देकर या बर्बाद कर देने की धमकी देकर फिरौती के लिए बाध्य करने के खिलाफ कड़े प्रावधान हैं। संगठित अपराध के खतरे को नियंत्रित करने के लिए संपत्ति की कुर्की, रिमांड की प्रक्रिया, अपराध नियंत्रण प्रक्रिया, त्वरित विचार एवं न्याय के मकसद से विशेष न्यायालयों के गठन और विशेष अभियोजकों की नियुक्ति तथा अनुसंधान संबंधी प्रक्रियाओं को कड़े एवं निवारक प्रावधानों के साथ यह विशेष कानून अधिनियमित किया गया है। फिरौती के लिए अपहरण, सरकारी ठेके में शक्ति प्रदर्शन, खाली या विवादित सरकारी भूमि या भवन पर जाली दस्तावेजों के जरिए या बलपूर्वक कब्जा, बाजार और फुटपाथ विक्रेताओं से अवैध वसूली, शक्ति का प्रयोग कर अवैध खनन, धमकी या वन्यजीव व्यापार, धन की हेराफेरी, मानव तस्करी, नकली दवाओं या अवैध शराब का कारोबार, मादक द्रव्यों की तस्करी आदि को इसके अंतर्गत रखा गया है। विधेयक में संगठित अपराध के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। उपरोक्त प्रावधानों से ऐसा नहीं लगता कि यह किसी खास दल या समूह के खिलाफ है लेकिन  सपा और बसपा दोनों इसका विरोध कर रहे हैं. कारण साफ है यूपी में अधिकांश माफिया और भूमि हड़पने के मामले इन दो पार्टियों से ही जुड़े हैं. दोनों दलों के नेता जानते हैं कि यदि कानून लागू हुआ तो उनके लिए चुनावी फंड देने वाले सबसे पहले जेल की सलाखों के पीछे होंगे. यूपीकोका को गलत ठहराने वालों का कानून और न्याय व्यवस्था में विश्वास नहीं दिखता. उन्हें यह तो जरूर मानना चाहिए कि यदि यूपीकोका का गलत इस्तेमाल हुआ तो अदालतों में उसे चुनौती दी जा सकेगी.और यह यूपी सरकार के लिए बड़ी कसौटी होगी. संभव है इसका राजनीतिक इस्तेमाल हो लेकिन इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी जा सकती है.फिर हो हल्ला की जरूरत क्या है.

अखिलेश का तंज, बहन जी का डर...कानून का मजाक ..
 यूपीकोका नहीं ये धोखा है। फर्नीचर साफ करने के पाउडर को PETN विस्फोटक बताने वाले जनता को बहकाने में माहिर हैं ।  9 महीनों में बीजेपी ने जन सुरक्षा से खिलवाड़ करते हुए न सिर्फ समाजवादी 'यूपी100' और महिला सुरक्षा की '1090 हेल्पलाइन' को ,बल्कि समाजवादी विकास पथ पर बढ़ते प्रदेश को रोका है।  अखिलेश यादव ने यूपीकोका पर ट्वीट किया कि नए साल में जनता को उत्तर प्रदेश सरकार का तोहफा, सेल्फी लेने पर लग सकता है यूपीकोका। वहीं बसपा सुप्रीमो भी इसे राजनीतिक द्वेष का हथियार बता रही हैं, जिनसे उन्हें बड़ा खतरा पैदा हो गया है.

जब न्याय विभाग ने बनाया कानून तो एतराज क्यूं
उच्च न्यायालय में संगठित अपराधियों, माफियाओं और अन्य सफेदपोश अपराधियों की गतिविधियों पर नियंत्रण के सम्बन्ध में दायर याचिका पर 12 जुलाई 2006 को पारित आदेश के क्रम में माफिया की गतिविधियों तथा राज्य सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप पर अंकुश लगाने के लिए कानून का प्रारूप न्याय विभाग की सहमति से तैयार किया गया है। इस विधेयक में 28 ऐसे प्रावधान हैं, जो पहले से लागू गैंगस्टर ऐक्ट में शामिल नहीं हैं। प्रस्तावित कानून के तहत दर्ज मुकदमों की सुनवाई के लिये विशेष अदालतें बनेंगी। विधेयक के परीक्षण के लिए गृह विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी। समिति द्वारा परीक्षण के दौरान उच्च न्यायालय के पारित निर्णय तथा महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून-1999 (मकोका) का भी गहन अध्ययन करके इस विधेयक का प्रारुप तैयार किया गया है। राज्य संगठित अपराध नियंत्रण प्राधिकरण खुद संज्ञान लेकर अथवा शिकायत होने पर संगठित अपराधियों की गतिविधियों की छानबीन करेगा और इसके लिए प्राधिकरण शासन की कोई भी फाइल देखने के लिये अधिकृत होगा।

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

यह मुल्क मेरा नहीं लगता


साहिर लुधियानवी का एक शेर सच लगता है फुटपाथ हर, गली का हर आशियां हमारा, रहने को घर नहीं है सारा जहां हमारा. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लाखों लोग इसी हालत में जिंदा हैं. आजादी के 71 सालों बाद भी बापू के रामराज्य और लोहिया के समाजवाद के सच से दूर किसी कल्पना में..फंटासी में. इसके लिए दोषी चाहे नेता हों, मंत्री या सरकार लेकिन इतना तो सच है कि स्वाधीनता की आधी सदी से ज्यादा गुजरने के बाद भी देश का आम आदमी आज भी रोटी-कपड़ा और मकान की जद्दो जहद में लगा है. रात का चूल्हा जलाने के लिए सुबह से नाका-चौराहों पर हाथ फैलाए खड़ा रहता है. एक अदद छत की तंगी में सडक़ फुटपाथों पर सोता है. रोजी की बदहाली से रातों को फांका करता है..बच्चों से भीख मंगवाता है, और खुद भी हाथ फैलाने को मजबूर होता है.
गूगल से साभार
कौन कहता है कि यह देश एक है, समाज एक है. दर्द एक है. यहां तो हरेक दिल के भीतर अपनी-अपनी दुनिया है. अपना-अपना देश है. ऐसे में लोकतंत्र समाजवाद की छाती से निकला हुआ एक छल नहीं तो क्या है. यहां लोग मरने को मजबूर हैं फिर भी समाजवाद जिंदा है. घोषणाओं में, भाषणों में.तहरीरों में.किताबों में...अगर ऐसा नहीं होता तो लोहिया के शिष्य और समाजवाद के मसीहा मुलायम सिंह यादव भला अपने उत्तम प्रदेश में अपनी ही रियाया का दुख दर्द भला क्यों नहीं महसूस किए होते. उनके गांव का सैफई महोत्सव तो आप को जरूर याद होगा. एक तरफ जहां चढ़ती हुई सर्दियों की धुन पर रात जवान हो रही थी और गुलाबी हो रहा था गणतंत्र, वहीं मुजफ्फर नगर के उखाड़े गए शरणार्थी शिविरों में सांय-सांय चलती हवा धंसती जा रही थी हड्डियों में. उजड़ी हुई दयार में बच्चों की उधड़ी हुई पीठ से टकराकर थरथरा रही थी सर्दी..ऐसे में बादशाह को तय करना था कि वह रियाया की कंपकपी महसूस करे या कलाकारों के बिके हुए ठुमकों पर दाद दे..

चंद मिनटों की खरीदी गयी चंद कदमों की कलाओं पर मुलायम ने करोड़ों लुटा डाले और खुले बेछत शिविरों में बच्चे बिलखते रहे भर पेट भात के लिए, छटाक भर दूध के लिए और एक चटाई छत के लिए. इस भय के साथ कि सोते हुए कोई गरदन न उतार ले जाए..क्या बहुत ज्यादा मांगते हैं हूजूर..सच कहना. लेकिन राजा होकर भी तो आखिर कुछ नहीं दिया आपने..उस रियाया के लिए, जिसके वोट पर आप नरेश बने..मायावती जिसे सब बहनजी कहते हैं. लेकिन ऐसी बहन हैं जिन्हें यूपी के सड़क फुटपाथों और गलियारों में फांका करता कोई भावी आंबेडकर नहीं दिखता. बहुमत की जीत के बाद आपने जनता को दलित-पीड़ित और भाई-बहन कहा..लेकिन कुर्सी और सत्ता की चकाचौंध ऐसी चली कि आपने अपनी दीन-दलित रियाया की भूख और बीमारी मिटाना भूलकर खुद का बुत बनाने बैठ गयीं..एक तरफ अवाम नून तेल के लिए पैसे-पैसे को तरसती रही, और आप नोटों का नवलखा हार पहनकर खूब इतरार्इं..

अंग्रेजों से आजादी दिलाने वाली कांग्रेस के युवराज आप ने भी कमाल कर दिया..आप सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं लेकिन जब आपने गरीबों की वकालत और राजनीति शुरू की तो लगा कि आप कुछ और करने की सोंच रहे हैं लेकिन सच में आपने भी वही किया.आप दलितों, मुस्लिमों और हिन्दुओं के बीच नयी खाई बना रहे हैं. आप के परिवार की यही रीत रही है. आप रीत को आगे बढ़ा रहे हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि यह खाई जितनी बड़ी होगी आप की जीत का सिलसिला उतना ही गहराता जाएगा....आम लोगों में उजले भविष्य का सपना जगाकर आपने बची अस्मत भी लूट ली. अब तो आम आदमी भी केजरीवाल के पास चला गया. और केजरीवाल जी आम से अचानक खास हो गए हैं. आप चूल्हे की आग छीनने में लगे हैं. मसीहा बने फिर रहे हैं. यूपी में एक सन्यासी के हाथ में सत्ता है. वह कहते हैं कि उन्हें कोई लालच और आसक्ति नहीं. फिर सीएम की कुर्सी पर बैठकर शासन करना सत्ता लोलुपता नहीं क्या है.खैर खजाने से जनता की सेवा कितना करेंगे यह परीक्षा होनी बाकी है. आप के सन्यास और त्याग की कसौटी बाकी है.

परीक्षा देश के मुखिया और नए सम्राट की भी है जो दो कदम और आगे तक सोंचते हैं. सपनों के भंवर में यात्रा करा रहे हैं. खुशहाली और अच्छे दिनों के सपने बेचते हैं ..लेकिन असल हालात पर इनका काबू नहीं है. महंगाई और बेकारी का कलंक लगना ही है. नारों और आश्वासनों की अफीम चटाने वाले ऐ मसीहाओं सुनो! आप   जनता के पैसों पर विदेश जाते हो, वहां का लोकतंत्र देखने. लेकिन यहां अपने रियाया की सिसकियां नहीं सुनते..उनके आंसू नहीं देखते? विदेशों की धरती पर कुछ होते ही तुम ट्विटर पर संवेदना और संदेश लिखते हो लेकिन अपने लोगों का दर्द देखकर आपको दर्द तक नहीं होता...क्यों होना चाहिए..आखिर कुछ भी तो नहीं होता. लोग मार डाले जाएं, क्या हो गया. घर जला दिए जाएं,  क्या हो गया? उजाड़ दिए जाएं,  क्या हो गया? 125 करोड़ की आबादी वाले देश में 100-पचास को मार दिया जाना, सैकड़ों का उजाड़ दिया जाना, क्या होता है? क्यों मचनी चाहिए खलबली.
आप अपने जन्म दिन पर करोड़ों फूंक डालते हैं. आप की उड़ रही सोखियों के बीच हजारों मांएं चूल्हे की आंच पर गिन रही होती हैं रोटियां..अम्मा लगाती रहती है हिसाब कि जले हुए मकान पर फूस डालने के लिए कितने वक्त और काटनी होगी बच्चों की पेट.
 आखिर लोकतंत्र इतना बेचारा कैसा हो गया है, जहां एक तरफ लोग भूख और बेकारी से मर रहे हैं वहीं कोई ऐश कर रहा है..इस समाजवाद का मतलब क्या है. संविधान की दी हुई चुनावी नियामतों के जरिए जनता का शासक बनने वाले नेताओं के लिए जनता का मतलब क्या केवल वोट लेना है.. .सच कहो हाकिमों, क्या वाकई हमारे बच्चों की तरसती आंखें आपसे अपना होने का हिसाब नहीं मांगती हैं, जब आप सम्राट बनकर इतराते हो और उनकी अंतड़ियां भूख से बिलबिलाती हैं. लोक तंत्र और समाजवाद के विधाताओं बताओ ना, अगर यह मुल्क मेरा भी है तो मेरा लगता क्यूं नहीं? 

रविवार, 26 नवंबर 2017

वो निज देश हित पाक से दौड़ आए, घुसे ताज में कितना तांडव मचाए

(26-11 की त्रासदी के बाद शब्दों में उतरी हुई एक वेदना)


वो निज देश हित पाक से दौड़ आए
घुसे ताज में कितना तांडव मचाए
कई जानें ली,खून कितना बहाए
 कई गोद, माँगों को सूना बनाए..


. .........00000.......
पर अपुन सोचते क्यों मुसीबत बढाएं.
निरर्थक ही पैसा-समय क्यों गवाएं॥
व्यवस्था से क्यों ब्यर्थ पंगा लड़ाएं,
जो खाली हैं वे खुद करें या कराएं ।

यही है वजह जिससे मुश्किल बढ़ी है.
हैं कहते सभी बस हमें क्या पड़ी है ॥

 हैं सब सोचते कोई आएगा पहले.
सोते हुओं को जगाएगा पहले ।
संकट हमारा मिटाएगा पहले ,
नया रास्ता खुद दिखाएगा पहले ॥


बताओ यही हाल कब तक चलेगा.
मिटाए बिना मर्ज कब तक मिटेगा,
बिना बीज बोए कहां फल मिलेगा
पतित हो रहा हिन्द कैसा उठेगा ॥

अब केवल नहीं काम कहने से होगा,
ना नेता, नियति को उलहने से होगा.
झुका शीश हरदम न सहने से होगा
स्वयम के लिए स्वयं करने से होगा॥


ये है देश अपना बताना पड़ेगा .
यहां फर्ज सबको निभाना पड़ेगा,

जरूरत पड़ी जख्म खाना पड़ेगा
लहू देश हित निज बहाना पड़ेगा
चिता भी स्वयं की सजाना पड़ेगा
औ रोते हुए गीत गाना पड़ेगा ॥

आओ पहल आज मिलकर करें हम
जहां जुल्म होवे,हों मिलकर खड़े हम
      सबको लिए साथ मिलकर चलें हम.....

-सुधीर शर्मा- 

ओ बंधु चल, ओ साथी चल..ऐसे ही सोए रहे तो पछताओगे कल.


ओ बंधु चल, ओ साथी चल.
ऐसे ही सोए रहे तो पछताओगे कल..।
ओ बंधु चल, ओ साथी चल..........।।



 जब लाखों ने जान गंवायी,
 तब भारत ने आजादी पायी..
यूं भूले तो हो जाएगी कुर्बानी निष्फल..ओ बंधु चल..।।1।।



रोटी-कपड़ा और दवाई,
छीन रही सब कुछ महंगाई..
चूल्हे में अरमां जले और खुशहाली हर पल.ओ बंधु चल.।।2।।


राजनीति का थोथा दावा,
सब वादा, उत्थान छलावा..
चुप बैठे तो ये नेता जाएंगे देश निगल..ओ बंधु चल..।।3।।


आरक्षण ने फिर ललकारा..
संघर्षों में कौशल हारा....
वर्षों से बन रहे हैं हम, बहकावे में पागल..ओ बंधु चल..।।4।।


ऐसे ही सोए रहे तो पछताओगे कल...
.....ओ बंधु चल, ओ साथी चल.....






सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

कविता उत्पादन नहीं हृदय से पैदा होने वाला सृजन है, साहसी मन ही लिखता है कविताएं


राजीव सारस्वत सम्मान समारोह में सत्कारमूर्ति प्रो.रामजी तिवारी का प्रतिपादन
नवी मुंबई, मानव समाज को व्यवस्थित, अनुशासित और सुसंस्कृत रखना है तो साहित्य को सुरक्षित रखना होगा. क्योंकि साहित्य के बिना समाज और संस्कृति नहीं बच सकते. उक्त उद्गार वरिष्ठ साहित्यकर्मी प्रो.रामजी तिवारी ने कोपरखेरणे में आयोजित राजीव सारस्वत सम्मान समारोह 2017 में व्यक्त किया. राजीव सारस्वत 26/11 मुंबई आतंकी हमले में शहीद हो गए थे . उनकी स्मृति में श्रुति संवाद साहित्य कला अकादमी हर साल एक कवि एवं साहित्यकर्मी को सम्मानित करती है. 2017 का राजीव सारस्वत सम्मान प्रो. रामजी तिवारी को प्रदान किया गया.कवि आसकरण अटल को जीवन गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यहां अपने संबोधन में वरिष्ठ साहित्यकर्मी प्रो.तिवारी ने कहा कि राजीव सारस्वत सम्मान एक साहित्यकर्मी और उसके कवि कर्म को याद करने का माध्यम है. कवि राजीव सारस्वत की शहादत में उनके कविकर्म को यादगार और आन्दोलन बना देना सबसे बड़ी साहित्य सेवा है. अतिथियों में महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. नंदलाल पाठक, एचपीसीएल के निदेशक प्रदीप कुमार अग्रवाल,   बिल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष धर्मेन्द्र कारिया, एचपीसीएल के मुख्य महाप्रबंधक अभिषेक दत्ता, अरुप भट्टाचार्य, नरेश कुमार, राम विचार यादव, श्रुति संवाद के अध्यक्ष अरविंद राही, महासचिव अनंत श्रीमाली, मारकंडेय हरिओम, अनिल सिंह समेत तमाम लोग उपस्थित थे.

साहित्य की उपेक्षा करने वाला राष्ट्र उपेक्षित हो जाता है..

 प्रो.तिवारी ने एक उदाहरण देते हुए कहा- एक बार मशहूर लेखक आस्कर वाइल्ड से पूछा गया कि उन्हें सेक्शपीयर और ब्रिटेन में से किसी एक को चुनना हो तो वे किसे चुनेंगे. आस्कर वाइल्ड का जवाब था..सेक्शपियर. सवाल उठा क्यों? आस्कर वाइल्ड ने जवाब दिया कि साहित्यकार सेक्शपियर को त्याग दिया तो ब्रिटेन नहीं बचेगा. लेकिन  यदि सेक्शपियर रहा तो ब्रिटेन को फिर बनाया जा सकता है.आस्कर वाइल्ड का यह जवाब किसी देश के लिए साहित्य की अहमियत को रेखांकित करता है. इसका हवाला देते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि कविता सृजन की अभिव्यक्ति है जो हृदय से निकलती है. यह कोई 'उत्पादन' नहीं है जो किसी के कहने पर पैदा की जा सके. इसलिए काव्य लिखना आसान नहीं है. निर्भय, निर्द्वंद और साहसी हृदय से ही काव्य का सृजन हो सकता है, भयभीत मनवाला कोई कविता और साहित्य नहीं लिख सकता. वहीं महाराष्ट्र साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. नंदलाल पाठक ने कहा कि साहित्य की उपेक्षा करने वाला राष्ट्र खुद उपेक्षित होकर एक दिन मिट जाता है. जो राष्ट्र आज दुनिया में नहीं है इसका सीधा अर्थ है कि उन्होंने साहित्य की उपेक्षा की. साहित्य होता तो वे फिर जिवंत हो सकते थे.

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

जो अपनों को मरवा कर रोती है वही तो राजनीति है...कविता

एक सज्जन ने राजनीति क्या है जानना चाहा,
मैंने कहा आइए बताता हूं,
राजनीति का एक प्रयोग समझाता हूं..
किसी भी भागते हुए चूहे को दौड़ाइए, और..पत्थर उठाकर उसे मारिए..फिर
मरने पर उसे हवा देकर गोबर सुंघाइए..
यूं ही किसी को भी मरवा दीजिए जान से.
और चिता के पास बैठकर रोते हुए कहिए इत्मीनान से,
आज के हालात कितने अजीब हैं,
हमारे अपने ही लोग हमसे बिछड़ते जा रहे हैं,
हम कितने बदनसीब है..
साथ ही घड़ियाली आंसू  बहाइए, ताकि
लोग समझ सकें कि वाह मुर्दे के साथ भी कितनी  प्रीति है,
पर उन्हें क्या पता, यही तो आज की राजनीति है..।।


--सुधीर शर्मा

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

जब जम्हूरियत से जन्नत में, आतंकी गले मिले.-.तो भारत कैसे न जले.

कविता..
 ...तो भारत कैसे न जले

कल कारखाने नित बंद हो रहे हैं यहां,
रोजी रोटी रोजगार हित हड़ताल है..
नोटबंदी, रेरा और जरिए जीएसटी यहां,
सरकार उद्यमों की खींच रही खाल है..
जब गांवों में बूझें चूल्हे, औ संसद उबले.
                       ..तो भारत कैसे न जले..1


राम औ रहीम, राष्ट्रवाद है फसाद बना,
आज सद्भाव पड़ रहा कमजोर है..
न्याय-नीतियों की यहां धज्जियां हैं उड़ रहीं,
नेता औ सिपाही हर कोई बना चोर है....
जब कर्ज और बदहाली से हलधर का दम निकले..
जब नेता हों मालामाल,  औ जनता भूखे पेट पले.
                                         ..तो भारत कैसे न जले...2



तीन सौ सत्तर की बेड़ियों से बंधा हुआ,
पाप ये सियासी भोग रहा कश्मीर है...
दहशत सीख रहा वादियों का नौनिहाल,
निज हथियार लिख रहा तकदीर है...
जब जम्हूरियत से जन्नत में, 
आतंकी गले मिले....
....तो भारत कैसे न जले...3

सारी वसुधा को जो कुंटुंब मानता रहा,
पड़ रही उस हिन्दुस्तान में दरार है..
विष भरे संत मौलवियों के बयानों से ही,       
आज कौमी एका हो रही ये तार तार है...
जब राजनीति ही गोवंशज- पहलू की जां निगले.

                                       ...तो भारत कैसे न जले...4

                          -सुधीर शर्मा

हिन्दी दिवस पर विशेष- अंग्रेजियत के आगे राष्ट्रभाषा बकवास है.?


---
पखवाड़े मे जब फूट पड़ी उत्कंठा,
मैने सहचर को बोला-चलो यार  
हम भी कुछ हिन्दी को बूझें और जानें 
बिना समझे ही इसे राष्ट्रभाषा क्यूं मानें।

हमने मौलवी जी से पूछा 
"उर्दू के अनुयायी होकर भी आप हिन्दी को मानते हैं।
राष्ट्रभाषा का महत्व भला, आप कितना जानते हैं ?"

मौलवी जी चेहरा पढ़कर बतलाने लगे, 
निजभाषा का महत्व समझाने लगे।।

`हिन्दी`भारत की शान है, अभिमान है।
हिन्दी के ही कोख से जन्मा हिन्दुस्तान है।।
हिन्दी में गालिब के गजलों की रवानी है,
ऋग्वेद की ऋचाएं हैं, कबिरा की वाणी हैं।

प्रसाद के नाटकों में यही खिलखिलाती है।
तुलसी की चौपाईयों में कहकहे लगाती है।।
 पंथ प्रान्त पब्लिक को जोड़ने की भाषा है।
बहुजन की बोली है ये राष्ट्र की अभिलाषा है।।

और इतना कुछ होकर भी हिन्दी निराश है।
अंग्रेजियत के आगे राष्ट्रभाषा बकवास है।।

विषय गहराया तो, सहचर अकुलाने लगा,
प्रसंग को छोड़ कर बीच में ही जाने लगा।
मुझसे कान में धीरे से आकर बोला-
चलो अब हम भी जाते हैं मौलवीजी
हिन्दी के नाम पर बेवजह पकाते हैं।।

बिडंबना देखिए कि, 

आज ABCD के दौर में
भारत की भाषा दर दर भटक रही है।
पखवाड़े में सरकारी दफ्तरों के आगे 
हिन्दी सिर्फ बैनर बनकर लटक रही है।

और तो और..
इंग्लिश बोलने वाले पुचकारे जा रहे हैं
और, हालात इतने खराब हैं कि 
राष्ट्रभाषा बोलने वाले लोग मारे जा रहे हैं।।

मौलवी जी निराश होकर बोले-
हुक्मरानों और पहरेदारों से आहत हिन्दी,
 अंग्रेजी के कदमों में दम तोड़ रही है, 
उसे आगे बढ़कर थाम लो,

हिन्दी वतन की आबरू है, तुम्हारी पहचान है..
कम से कम तुम तो हिन्दी से काम लो। 
                        ..तुम तो हिन्दी से काम लो।।
                                                                    -सुधीर शर्मा

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

मुंबई में बारिश, बाढ़, आपदा और टेक्नोलोजी


बुधवार को मुंबई में एक दिन में 300 मिमी बारिश के साथ आयी आफत बेहद तकलीफदेह रात की तरह गुजरी. हजारों लोग जो आफिस के लिए निकले थे वे रास्ते में फंसे रहे. तमाम लोग अपने कार्यालयों में तथा रेलवे स्टेशनों पर फंसे रहे.  हालांकि राहत की बात ये रही कि इनके लिए स्थानीय लोगों ने लोगों के लिए मदद का हाथ बढ़ाकर मुंबई को जिन्दादिल होने का सबूत दिया. इसमें स्थानीय लोगों के साथ ही गणपति मंडल, गुरूद्वारा एवं मस्जिदों के स्वयंसेवियों ने अच्छी  भूमिका निभायी तथा लोगों के लिए खाने के सामान, पानी और रहने के लिए सुरक्षित जगह भी दी. हर बार की तरह इस बार भी मुंबईकरों ने इंसानियत और भाईचारे का परिचय देते हुए सामूहिक सहायता की नयी मिसाल कायम की, जो काबिले तारीफ है.

इस बार बारिश की आफत में मदद के लिए जगह जगह सड़कों पर पुलिस की मौजूदगी भी देखने को मिली. सड़कों और निचले इलाकों में भारी जलजमाव के बावजूद और धीमी ट्रैफिक के बीच पुलिस ने रात भर यातायात को नियंत्रित करते हुए जिम्मेदारी निभाई. मुंबई पुलिस की सक्रियता और जिम्मेदारी उसके ट्विटर हैंडल पर भी साफ दिखी जिसके जरिए नागरिकों को निरंतर मौसम और सड़कों की हालत के अपडेट्स दिए जा रहे थे. नागरिकों ने भी पुलिस की इस चौकस भूमिका की सराहना की.

हालांकि इन सबके बीच प्राकृतिक आपदा के इस प्रकरण ने हमें अगली बार और बेहतर करने के लिए क्या सिखाया है? इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है....

1. मुंबई में पूरे शहर में 4700 से अधिक सीसीटीवी कैमरे हैं। इन कैमरों से जो भी जानकारीपूर्ण छवियां प्राप्त होती  हैं, वे मुंबई पुलिस के ट्वीटर हैंडल से जोड़कर यूजर्स को सही और सटीक जानकारी दी जा सकती है. ताकि आगे क्या हो रहा है उसकी स्थिति सड़क के उपयोगकर्ताओं को बेहतर ढंग से मालूम हो सके।

2. बेहतर सूचना प्रसार के लिए सड़कों पर इलेक्ट्रानिक बोर्ड लगे हैं हालांकि इसे और प्रभावी बनाने इनकी संख्या में काफी बढ़ोतरी किए जाने के जरूरत है.

3. वाहन चालक आमतौर पर Google नक्शे पर भरोसा करते हैं ताकि उन्हें अपने गंतव्य के लिए सबसे तेज़ संभाव्य मार्ग का पता चल सके। लेकिन आपदा के समय में, ऐसे मार्ग अप्रचलित हो सकते हैं। और उन्हें जानने का कोई तरीका नहीं है कि पुलिस सीसीटीवी नेटवर्क के साथ एकीकृत GIS नक्शे का उपयोग कर इसे एक अद्यतन और उपयोगी  टूल के रुप में इस्तेमाल कर सकती है जिसके जरिए सड़क और ट्रैफिक की स्थिति को उपयोगकर्ताओं को सूचित करने के काम में लाया जा सकता है. भौगोलिक जानकारी के साथ शहर का एक नक्शा आधारित दृश्य आपदा में फंसे सूचना की तलाश में लगे नागरिक के लिए महान वरदान हो सकता है.

                    वर्तमान में, सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए, शहर के नक्शे पर जमीनी जानकारी का कोई एकत्रीकरण नहीं है. इसके अलावा, यातायात पुलिसकर्मी सीसीटीवी कैमरों द्वारा कवर नहीं किए गए सड़कों पर जलग्रस्त साइटों पर यातायात की भीड़ के फोटो / वीडियो ले सकते हैं, जिससे शहर भर में इस तरह की साइट्स के लेट लाँग्स को नक्शे पर दिखाया जा सकता है और पानी के प्रवेश और आवागमन के समग्र दृश्य प्रदान किए जा सकते हैं. शहर भर में भीड़ की समस्या और नक्शे पर घर जाने वाले लोग यात्रा के लिए आवश्यक निर्णय ले सकते हैं. इसका फायदा  रोड पर ड्यूटी में लगी अन्य पुलिस कर्मियों को हो सकता है , जो नक्शे पर बड़ी तस्वीर या जलजमाव को देखते हुए ट्रैफिक को डायवर्ट करने का निर्णय ले सकते हैं.


4. पुलिस वेबसाइट पर जीआईएस मानचित्र-आधारित दृश्य सूचना  शहर में भोजन / पानी / आश्रय स्थलों की जानकारी दे सकती है. नागरिकों द्वारा स्वैच्छिक प्रयासों की ऐसी जानकारी को बुधवार की रात को WhatsApp और ट्विटर पर प्रसारित करते हुए भी देखा गया था. इन स्वयंसेवी गतिविधियों के साथ-साथ सरकारी इंतजामों की एकत्रित जानकारी से आपदा की स्थिति में स्थिति को शांतपूर्ण बनाए रखने में मददगार रहेगा. इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड भी ऐसी जानकारी प्रदर्शित कर सकते थे.

5. विशिष्ट विषयों के लिए जैसे यातायात आंदोलन या स्वैच्छिक सहायता जैसे भोजन / पानी / आश्रय के लिए हैशटैग सामाजिक मीडिया के सार्वजनिक उपयोगकर्ताओं के जरिए प्राप्त जानकारी और तस्वीरों को  पुलिस द्वारा उपयोग किया जा सकता है।  उपयोगकर्ताओं को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार प्रासंगिक सूचना प्राप्त करने के लिए इस जानकारी को नक्शे पर अपलोड किया जा सकता है। परेशानी वाले कॉल करने वालों के लिए उपयोगी मार्गदर्शन के साथ जवाब देने के लिए पुलिस के नियंत्रण कक्ष में जानकारी के इस तरह के मानचित्र आधारित एकत्रीकरण भी बहुत उपयोगी होंगे।

   आपदा की स्थिति में, लोग उचित जानकारी और राहत के लिए सरकार से बड़ी उम्मीद करते हैं. ऐसे में तकनीक एक प्रभावी समन्वय और सहायता प्रदान करने में कारगर स्रोत की भूमिका निभा सकती है. 
साभार (IPS प्रज्ञा सरवदे के ब्लाग आर्टिकल का हिन्दी रुपांतरण)


बुधवार, 29 मार्च 2017

आओ प्यास बुझा लो.......

एक सैनिक सिर्फ इंसानों की ही सुरक्षा नहीं करता, बल्कि मुल्क के जानवरों के प्रति भी वह उसी सिद्दत से जिम्मेदारी निभाता है..यह तस्वीर तो कुछ यही किस्सा बयां करती है......अंजान...


मंगलवार, 3 जनवरी 2017

नए साल पर नए संकल्प दिलाएंगे सफलता और खुशहाली


पुराना साल 2016 तमाम अनुभव, यादें और खुशियों भरा रहा. हालांकि कुछ परेशानियां भी रही होंगी.लेकिन नया साल नयी उम्मीदों, संभावनाओं और संकल्पों के साथ हमारे सामने है. आइए हम नए साल पर कुछ ऐसे संकल्पों के बीज बोएं जो हमें जीवन भर खुशहाली और आनंद का फल दें. जैसा कि आप जानते हैं कि नए साल पर हममें से अधिकांश लोग अपनी बुरी आदतों को छोड़ने, नयी उपलब्धि या, मुकाम पाने, कैरियर बनाने और आगे बढ़ने का संकल्‍प लेते हैं. जो भी हो, लेकिन याद रहे हमारा संकल्‍प ऐसा होना चाहिये जो वाकई हमारी जिन्दगी को बेहतर बनाने में मददगार हों. अच्छे संकल्पों से हम हमारी जिन्‍दगी को सफल, स्‍वस्‍थ्‍य और सुखमय बना सकते हैं. आज हम आपसे कुछ ऐसे ही संकल्प शेयर करेंगे. संभव है आपने इसे पहले ही चुन लिया हो अगर नहीं तो नोट कर लें क्योंकि यह आपके लिए हैं सिर्फ आपके लिए..

अपनी सेहत को तंदुरुस्त बनाएं 

कहा गया है कि अच्‍छी सेहत जीवन के लिए हजारों नियामतों के बराबर है. ध्यान रखें आप के धन दौलत सब कुछ है लेकिन यदि आप की सेहत ठीक नहीं रहती. आप बीमारी या डिप्रेशन के शिकार बन जाते हैं तो यह आपकी खुशहाली में खलल है. इससे बचने के लिए जरुरी है कि सबसे पहले अपनी सेहत को तंदुरूस्त रखने का संकल्प लें. क्योंकि सभी खुशियों का आनंद तभी उठाया जा सकता है जब हम स्वस्थ होंगे. इसके लिए व्‍यायाम और दूसरे उपाय और दिनचर्या अपनाकर लाभ उठा सकते हैं.


   परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं 

अगर आप पिछले साल अपने कुछ यार दोस्तों या रिश्तेदारों से नहीं मिल सकें हैं. या  काम धंधे या नौकरी की व्यस्तता में अपने परिवार को पूरा समय नहीं दे पाने का दर्द है तो इस बार ये कोशिश करें कि आप ज्यादा से ज्यादा समय उनके बीच गुजारने का संकल्प लें. खास तिथियों जैसे जन्म दिन, शादी की सालगिरह या किसी त्यौहार पर सबके बीच खुशियां मनाएं. फेमिली और फ्रेंड्स को महत्व देकर आप जीवन में नयी ऊर्जा भर सकते हैं.

व्यसन और बुरी आदतों को छोड़ें

कई बार कुछ व्यसन- जैसे अल्कोहलिक एडिक्शन, चेन स्मोकिंग जैसे वीहेवियर्स हमें अपने दोस्तों एवं परिजनों के लिए टेंशन का कारण बन जाते हैं. आप नए साल पर यह संकल्प जरुर लें कि यदि कहीं किसी को इससे दिक्कत है तो उसे दुर करना चाहिए. जाहिर है बुरी आदतों से अक्सर अपनों से कहा सुनी या मनमुटाव हो जाता है. अच्छी आदतों को अपनाने का संकल्प लेकर आप अपनों से फिर वहीं प्यार और सम्मान पा सकते हैं. क्यों कि यह एक बेहतर मौका है.

जिन्‍दगी को पूरी तरह से जीये 

कहते हैं कि जिन्दगी आइसक्रीम की तरह है, जो लोग इसे लेकर लापरवाह रहते हैं वे इसका मजा नहीं ले पाते.सीधे अर्थों में जिन्दगी हमें आनंद और उत्साह के साथ जीने के लिए मिली है. हमें इसका भरपुर मजा लेना चाहिए. नए साल पर यह हसीन मौका है जब आप बोरियत और उदासी भरी जिन्दगी जीने की बजाय हसीन और जिन्दादिल जिन्दगी जीने का संकल्प ले सकते हैं. आप यह भी जानते हैं कि आजकल की भागदौड़ और स्पर्धा भरे माहौल में खुशहाल जीवन बड़ी चुनौती है लेकिन यदि आप समझदारी रखें तो इस हेक्टिक जीवन को खुशनुमा बना सकते हैं.



-कुछ नया करने का संकल्प लें 


इस साल सामान्य दिनचर्या और रुटिन से हटकर कुठ नया करने का भी संकल्प लिया जा सकता है. जैसा कि आप जानते हैं कि एक अच्‍छा जीवन जीने के लिये आपको पैसों की बहुत जरुरत पडे़गी. पिछले साल आपने जितना कुछ बेवजह खर्च किया है उससे सबक लेते हुए इस साल को बेहतर बनाने की जरुरत है. इसलिए 2017 में बुलंदी तक पहुंचने के लिए कुछ नया करने और दृढ़ता के साथ पूरा करने का संकल्प लें. इसके साथ ही यदि आप पैसे बचाने की आदत डाल लेंगे तो वह आपके बेहतर जीवन के काम आएगा.

इस साल कुछ नया सीखिये 
जीवन चलते रहने का नाम है. इसमें हर रोज कुछ नया करने और सीखने का मौका मिलता है. यदि आप अपने आप को रोमांच और सक्रियता से आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं तो इस साल कुछ ऐसा सीखिये जिसे आप लंबे समय से सीखने की सोच रहे थे पर अधिक काम की वजह से आप उसमें सफल नहीं हुए। नई भाषा, गिटार, कुकिंग या फिर तैराकी जैसी कितनी ही चीजें हैं जिन्हें आप सीख सकते हैं.

टैंशन को कहें बाय बाय

आज के दौर में तनाव जीवन की सबसे बड़ी समस्या है. जिससे पुछो हर कोई यही कहता है क्या करें बड़ी टेंशन है. चाणक्य ने समझाया है कि हमें यह नहीं सोंचना चाहिए कि जीवन में मुश्किलें या मुसीबतें न आएं बल्कि हमें यह प्रार्थना करनी चाहिए हमें जीवन में मुश्किलों का मुकाबला करने या उससे जूझने का हौसला मिले. इस साल यह संकल्प लें जब भी कोई ऐसा पल आए तब तुरंत हाथ उपर उठाएं और टैंशन को बाय-बाय कहकर इसे बिदा कर कर देंगे. न टेंशन रहेगा न ही कोई तकलीफ रहेगी.


जरुरतमंदों की मदद करें

कहा गया है कि आदर्श जीवन वो है जो दूसरों के लिए जिया जाय. याद रखें जब भी कोई जरुरतमंद आप की नजर में आए आप उसे यथाशक्ति मदद की कोशिश करने का संकल्प लें. इसके लिए आप पड़ोस या रिश्तेदार के बच्चे जिनके पास किताबें नहीं होती उनकी पढ़ाई और किताबों के लिए भी आर्थिक मदद कर सकते हैं. यदि आप खिलाड़ी,म्यूजिसियन, या टीचर हैं तो किसी कमजोर बच्चे को समय देकर उसे खेल या ट्यूशन सिखा सकते हैं. इससे जहां आप एक जरुरतमंद की सहायता करेंगे वहीं आपके मन को भी एक असीम आनंद मिलेगा.लोगों को उपहार भी देकर आप आनंदित जीवन पा सकते हैं.

जमकर खेलें, ध्यान, और प्रार्थना भी करें 

जब भी मौका मिले तमाम व्यस्तताओं के बीच कहीं घूमने और खेल खेलने का, छुटि्टयां मनाने का संकल्प लें. हर दिन या हफ्ते में यह भी प्रयास करें कि भीड़ से अलग खुद से मिलें. खुद से बातें करें. अपने आप में जीएं.अकेले ..संभव हो तो सकारात्मक और उल्लास भरे जीवन के लिए प्रार्थना करें. ईश्वर ने आपको यहां दुख और परेशानी झेलने के लिए नहीं भेजा है. आनंदित जीवन जीने के लिए भेजा है. तो आप संकल्प लें कि अब से सदैव आनंदित जीवन ही जिएंगे.

आप स्वस्थ और खुशहाल जीवन के हकदार हैं


हममें से अधिकांश लोग अपनी दिनचर्या और आदतों के कारण दुखी और परेशान हैं. आप इनसे अलग ताजगी के साथ जिन्दगी को मजेदार, स्वस्थ और खुशहाली के साथ जीने का संकल्प लें. चाहे आप विद्यार्थी हैं, गृहस्थ, बिजनेस मैन या प्रफेशनल. आप अपनी उम्र, या परिस्थिति की चिन्ता किए बिना जोशीला संकल्प लें. क्योंकि आप खुद अपने जीवन के शिल्पकार हैं. आपको खुद के लिए खुशमिजाज, सुख शांति-सूकून और समृद्धि भरा  खुशहाल जीवन जीने का अधिकार है. आप अपने संकल्पों से इसका चुनाव कर सकते हैं मैं आपको नए साल और नए संकल्पों के लिए बधाई देता हूं जो आपने अपनी सम्मान और खुशहाली के लिए चुना है. मुझे पूरा विश्वास है कि आप का नया साल आदर्श और समृद्धि भरा होगा..सफलता और सूकून भरा होगा आपको बधाई..हो..

सोमवार, 27 जून 2016

क्या कर लोगे यार, मैं तो नेता हूं....



क्या कर लोगे यार ,मैं तो नेता हूं..
देश में डाका मैं डालूंगा,
गूगल से साभार
पड़ा खजाना सब खा लूंगा
लूंगा नहीं डकार ।। मैं तो नेता हूं।।

मुझको चुनकर दिया है तुमने,
बदले में धन लिया है तुमने,
फिर क्यों हाहाकार।। मैं तो नेता हूं।।

बिजली पानी कम्प्यूटर हमने लाया,
मौलिक सुविधाएं भी तुम तक पहुंचाया.
दिया तुम्हें अधिकार ।।मैं तो नेता हूं ।।

अपने दल की आज यहां पे सत्ता है,
भ्रष्टाचारी चोर भले अलबत्ता है..
अपनी है सरकार ।।मैं तो नेता हूं ।।

भला, बुरा, सच्चा, झूठा या गंदा है,
प्यारे अपना राजनीति ही धंधा है..
है ए कारोबार ।। मैं तो नेता हूं ।।

हर धंधे में, सब ही तो यहां कमाते हैं
क्यों नेता के नाम भला चिल्लाते हैं..
हम से ही क्यूं तकरार ..मैं तो नेता हूं ।।

सरकार' हमें मरने भी नहीं देती...

फिल्म दामिनी की तरह दिघा की अवैध इमारतें भी तारीख पर तारीख के इंतजार में मुर्दा होती जा रही हैं. मुर्दा इसलिए कि बेघर होने और घर टूटने की चिंता में जितने परिवार यहां रहते हैं वे जिन्दा लाश बन चुके हैं. जिन लोगों ने यह अवैध संकट लाखों रुपयों के बदले इन्हें बेचा वे थोथी उम्मीद बंधा रहे हैं कि 'सब अच्छा होगा'. जबकि उम्मीद बंधाने वालों के विरोधी दिनरात यही मनाते हैं कि अदालत सबको बेघर करने का फैसला सुना दे..उम्मीद और तारीखों के बीच नेता श्रेय की ऐसी राजनीति खेल रहे हैं जिसने यहां के 4 हजार परिवारों और 30 हजार लोगों की नींद उड़ा दी है. राजनीतिक घमासान, मनपा और एमआईडीसी की कार्रवाई, विरोध पर पुलिसिया डंडे और गिरफ्तारी दिघाकरों के लिए किसी नरक यातना से कम नहीं हैं. पीड़ित रहिवासी इतने मानसिक तनाव में हैं कि उनके सामने समाधान का आखिरी रास्ता खुदकुशी और जान देने के सिवा नजर नहीं आता. आखिर दिघाकरों का कसूर क्या है.. क्या गरीब लोगों को घर नहीं चाहिए..मुंबई में आने वाले हर शख्स को रोटी मिल जाती है लेकिन घर नहीं मिलता..लोग रिश्तेदारों और पहचानों के यहां दिन काटते हैं.जिनका कोई नहीं उन्हें.सड़क फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं..ऐसा हर शख्स खुद का आशियाना चाहता है..क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अपने घर में चंद रोज भूखे भी रहे तो भी सूकून मिलता है..दिघाकरों ने यह पाप किया है. रोटी कपड़ा तो उन्होंने कमा लिया था लेकिन मकान उनकी जरुरत थी जिसे दिघा के सौदागरों से मिली. नियम है कि 20 साल के वास्तव्य है तो कानूनी है लेकिन यहां तो उसकी सुनवाई नहीं है..खैर घर बचाने सूबे के मुखिया 'देवेन्द्र' आगे आए .मदद का भरोसा दिलाया तो जीने की नयी आस बंधी.सरकार ने कहा था कि यदि हाइकोर्ट इमारतों को नहीं बख्सता है तो वे सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे..हुआ भी वही..जैसे ही हाइकोर्ट ने तोड़ी जाने वाली 8 इमारतों को और मोहलत देने से मना किया , एमआईडीसी शीर्ष अदालत भागी. फैसला रहिवासियों के लिए राहत भरा आया..एमआईडीसी के भी पक्ष में जो मानसून की आड़ में कार्रवाई स्थगित करने की अपील कर रही थी. रोने का मन था ..आंसू आ गए...एमआईडीसी के लिए कुछ ऐसा ही रहा..सब ने राहत की सांस ली...जिन अधिकारियों की काली कमाई के कारण दिघा की अवैध इमारतों का जंजाल परवान चढ़ा.जहां हजारों लोगों का आशियाना दांव पर लगा है. जो आज टूटने की कगार पर है....उन्हें कुछ तो जिन्दगी मिली. खैर सुप्रीम कोर्ट से 45 दिनों की मोहलत मिल गयी है तो हजारों चेहरे खिल गए हैं कुछ दिनों के लिए ही सही..लेकिन ये खुशी अस्थाई है. सर्वोच्च अदालत में राज्य सरकार यदि रेगुलराइजेशन का न्यायसंगत और नया प्रस्ताव पेश करने में बिफल होती है तो दिघाकरों को बेघर होने से कोई भी नहीं बचा सकेगा. यह बड़ी कसौटी इसलिए है क्योंकि इससे पहले 7 महीनों तक बांबे हाइकोर्ट में सरकार न्यायसंगत प्रस्ताव प्रस्तुत करने में फेल रही है. उसने राज्य भर के अवैध निर्माणों को नियमित करने ऐलान किया था, लेकिन उसके तरकश में न्यायसंगत प्रावधानों का अभाव था..शायद जानबुझकर भी आवास्तव प्रस्ताव दाखिल किए गए ताकि अदालत में वक्त खींचा जा सके...दिघाकर हर रात नींद गंवाकर सोते रहे लेकिन सरकार को तो चाहिए थी वही तारीख पर तारीख.....तारीख पर तारीख..... सरकार चाहती तो उल्हासनगर में अवैध इमारतों को नियमित करने के विशेष प्रपोजल के आधार पर दिघाकरों को न्याय दिला सकती थी, उसके सामने मुंबई के कैंपा कोला जैसी विशाल इमारत का फैसला भी था. गवर्नमेंट ने दोनों को दरकिनार कर दिया. अब बारी देश की सर्वोच्च अदालत के सामने खुद को जनता का हितैषी साबित करने की है, यहां 31 जुलाई को फिर सुनवाई होनी है. 43 दिन शेष बचे हैं इसके भीतर महाराष्ट्र सरकार को हाइकोर्ट से जुदा नया और न्यायसंग प्रस्ताव पेश करना होगा..वर्ना दिघाकरों को जिन्दा रहने की दिलासा दे चुके देवेन्द्र शीर्ष अदालत में हजारों जिन्दगियों के गुनहगार साबित होंगे. हजारों परिवार उजड़ेंगे तो बददुआ भी देंगे जो अगले चुनाव में सरकार के लिए शाप साबित हो सकता है. अच्छे दिनों का वादा करने वाली भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश भी पैदा होगा. अदालत का निगेटिव फैसला अच्छे दिनों पर कलंक साबित होगा. संभव है बेघर हो चुके रहिवासी कमल को गरियाएंगे, तीर धनुष को धिक्कारेंगे..तब शायद कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ फिर उभरेगा..जैसा कि जिलाध्यक्ष दशरथ भगत दावा करते हैं कि उनकी आघाड़ी सरकार ने कभी जनता को बेघर नहीं किया...यह सरकार ऐसी है जो वादा आवास देने का करती है लेकिन काम घर तोड़ने वाला कर रही है. जिसके शासन में महंगाई और मनमानी से जनता मरने को मजबूर है..ऐसी सरकार अच्छी हो तो भी क्या फायदा.....

सोमवार, 2 मई 2016

‘सिग्नोरा तुम्हें गांंधी से रिश्ता बताना होगा'



 अगस्तावेस्लैंड हेलीकाप्टर सौदे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक पांचजन्य ने सवाल किया है कि इस मामले में रिश्वत देने वाले जेल में है तो रिश्वत लेने वाले कौन हैं? यह सिग्नोरा है कौन? एक अजब का झीना परदा पड़ा है जिसके पार जनता सब देख रही है, इसलिए सिग्नोरा तुम्हें आना होगा, गांधी से अपना रिश्ता बताना होगा.
''इटली की अदालत से भारत को ठगने वालों की खबरें, राज्यसभा में कुछ अच्छे चेहरों की दस्तक देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के घर को थर्रा रही है.'' हालांकि वक्त बदल चुका है, आज भारी भरकम सौदों में संदिग्ध लेन-देन के लिए दलालों के कूटनाम से ज्यादा जटिल बच्चों के स्मार्टफोन के पासवर्ड और पैटर्न हो गए हैं. संपादकीय के अनुसार सिग्नोरा इतालवी शब्द है जिसका संबोधन हिन्दी में श्रीमती सरीखा है. लेकिन सिग्नोरा को घेरने घोटाले का भूत इटली से भारत चला आयेगा, यह किसी ने सोचा था क्या ? देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी के लोगों का आग्रह है कि इसे किसी खास नाम से जोड़ने की भूल न की जाए लेकिन भूल तो हल्ला की धूल उठने से पहले ही कोई कर चुका है. पांचजन्य ने सवाल उठाया है कि ‘‘घूस देने वाला जेल में है तो घूस लेने वाला कौन है? यह सिग्नोरा है कौन? इस विस्फोटक खुलासे से आशंका और कयास लगने शुरू हो गए और आफत से घिरा एक राजनीतिक दल अपने आकाओं पर से ध्यान हटाने के लिए कुछ भी कर सकता है. लोग इसके लिए तर्क दे रहे हैं और दंगों के इतिहास से उस दल का रिश्ता बता रहे हैं. इसमें कहा गया है कि दाग और दादागिरी से उस दल का पुराना रिश्ता है.  देश की सबसे बड़ी पंचायत में दादागिरी की गुर्राहट का इतिहास रहा है. बताया जा रहा है कि 'डिजिटल मीडिया पर यह डर और आशंका है लेकिन इसे सिर्फ आशंकित लोगों का डिजिटल डर मानना गलत होगा. यह दुनिया के सबसे युवा देश की त्वरित, सटीक प्रतिक्रिया है.....
  जनता के सामने सिग्नोरा की यह पहेली पार्टी को समझानी है जिसके माथे इटली की यह आफत आ पड़ी है.. सिग्नोरा के साथ भारतीय राजनीति के उस पुरखे का उपनाम भी विदेशी अदालत में उछला जिसके लिए भारतीय समाज की भावनाओं को भुनाया जाता रहा है.गौर करने वाली बात है कि सात दशक के लोकतांत्रिक सफर में कुछ राजनीतिक दलों ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए गांधी सिर्फ वोट हैं, लेकिन इटली की अदालत से पता चला कि सिग्नोरा के लिए गांधी सिर्फ नोट हैं. ‘‘इटली में खुलते चिट्ठों में सिग्नोरा को हेलीकाप्टर सौदे में मुख्य कारक बताया गया है. उस समय कमान थामने वाले हाथ आज किसका चेहरा ढंकना चाहते हैं.
केजरी और नीतीश में इतनी हिम्मत कहां?
संभव है कि इस लेख को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा से जोड़कर देखने वाले  60 महीने की बीजेपी सरकार से सवाल पूछेंगे.. लेकिन उन्हें 125 साल की कांग्रेस से सवाल पूछने का वक्त है. मोदी की डिग्री और बर्थडेट पर सवाल उठाकर देशहित की कवायद करने वाले घृणित मानसिकता वाले नेताओं को चाहिए कि वे करोड़ों हिन्दुस्तानियों की सुरक्षा के बदले गद्दारी एवं सौदा करने में शामिल सिग्नोरा से सवाल पूछने की हिम्मत जुटाएं. खुद को मसीहा बताने वाले केजरीवाल सोनिया को चिट्टी लिखकर स्वयं सफाई देने की मांग क्यों नहीं करते. इतना कलेजा केजरीवाल के पास नहीं है. पीएम का सपना देखने वाले शरद पवार, मुलायम और नीतिश का जिगरा भी आगस्ता के आरोपियों से सवाल पूछने का नहीं दिखता....शायद हो भी तो वे पूछेंगे नहीं क्यों कि इनकी नियत में खोट है...ऐसा नहीं होता तो भला ये खामोश क्यों होते...खैर सुरक्षा के साथ सौदेबाजी करने वाले अब मुद्दे से देशवासियों का ध्यान हटाने संसद में हंगामा और सड़कों पर प्रदर्शन पर उतारू हो गए हैं...कल गांव गली तक धरना देंगे...परसो चक्का जाम करेंगे, तरसो...हंगामा बरपाएंगे. ..शायद खुद को बचाने कौमी नफरत का नया बीज बो दें..जाहिर है जब यह बीज फूटेगा तभी तो इनकी कथित राष्ट्रभक्ति उभरेगी.तब मोदी का हिन्दुस्तान को बुलंदियों पर ले जाने का अभियान राई-छाई हो जाएगा...न बुलेट रहेगी..न विकास रहेगा..तब शायद एक चीज जरूर रहेगी ----कौमी रंजिश ....मुझे तो यही दिख रहा है...जरा आप भी सोंचिए....शायद आपको कुछ और दिख जाए जनाब.........

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

आप, आल इंडिया रेडियो सुन रहे हैं...

13 फरवरी : रेडियो दिवस पर विशेष
नमस्कार , यह रेडियो मुंबई है और आप आल इंडिया रेडियो सुन रहे हैं..यह आवाज आपको भी खूब लुभाती होगी..आकाशवाणी की उद्घोषणा है ये...1980 के दशक में जब टीवी का इतना प्रचलन नहीं था तब मेरे घर पर मरफी का सिंगल बैंड रेडियो था..शायद मेरे पिताजी को किसी कंपनी के एक मैनेजर ने पुराना हो जाने पर भेंट में दिया था..मैंने उसी रेडियो को साथी बनाकर 9 वीं से 12वीं तक की पढ़ाई की. हालांकि पड़ोसी व सहपाठी मेरी मां से खूब शिकायत करते थे, आपका लड़का पढ़ता कम, रेडियो ज्यादा सुनता है..लेकिन हकीकत में गांवों में देर रात तक लैंप  के साथ पढ़ाई के दौरान रेडियो मेरा सबसे अच्छा सहयोगी रहा, जिसकी धुनों व कार्यक्रमों के बीच मैंने 12वीं तक की पढ़ाई की और बेहतरीन नंबरों से पास भी हुआ...रेडियो से नहीं भाई, मेहनत से..रेडियो तो साथी रहा मेरा. खैर मैं बात इसकी उपयोगिता की कर रहा हूं..1984 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत की खबर मैंने अपने बूआ के गांव से विदा होते हुए एक खपरैल के मकान की खिड़की से सुनी थी.मैनें फूफाजी को बताया कि इंदिरा गांधी को किसी ने गोली मार दी..उन्होंने पूछा था -किसने बताया..मैंने कहा -पीछले घर में रेडियो पर न्यूज में सुना...अनेक उदाहरण हैं कम खर्च में सूचनाएं देने वाला रेिडयो से बढ़िया साधन आज भी गांवों के लिए कोई और नहीं है..
इतिहास भी बेहद रोचक है ..
जब टीवी का अस्तित्व नहीं था तब पहली बार 1906 में कनाडाई वैज्ञानिक रेगिनाल्ड एफ. ने वायलिन बजाकर रेडियो प्रसारण की शुरूआत की थी..लेकिन इससे पहले वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने भारत में इसका प्रयोग प्रारंभ कर दिया था. साथ ही जी.मार्कोनी ने इंगलैंड में अमेरिका को बेतार संदेश भेजकर नीजी रेडियो का प्रारंभ कर दिया था..
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा..नेताजी
आप  जानकर गर्व करेंगेे  कि आजाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वाधीनता संग्राम के लिए भारतवासियों को जगाने अपना पहला संदेश रेडियो के माध्यम से ही दिया था..तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..नेताजी ने जर्मनी रेडियो से जब यह संदेश दिया तब इसे सुनकर लाखों नौजवान आजादी के लिए अपना सर्वस्व लुटाने तैयार हो गए थे. इससे प्रेरित होकर नेताजी ने जर्मनी, सिंगापुर और रंगून में आजाद हिन्द रेडियो की स्थापना की जहां से रोज भारतीयों के लिए समाचार प्रसारित होता था. आज हम जिस रेडियो के माध्यम से बात कर रहे हैं इसकी शुरूआत अंग्रेजी हुकुमत के बीच 1936 में हुई थी तब इसका नाम इम्पीरियल रेडियो‍ ऑफ इंडिया था. स्वाधीनता के बाद इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो कर दिया गया जिसे हम आकाशवाणी भी कहते हैं....रेडियो का सबसे कारगर उपयोग भारत में गुलामी के दौरान स्वाधीनता आन्दोलन को बढ़ाने में हुआ... जब अंग्रेजों ने प्रिंटिंग प्रेसों पर पाबंदी लगा दी थी तब स्वतंत्रता सेनानियों व देशवासियों को संदेश देने के लिए पहली बार मुंबई के चौपाटी इलाके में सी व्यू नामक इमारत में इंजिनियर नरिमन प्रिंटर ने 27 अगस्त 1942 को ‘नेशनल कांग्रेस रेडियो’चालू किया , जहां से कांग्रेस का समाचार प्रसारित होता था..भारत की पहली उद्घोषक उषा मेहता ने तब कहा था कि यह 41.78 मीटर बैंड है और आप नेशनल कांग्रेस रेडियो सुन रहे हैं ..इसके कुछ ही दिनों बाद अंग्रेजी हूकूमत ने नरिमन प्रिंटर और मेहता को गिरफ्तार कर रेडियो स्टेशन भी बंद करवा दिया था..
इमरजेंसी में बनता है सूचनाओं का सहारा
मैं आप से पूछता हूं , क्या आप जानते हैं कि भूकंप ,चक्रवात और बाढ़ जैसी गंभीर आपदाओं के दौरान जब बिजली और संचार व्यवस्था ठप हो जाती है तो इसके बाद सूचनाओं और जानकारियों का संप्रेषण कौन करता है. यह सब होता है आकाशवाणी यानी रेडियो के जरिए. जी हां...आपात स्थितियों के दौरान संचार व्यवस्था बहाल करने में रेडियो सबसे ज्यादा कारगर साबित होते हैं.  रेडियो तब भी सूचनाएं प्रसारित करता है जब टीवी या अन्य संचार माध्यम बिजली सप्लाई खंडित होने पर बंद पड़ जाते हैं.                        
                       अब आप सोंच  रहेे होंगे कि आखिर टीवी या अन्य संचार माध्यमों के बीच रेडियो ही अधिक उपयोगी क्यों हो जाता है.. आपने गुजरात का भूकंप, भोपाल गैस त्रासदी, दक्षिण भारत में आयी सुनामी, और हुदहुद चक्रवात संग आयी भयंकर तबाही के बारे में जरुर सुना होगा..इस दौरान आपदा ने जहां पेड़ों के साथ ही बिजली के खंभे उखाड़ डाले थे. टेलीविजन का प्रसारण,  और अखबारों का प्रकाशन भी पूरी तरह ठप हो गया था . मोबाइल और टेलीफोन के टावर्स भी ध्वस्त हो गए थे. सूचना पहुंचाने के सारे माध्यम बंद पड़ गए थे.  हुदहुत और सुनामी से आयी बाढ़ के दौरान कई दिनों तक रेडियो के माध्यम से ही सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ. रेडियो सबसे सरल और त्वरित संचार माध्यम  है..एफ एम चैनलों ने इसकी प्रगति को नया आयाम दे दिया है....आप को यह भी बता दें कि आजकल ब़डे-ब़डे आयोजनों व मेलों में भी रेडियो से अस्थाई सूचनाओं का प्रसारण  चल रहा है. अलबत्ता  पिछले कुछेक सालों से टीवी एवं अन्य संचार माध्यमों की चकाचौंध से रेडियो अकेला पड़ गया था,  लेकिन बदलते दौर में आकाशवाणी और एफएम चैनलों की रोचक प्रस्तुतियों ने रेडियो के साथ लाखों-करोड़ों श्रोताओं को दुबारा जोड़ दिया है..रेडियो एक फिर बार लोगों के करीब  पहुंच रहा है. जबसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात’ के लिए रेडियो को चुना है तब से इसकी पसंद एवं लोकप्रियता और भी बढ़ गयी है. रेडियो अब युवाओं के साथ ही सभी वर्गों का चहेता बन रहा है.इसे प्रोत्साहन मिल रहा है तो नए केन्द्र भी खुल रहे हैं.  1947 में जहां आल इंडिया रेडियो के केवल 6 स्टेशन थे, आज बढ़कर 223 हो गए हैं .इन केन्द्रों ने 99 फीसदी भारतीयों तक अपनी पहुंच बना ली है...ये  किसी भी अच्छी या बुरी परिस्थितियों में त्वरित सूचनाएं संप्रेषित करने के लिए तैयार रहते हैं...कार -बस टैक्सी जैसे वाहनों एव ट्रेनों में प्रसारण की सुलभता ने रेडियो  को और भी लुभावना बना दिया है..
                        रेडियों में कार्यक्रम पेश करने वाले आरजे और लेखकों को भी रोजगार का आधार दिया है..यहां क्रिएटिव राइटिंग के लिए कई मौके हैं. .यदि आप रेडियो के लिए वार्ताएं, कविता और कहानियां लिखते हैं तो आप यहां  भेज  सकते हैं, आपकी प्रस्तुतियों को पूरे भारत में एक साथ सुना जाता है..यह इकलौता ऐसा माध्यम है जिसे शहरों के साथ ही सूदूर गांवों में कहीं भी बैठकर या काम करते हुए आसानी से सुना जा सकता है. प्रसार का यह संचार माध्यम वाकई कमाल का है.