सोमवार, 27 जून 2016

क्या कर लोगे यार, मैं तो नेता हूं....



क्या कर लोगे यार ,मैं तो नेता हूं..
देश में डाका मैं डालूंगा,
गूगल से साभार
पड़ा खजाना सब खा लूंगा
लूंगा नहीं डकार ।। मैं तो नेता हूं।।

मुझको चुनकर दिया है तुमने,
बदले में धन लिया है तुमने,
फिर क्यों हाहाकार।। मैं तो नेता हूं।।

बिजली पानी कम्प्यूटर हमने लाया,
मौलिक सुविधाएं भी तुम तक पहुंचाया.
दिया तुम्हें अधिकार ।।मैं तो नेता हूं ।।

अपने दल की आज यहां पे सत्ता है,
भ्रष्टाचारी चोर भले अलबत्ता है..
अपनी है सरकार ।।मैं तो नेता हूं ।।

भला, बुरा, सच्चा, झूठा या गंदा है,
प्यारे अपना राजनीति ही धंधा है..
है ए कारोबार ।। मैं तो नेता हूं ।।

हर धंधे में, सब ही तो यहां कमाते हैं
क्यों नेता के नाम भला चिल्लाते हैं..
हम से ही क्यूं तकरार ..मैं तो नेता हूं ।।

सरकार' हमें मरने भी नहीं देती...

फिल्म दामिनी की तरह दिघा की अवैध इमारतें भी तारीख पर तारीख के इंतजार में मुर्दा होती जा रही हैं. मुर्दा इसलिए कि बेघर होने और घर टूटने की चिंता में जितने परिवार यहां रहते हैं वे जिन्दा लाश बन चुके हैं. जिन लोगों ने यह अवैध संकट लाखों रुपयों के बदले इन्हें बेचा वे थोथी उम्मीद बंधा रहे हैं कि 'सब अच्छा होगा'. जबकि उम्मीद बंधाने वालों के विरोधी दिनरात यही मनाते हैं कि अदालत सबको बेघर करने का फैसला सुना दे..उम्मीद और तारीखों के बीच नेता श्रेय की ऐसी राजनीति खेल रहे हैं जिसने यहां के 4 हजार परिवारों और 30 हजार लोगों की नींद उड़ा दी है. राजनीतिक घमासान, मनपा और एमआईडीसी की कार्रवाई, विरोध पर पुलिसिया डंडे और गिरफ्तारी दिघाकरों के लिए किसी नरक यातना से कम नहीं हैं. पीड़ित रहिवासी इतने मानसिक तनाव में हैं कि उनके सामने समाधान का आखिरी रास्ता खुदकुशी और जान देने के सिवा नजर नहीं आता. आखिर दिघाकरों का कसूर क्या है.. क्या गरीब लोगों को घर नहीं चाहिए..मुंबई में आने वाले हर शख्स को रोटी मिल जाती है लेकिन घर नहीं मिलता..लोग रिश्तेदारों और पहचानों के यहां दिन काटते हैं.जिनका कोई नहीं उन्हें.सड़क फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं..ऐसा हर शख्स खुद का आशियाना चाहता है..क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अपने घर में चंद रोज भूखे भी रहे तो भी सूकून मिलता है..दिघाकरों ने यह पाप किया है. रोटी कपड़ा तो उन्होंने कमा लिया था लेकिन मकान उनकी जरुरत थी जिसे दिघा के सौदागरों से मिली. नियम है कि 20 साल के वास्तव्य है तो कानूनी है लेकिन यहां तो उसकी सुनवाई नहीं है..खैर घर बचाने सूबे के मुखिया 'देवेन्द्र' आगे आए .मदद का भरोसा दिलाया तो जीने की नयी आस बंधी.सरकार ने कहा था कि यदि हाइकोर्ट इमारतों को नहीं बख्सता है तो वे सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे..हुआ भी वही..जैसे ही हाइकोर्ट ने तोड़ी जाने वाली 8 इमारतों को और मोहलत देने से मना किया , एमआईडीसी शीर्ष अदालत भागी. फैसला रहिवासियों के लिए राहत भरा आया..एमआईडीसी के भी पक्ष में जो मानसून की आड़ में कार्रवाई स्थगित करने की अपील कर रही थी. रोने का मन था ..आंसू आ गए...एमआईडीसी के लिए कुछ ऐसा ही रहा..सब ने राहत की सांस ली...जिन अधिकारियों की काली कमाई के कारण दिघा की अवैध इमारतों का जंजाल परवान चढ़ा.जहां हजारों लोगों का आशियाना दांव पर लगा है. जो आज टूटने की कगार पर है....उन्हें कुछ तो जिन्दगी मिली. खैर सुप्रीम कोर्ट से 45 दिनों की मोहलत मिल गयी है तो हजारों चेहरे खिल गए हैं कुछ दिनों के लिए ही सही..लेकिन ये खुशी अस्थाई है. सर्वोच्च अदालत में राज्य सरकार यदि रेगुलराइजेशन का न्यायसंगत और नया प्रस्ताव पेश करने में बिफल होती है तो दिघाकरों को बेघर होने से कोई भी नहीं बचा सकेगा. यह बड़ी कसौटी इसलिए है क्योंकि इससे पहले 7 महीनों तक बांबे हाइकोर्ट में सरकार न्यायसंगत प्रस्ताव प्रस्तुत करने में फेल रही है. उसने राज्य भर के अवैध निर्माणों को नियमित करने ऐलान किया था, लेकिन उसके तरकश में न्यायसंगत प्रावधानों का अभाव था..शायद जानबुझकर भी आवास्तव प्रस्ताव दाखिल किए गए ताकि अदालत में वक्त खींचा जा सके...दिघाकर हर रात नींद गंवाकर सोते रहे लेकिन सरकार को तो चाहिए थी वही तारीख पर तारीख.....तारीख पर तारीख..... सरकार चाहती तो उल्हासनगर में अवैध इमारतों को नियमित करने के विशेष प्रपोजल के आधार पर दिघाकरों को न्याय दिला सकती थी, उसके सामने मुंबई के कैंपा कोला जैसी विशाल इमारत का फैसला भी था. गवर्नमेंट ने दोनों को दरकिनार कर दिया. अब बारी देश की सर्वोच्च अदालत के सामने खुद को जनता का हितैषी साबित करने की है, यहां 31 जुलाई को फिर सुनवाई होनी है. 43 दिन शेष बचे हैं इसके भीतर महाराष्ट्र सरकार को हाइकोर्ट से जुदा नया और न्यायसंग प्रस्ताव पेश करना होगा..वर्ना दिघाकरों को जिन्दा रहने की दिलासा दे चुके देवेन्द्र शीर्ष अदालत में हजारों जिन्दगियों के गुनहगार साबित होंगे. हजारों परिवार उजड़ेंगे तो बददुआ भी देंगे जो अगले चुनाव में सरकार के लिए शाप साबित हो सकता है. अच्छे दिनों का वादा करने वाली भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश भी पैदा होगा. अदालत का निगेटिव फैसला अच्छे दिनों पर कलंक साबित होगा. संभव है बेघर हो चुके रहिवासी कमल को गरियाएंगे, तीर धनुष को धिक्कारेंगे..तब शायद कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ फिर उभरेगा..जैसा कि जिलाध्यक्ष दशरथ भगत दावा करते हैं कि उनकी आघाड़ी सरकार ने कभी जनता को बेघर नहीं किया...यह सरकार ऐसी है जो वादा आवास देने का करती है लेकिन काम घर तोड़ने वाला कर रही है. जिसके शासन में महंगाई और मनमानी से जनता मरने को मजबूर है..ऐसी सरकार अच्छी हो तो भी क्या फायदा.....

सोमवार, 2 मई 2016

‘सिग्नोरा तुम्हें गांंधी से रिश्ता बताना होगा'



 अगस्तावेस्लैंड हेलीकाप्टर सौदे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक पांचजन्य ने सवाल किया है कि इस मामले में रिश्वत देने वाले जेल में है तो रिश्वत लेने वाले कौन हैं? यह सिग्नोरा है कौन? एक अजब का झीना परदा पड़ा है जिसके पार जनता सब देख रही है, इसलिए सिग्नोरा तुम्हें आना होगा, गांधी से अपना रिश्ता बताना होगा.
''इटली की अदालत से भारत को ठगने वालों की खबरें, राज्यसभा में कुछ अच्छे चेहरों की दस्तक देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के घर को थर्रा रही है.'' हालांकि वक्त बदल चुका है, आज भारी भरकम सौदों में संदिग्ध लेन-देन के लिए दलालों के कूटनाम से ज्यादा जटिल बच्चों के स्मार्टफोन के पासवर्ड और पैटर्न हो गए हैं. संपादकीय के अनुसार सिग्नोरा इतालवी शब्द है जिसका संबोधन हिन्दी में श्रीमती सरीखा है. लेकिन सिग्नोरा को घेरने घोटाले का भूत इटली से भारत चला आयेगा, यह किसी ने सोचा था क्या ? देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी के लोगों का आग्रह है कि इसे किसी खास नाम से जोड़ने की भूल न की जाए लेकिन भूल तो हल्ला की धूल उठने से पहले ही कोई कर चुका है. पांचजन्य ने सवाल उठाया है कि ‘‘घूस देने वाला जेल में है तो घूस लेने वाला कौन है? यह सिग्नोरा है कौन? इस विस्फोटक खुलासे से आशंका और कयास लगने शुरू हो गए और आफत से घिरा एक राजनीतिक दल अपने आकाओं पर से ध्यान हटाने के लिए कुछ भी कर सकता है. लोग इसके लिए तर्क दे रहे हैं और दंगों के इतिहास से उस दल का रिश्ता बता रहे हैं. इसमें कहा गया है कि दाग और दादागिरी से उस दल का पुराना रिश्ता है.  देश की सबसे बड़ी पंचायत में दादागिरी की गुर्राहट का इतिहास रहा है. बताया जा रहा है कि 'डिजिटल मीडिया पर यह डर और आशंका है लेकिन इसे सिर्फ आशंकित लोगों का डिजिटल डर मानना गलत होगा. यह दुनिया के सबसे युवा देश की त्वरित, सटीक प्रतिक्रिया है.....
  जनता के सामने सिग्नोरा की यह पहेली पार्टी को समझानी है जिसके माथे इटली की यह आफत आ पड़ी है.. सिग्नोरा के साथ भारतीय राजनीति के उस पुरखे का उपनाम भी विदेशी अदालत में उछला जिसके लिए भारतीय समाज की भावनाओं को भुनाया जाता रहा है.गौर करने वाली बात है कि सात दशक के लोकतांत्रिक सफर में कुछ राजनीतिक दलों ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए गांधी सिर्फ वोट हैं, लेकिन इटली की अदालत से पता चला कि सिग्नोरा के लिए गांधी सिर्फ नोट हैं. ‘‘इटली में खुलते चिट्ठों में सिग्नोरा को हेलीकाप्टर सौदे में मुख्य कारक बताया गया है. उस समय कमान थामने वाले हाथ आज किसका चेहरा ढंकना चाहते हैं.
केजरी और नीतीश में इतनी हिम्मत कहां?
संभव है कि इस लेख को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा से जोड़कर देखने वाले  60 महीने की बीजेपी सरकार से सवाल पूछेंगे.. लेकिन उन्हें 125 साल की कांग्रेस से सवाल पूछने का वक्त है. मोदी की डिग्री और बर्थडेट पर सवाल उठाकर देशहित की कवायद करने वाले घृणित मानसिकता वाले नेताओं को चाहिए कि वे करोड़ों हिन्दुस्तानियों की सुरक्षा के बदले गद्दारी एवं सौदा करने में शामिल सिग्नोरा से सवाल पूछने की हिम्मत जुटाएं. खुद को मसीहा बताने वाले केजरीवाल सोनिया को चिट्टी लिखकर स्वयं सफाई देने की मांग क्यों नहीं करते. इतना कलेजा केजरीवाल के पास नहीं है. पीएम का सपना देखने वाले शरद पवार, मुलायम और नीतिश का जिगरा भी आगस्ता के आरोपियों से सवाल पूछने का नहीं दिखता....शायद हो भी तो वे पूछेंगे नहीं क्यों कि इनकी नियत में खोट है...ऐसा नहीं होता तो भला ये खामोश क्यों होते...खैर सुरक्षा के साथ सौदेबाजी करने वाले अब मुद्दे से देशवासियों का ध्यान हटाने संसद में हंगामा और सड़कों पर प्रदर्शन पर उतारू हो गए हैं...कल गांव गली तक धरना देंगे...परसो चक्का जाम करेंगे, तरसो...हंगामा बरपाएंगे. ..शायद खुद को बचाने कौमी नफरत का नया बीज बो दें..जाहिर है जब यह बीज फूटेगा तभी तो इनकी कथित राष्ट्रभक्ति उभरेगी.तब मोदी का हिन्दुस्तान को बुलंदियों पर ले जाने का अभियान राई-छाई हो जाएगा...न बुलेट रहेगी..न विकास रहेगा..तब शायद एक चीज जरूर रहेगी ----कौमी रंजिश ....मुझे तो यही दिख रहा है...जरा आप भी सोंचिए....शायद आपको कुछ और दिख जाए जनाब.........

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

आप, आल इंडिया रेडियो सुन रहे हैं...

13 फरवरी : रेडियो दिवस पर विशेष
नमस्कार , यह रेडियो मुंबई है और आप आल इंडिया रेडियो सुन रहे हैं..यह आवाज आपको भी खूब लुभाती होगी..आकाशवाणी की उद्घोषणा है ये...1980 के दशक में जब टीवी का इतना प्रचलन नहीं था तब मेरे घर पर मरफी का सिंगल बैंड रेडियो था..शायद मेरे पिताजी को किसी कंपनी के एक मैनेजर ने पुराना हो जाने पर भेंट में दिया था..मैंने उसी रेडियो को साथी बनाकर 9 वीं से 12वीं तक की पढ़ाई की. हालांकि पड़ोसी व सहपाठी मेरी मां से खूब शिकायत करते थे, आपका लड़का पढ़ता कम, रेडियो ज्यादा सुनता है..लेकिन हकीकत में गांवों में देर रात तक लैंप  के साथ पढ़ाई के दौरान रेडियो मेरा सबसे अच्छा सहयोगी रहा, जिसकी धुनों व कार्यक्रमों के बीच मैंने 12वीं तक की पढ़ाई की और बेहतरीन नंबरों से पास भी हुआ...रेडियो से नहीं भाई, मेहनत से..रेडियो तो साथी रहा मेरा. खैर मैं बात इसकी उपयोगिता की कर रहा हूं..1984 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत की खबर मैंने अपने बूआ के गांव से विदा होते हुए एक खपरैल के मकान की खिड़की से सुनी थी.मैनें फूफाजी को बताया कि इंदिरा गांधी को किसी ने गोली मार दी..उन्होंने पूछा था -किसने बताया..मैंने कहा -पीछले घर में रेडियो पर न्यूज में सुना...अनेक उदाहरण हैं कम खर्च में सूचनाएं देने वाला रेिडयो से बढ़िया साधन आज भी गांवों के लिए कोई और नहीं है..
इतिहास भी बेहद रोचक है ..
जब टीवी का अस्तित्व नहीं था तब पहली बार 1906 में कनाडाई वैज्ञानिक रेगिनाल्ड एफ. ने वायलिन बजाकर रेडियो प्रसारण की शुरूआत की थी..लेकिन इससे पहले वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने भारत में इसका प्रयोग प्रारंभ कर दिया था. साथ ही जी.मार्कोनी ने इंगलैंड में अमेरिका को बेतार संदेश भेजकर नीजी रेडियो का प्रारंभ कर दिया था..
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा..नेताजी
आप  जानकर गर्व करेंगेे  कि आजाद हिन्द फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वाधीनता संग्राम के लिए भारतवासियों को जगाने अपना पहला संदेश रेडियो के माध्यम से ही दिया था..तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..नेताजी ने जर्मनी रेडियो से जब यह संदेश दिया तब इसे सुनकर लाखों नौजवान आजादी के लिए अपना सर्वस्व लुटाने तैयार हो गए थे. इससे प्रेरित होकर नेताजी ने जर्मनी, सिंगापुर और रंगून में आजाद हिन्द रेडियो की स्थापना की जहां से रोज भारतीयों के लिए समाचार प्रसारित होता था. आज हम जिस रेडियो के माध्यम से बात कर रहे हैं इसकी शुरूआत अंग्रेजी हुकुमत के बीच 1936 में हुई थी तब इसका नाम इम्पीरियल रेडियो‍ ऑफ इंडिया था. स्वाधीनता के बाद इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो कर दिया गया जिसे हम आकाशवाणी भी कहते हैं....रेडियो का सबसे कारगर उपयोग भारत में गुलामी के दौरान स्वाधीनता आन्दोलन को बढ़ाने में हुआ... जब अंग्रेजों ने प्रिंटिंग प्रेसों पर पाबंदी लगा दी थी तब स्वतंत्रता सेनानियों व देशवासियों को संदेश देने के लिए पहली बार मुंबई के चौपाटी इलाके में सी व्यू नामक इमारत में इंजिनियर नरिमन प्रिंटर ने 27 अगस्त 1942 को ‘नेशनल कांग्रेस रेडियो’चालू किया , जहां से कांग्रेस का समाचार प्रसारित होता था..भारत की पहली उद्घोषक उषा मेहता ने तब कहा था कि यह 41.78 मीटर बैंड है और आप नेशनल कांग्रेस रेडियो सुन रहे हैं ..इसके कुछ ही दिनों बाद अंग्रेजी हूकूमत ने नरिमन प्रिंटर और मेहता को गिरफ्तार कर रेडियो स्टेशन भी बंद करवा दिया था..
इमरजेंसी में बनता है सूचनाओं का सहारा
मैं आप से पूछता हूं , क्या आप जानते हैं कि भूकंप ,चक्रवात और बाढ़ जैसी गंभीर आपदाओं के दौरान जब बिजली और संचार व्यवस्था ठप हो जाती है तो इसके बाद सूचनाओं और जानकारियों का संप्रेषण कौन करता है. यह सब होता है आकाशवाणी यानी रेडियो के जरिए. जी हां...आपात स्थितियों के दौरान संचार व्यवस्था बहाल करने में रेडियो सबसे ज्यादा कारगर साबित होते हैं.  रेडियो तब भी सूचनाएं प्रसारित करता है जब टीवी या अन्य संचार माध्यम बिजली सप्लाई खंडित होने पर बंद पड़ जाते हैं.                        
                       अब आप सोंच  रहेे होंगे कि आखिर टीवी या अन्य संचार माध्यमों के बीच रेडियो ही अधिक उपयोगी क्यों हो जाता है.. आपने गुजरात का भूकंप, भोपाल गैस त्रासदी, दक्षिण भारत में आयी सुनामी, और हुदहुद चक्रवात संग आयी भयंकर तबाही के बारे में जरुर सुना होगा..इस दौरान आपदा ने जहां पेड़ों के साथ ही बिजली के खंभे उखाड़ डाले थे. टेलीविजन का प्रसारण,  और अखबारों का प्रकाशन भी पूरी तरह ठप हो गया था . मोबाइल और टेलीफोन के टावर्स भी ध्वस्त हो गए थे. सूचना पहुंचाने के सारे माध्यम बंद पड़ गए थे.  हुदहुत और सुनामी से आयी बाढ़ के दौरान कई दिनों तक रेडियो के माध्यम से ही सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ. रेडियो सबसे सरल और त्वरित संचार माध्यम  है..एफ एम चैनलों ने इसकी प्रगति को नया आयाम दे दिया है....आप को यह भी बता दें कि आजकल ब़डे-ब़डे आयोजनों व मेलों में भी रेडियो से अस्थाई सूचनाओं का प्रसारण  चल रहा है. अलबत्ता  पिछले कुछेक सालों से टीवी एवं अन्य संचार माध्यमों की चकाचौंध से रेडियो अकेला पड़ गया था,  लेकिन बदलते दौर में आकाशवाणी और एफएम चैनलों की रोचक प्रस्तुतियों ने रेडियो के साथ लाखों-करोड़ों श्रोताओं को दुबारा जोड़ दिया है..रेडियो एक फिर बार लोगों के करीब  पहुंच रहा है. जबसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात’ के लिए रेडियो को चुना है तब से इसकी पसंद एवं लोकप्रियता और भी बढ़ गयी है. रेडियो अब युवाओं के साथ ही सभी वर्गों का चहेता बन रहा है.इसे प्रोत्साहन मिल रहा है तो नए केन्द्र भी खुल रहे हैं.  1947 में जहां आल इंडिया रेडियो के केवल 6 स्टेशन थे, आज बढ़कर 223 हो गए हैं .इन केन्द्रों ने 99 फीसदी भारतीयों तक अपनी पहुंच बना ली है...ये  किसी भी अच्छी या बुरी परिस्थितियों में त्वरित सूचनाएं संप्रेषित करने के लिए तैयार रहते हैं...कार -बस टैक्सी जैसे वाहनों एव ट्रेनों में प्रसारण की सुलभता ने रेडियो  को और भी लुभावना बना दिया है..
                        रेडियों में कार्यक्रम पेश करने वाले आरजे और लेखकों को भी रोजगार का आधार दिया है..यहां क्रिएटिव राइटिंग के लिए कई मौके हैं. .यदि आप रेडियो के लिए वार्ताएं, कविता और कहानियां लिखते हैं तो आप यहां  भेज  सकते हैं, आपकी प्रस्तुतियों को पूरे भारत में एक साथ सुना जाता है..यह इकलौता ऐसा माध्यम है जिसे शहरों के साथ ही सूदूर गांवों में कहीं भी बैठकर या काम करते हुए आसानी से सुना जा सकता है. प्रसार का यह संचार माध्यम वाकई कमाल का है.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

बताओ, यही हाल कब तक चलेगा.....

वे निज देश हित पाक से दौड़ आए
घुसा ताज में कितना तांडव मचाए
कई जानें ली,खून कितना बहाए
कई गोद,घर-माँग सूना बनाए...॥।1
हमें भी वतन निज बचाना पड़ेगा
सभी रावणों को भगाना पड़ेगा
पुन: राम केशव बनाना पड़ेगा
हरेक पहरूओं को जगाना पड़ेगा ॥।2॥

हैं सब सोचते क्यों मुसीबत बढाएं.
निरर्थक ही पैसा समय क्यों गवाएं॥
व्यवस्था से क्यों व्यर्थ पंगा लड़ाएं,
जो खाली हैं वे खुद करें या कराएं ॥।3॥।

यहां पास अपने मसाइल खड़ी है.
दवा-रोजी रोटी की आफत बड़ी है।
यही है वजह जिससे मुश्किल बढ़ी है.
हैं सब सोंचते, बस हमें क्या पड़ी है ॥।4॥

हैं, सभी सोचते कोई आएगा पहले.
नया रास्ता खुद दिखाएगा पहले
सोते हुओं को जगाएगा पहले ।
संकट हमारा मिटाएगा पहले॥।5॥।

हम उस मसीहा के पीछे चलेंगे.
अपना किए नैन नीचे चलेंगे ॥
कायरता मन में उलीचे चलेंगे,
मगर लक्ष्मण रेखा खीचे चलेंगे॥।6॥।

बताओ यही हाल कब तक चलेगा.
मिटाए बिना मर्ज कब तक मिटेगा,
बिना बीज बोए कहां फल मिलेगा
पतित हो रहा हिन्द कैसा उठेगा ॥।७॥।

अब केवल नहीं काम कहने से होगा,
ना नेता नियति को उलहने से होगा.
झुका शीश हरदम ने सहने से होगा
स्वयम के लिए स्वयं करने से होगा॥॥।८॥।

जरूरत पड़ी जख्म खाना पड़ेगा
लहू देश हित निज बहाना पड़ेगा
चिता भी स्वयं की सजाना पड़ेगा
रोते हुए गीत गाना पड़ेगा ॥।10॥।

आओ पहल आज मिलकर करें हम
सबको लिए साथ मिलकर चलें हम
पतित इस व्यवस्था से आओ लड़ें हम
जहां जुल्म होवे, हों मिलकर खड़े हम .....

सोंच कर तो देख पगले, जा रहे हैं हम कहां


फोटो-गूगल से साभार
बढ़ रहे हैं पंथ मजहब, आस्था है घट रही.
आदमी हैं बढ़ रहे, पर आदमियत घट रही:
कौडिय़ों में हैं लगे, इमान भी बिकने यहां ।
सोंच कर तो देख प्यारे जा रहे हैं हम कहां  ॥

राजनीति और नेता से, न आशा कुछ रही,
नींद व उम्मीद टूटी, ना दिलासा कुछ रही.
वोट लेकर हो गये, वो कातिलों के हमनवां ..

पद-प्रतिष्ठा और पैसे हित, मनुज है मर रहा,
दूर्गुणों से जेब अपनी, त्याग सदगुण भर रहा.
भोग लिप्सा में रहे, इंसानियत सब हैं गवां .3.
सोंच कर तो देख पगले जा रहे हैं हम कहां....
                         
बंद हैं कल-कारखाने, मिल बड़ी छोटी यहां,
त्रस्त हैं जन ढूंढते, धंधा, गयी रोटी कहां.
जुर्म से जुडऩे लगे,रोटी से लड़ते नौजवां   ॥

शहर आया गांव तो, गुलजार मयखाने हुए,
नौजवां परदेश में, चौपाल बीराने हुए.
हल हुआ घायल,किसानों का भी बिखरा कारवां ॥
सोच कर तो देख पगले, जा रहे हैं हम कहां....।।।

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

'इल्लीगल को लीगल बना दो साहब'

संदिप नाईक की गवर्नर से गुहार

गवर्नर से मिले सागर नाईक, संजीव नाईक, महापौर सोनावणे, संदिप नाईक
नवी मुंबई,  दिघा में चल रही तोड़ू कार्रवाई को रोकने के लिए स्थानीय राकां विधायक संदिप नाईक आज कल हर मंत्री-महकमा का दरवाजा खटखटा रहे हैं जहां से कोर्ट की कार्रवाई को रोका जा सके. मंगलवार को  उन्होंने गवर्नर सी. विद्यासागर राव को निवेदन देकर अवैध घरों को बचाने की गुहार लगाई. संदिप नाईक अवैध निर्माण के आरोपी नगरसेवक नवीन गवते संग मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से भी मिले और जमींदोज हो रही इमारतों को बख्शने की अपील की.कुछ उपाय ढूंढ़ने की याचना दुहरायी. बाद मुलाकातों के बताया गया कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों ने ही पीड़ितों के हित में सकारात्मक पहल का भरोसा दिलाया है. आप को याद दिला दें कि यहां 96 इमारतें अवैध घोषित की गयी हैं. बांबे हाइकोर्ट ने 4 महीने पहले सभी बिल्डिंगों को ध्वस्त करने का आदेश दिया है.इन्हें बनाने वाले आरोपियों के खिलाफ भी आपराधिक मामला बना है.नवीन गवते उनमें से एक हैं जिन्हें साथ लेकर विधायक मंत्री-महकमों में हाथ जोड़ रहे हैं. बताया जाता है दिघा में सबसे अधिक अवैध इमारतें नवीन गवते ने बनवायी है.उनकी नगरसेवक बीबी अपर्णा गवते, सहित कई परिजनों पर भी आरोप है. गवते समूह खुद का नाम और कमाई बचाने छटपटा रहा है. गरीबों की बर्बादी को आगे कर भूमाफिया अवैध इमारतों को बचाना चाहते हैं क्योंकि राहत सिर्फ इमारतों को नहीं आरोपियों को भी मिलेगी...इसलिए राजनीति भी खूब चल रही है. राजनीतिक विरासत भी दांव पर लगी है, सो विधायक भी मदद के नाम पर इल्लीगल को बचाने राहत संघर्ष में कूद पड़े हैं.

साथ-साथ भटक रहे पूर्व एमपी-महापौर

अवैध का निर्माण और उसे संरक्षण देना दोनों लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951के खिलाफ है.ऐसे लोग भी अपराधी माने जाते हैं. उनके पद को रद्द करने का भी कानूनी प्रावधान है. हालांकि सिर्फ राजनीतिक विरासत बचाने की मजबूरी के चलते राकां के बड़े स्थानीय नेता पूर्व सांसद संजीव नाईक और पूर्व महापौर सागर नाईक भी नगरसेवक गवते के साथ घूम रहे हैं. वर्तमान महापौर सुधाकर सोनावणे भी समर्थन में पीछे पीछे चक्कर लगा रहे हैं. बताया जा रहा है कि विरोधी पार्टी के मुख्यमंत्री फडणवीस से ज्यादा मदद की गुंजाइश नहीं दिखने का कारण अब राज्यपाल से गुहार लगाई जा रही है ताकि मानवीय आधार पर अवैध मकानों और आरोपियों को बचाने का मामला कुछ दिन और खिंचता रहे...विरोधियों का आरोप है कि यह सब काली कमाई करने वाले नगरसेवकों को बचाने की कवायद है जबकि एनसीपी विधायक संदिप नाईक इसे सथानीय रहिवासियों के आशियाने को बचाने की पहल मानते हैं. उन्होंने कहा यह राजनीति नहीं है..लोगों को बेघर होने से बचाने का प्रयास है..कोई क्या कहता है इससे फर्क नहीं पड़ता..लेकिन सवाल उठता है कि आखिर गैरकानूनी काम करने वालों को बचाना कितना जायज है..

सोमवार, 4 जनवरी 2016

घर टूटा तो लीगल होने का मतलब समझ आया...



दिघा में कार्रवाई रोकने रहिवासियों का रास्ता रोको 
तोड़ू कार्रवाई से बेघर होने की पीड़ा झेल रहे नवी मुंबई के सैकड़ों  परिवार रात की नींद और दिन के चैन के लिए मोहताज हो गए हैं. आशियाना छिना है तो जीना भी हराम हो गया है. पतपेढी, नीजी बैंकों और साहूकारों से ब्याज पर पैसा उठाकर घर खरीदना घाटे का इतना बड़ा सौदा साबित हुआ है कि जिन्दगी रहते इसकी भरपाई नजर नहीं आती. दिघा के संतोष ने कहा कि बेघर होना और भाड़ा चुकाते हुए कर्ज भरना भारी संकट बन गया है.दिघा में इस बार न तो दिवाली मनी न तो छठपूजा हुई. ये वो इलाका था जहां इन त्यौहारों पर सबसे ज्यादा आतिशबाजी और धूम धड़ाका होता था, लेकिन उजाड़ कार्रवाई ने सबको सड़क पर ला छोड़ा है फिर त्यौहार मनाएं भी तो कैसे....

न टूटने वाला मकान चाहिए भाई ..

घर टूटने के बाद का नजारा..जहां हरियाली और बेबसी बिखरी पड़ी है
सस्ता घर खरीदकर खो चुके लोग कहते हैं कि अब समझ में आया है कि लीगल होने का मतलब क्या होता है. पीड़ित लोगों के लिए  वैध मकानों की अहमियत तब समझ आयी है जब उनके पास फूटी कौड़ी तक नहीं है. जब थी तब सस्ते की लालच में अवैध को पाने का जोखिम उठाया, और अब जब सब कुछ लुट गया है, तो बचा है सिर्फ पछतावा. आंसू और गम... अब ऐसी इमारतों की दरकार हो उठी है जो सस्ती भी हो और लीगल भी. जानकार सवाल उठाते  हैं कि आखिर कौन ऐसा है जो सुरक्षित आशियाना नहीं चाहता है. गरीब आदमी तो इल्लीगल घर तब खरीदता है जब वो औकात और बजट से बाहर की बात हो जाती है. इसीलिए तो मजबूरन जोखिम उठाते हैं लोग. खैर इसे कानून नहीं समझता..अगर बात समझ में आती तो कोर्ट किसी सभ्य रहिवासी को दूबारा खानाबदोस क्यों बनाता. सड़कों पर सोना आखिर खानाबदोस जीवन ही तो है साहब.... इन हालातों को देखकर हर किसी के कान खड़े हो रहे हैं जो अब तक साबूत बची अवैध इमारतों में रहते हैं. कल उनकी बारी आने वाली है. बहरहाल सड़क पर आने से पहले ही भयभीत रहिवासी सुरक्षित ठिकाना ढूंढ रहे हैं. लोग ऐसे घरों की तलाश में हैं जो पूर्णत: लीगल हो और जिसके टूटने की गुंजाइश भी न हो..वर्ना आसमान से टपके और खजूर पर लटके वाली कहानी हो जाएगी..फिलहाल कोई भी ऐसा नहीं है यहां जो यह कहानी बनने की हालत में दिखता हो...

तोड़ू कार्रवाई से डी-रेल हो गयी है जिंदगी 

बुलडोजर के दर्द ने जिन्दगी की गाड़ी को बेपटरी पर ला दिया है. ..49 वर्षीय सुभाष के मन में अक्सर खुदकुशी का फितूर घूमता है. वह रोते हुए कहता है साहब '' 3 बच्चों का चेहरा यादकर भाड़े की झोपड़ी में लौट आता हूं वर्ना जीने का मन ही नहीं करता'...65 साल की सीताबाई दो बेटों के साथ एक झोपड़ी में अधमरी पड़ गयी है. इस पर टूट चुकी बिल्डिंग और बेघर होने का भारी सदमा पहुंचा है. सीताबाई का छोटा बेटा सुरेश कहता है कि भ्रष्ट अधिकारियों व कथित समाजसुधारकों ने हम गरीबों की जिन्दगी में जहर घोल दिया है. मिल जाएं तो उनका खून पी लूंगा. टूटा दिल, और बिखरे सपने लेकर 3 महीने से सड़क हासिए पर सो रहा सुनिल बेघर होने को तकदीर का तकाजा मानता है. वह कहता है कि नवी मुंबई में बड़े बड़े बिल्डरों ने कितनी ही अवैध इमारतें बना रखी हैं,  कोर्ट कचहरी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते, हम गरीब सस्ता मकान क्या खरीद लिए, साला आफत आ गयी है. यहां तो अपना नहीं अंग्रेजों का राज लगता है..

शनिवार, 2 जनवरी 2016

दीवारों पर बस कैलेन्डर बदला बदला है

शाम वही थी, सुबह वही, नया-नया क्या है
दीवारों पर बस कैलेन्डर बदला बदला है

उजड़ी गली, उबलती नाली, कच्चे-कच्चे घर
कितना हुआ विकास लिखा है केवल पोस्टर पर
पोखर नायक के चरित्र सा गंदला गंदला है..
दीवारों पर बस कैलेंडर बदला बदला है..

दुनिया वही, और वही है दुनियादारी भी
सुखदुख वही,वही जीवन की मारामारी भी
लूटपाट, चोरी मक्कारी धोखा घपला है
दीवारों पर बस कैलेंडर बदला बदला है...

शाम खुशी लाया खरीदकर ओढ़-ओढ़ कर जी
किंतु सुबह ने शबनम सी चादर समेट रख दी
सजा प्लास्टिक के फूलों से हर इक गमला है..
दीवारों पर बस कैलेंडर बदला बदला है

भारतीयों, निष्क्रिय लोकतंत्र की नींद से जागो

 कलाम के जरिए सुकरात ने भेजा संदेश
         
फोटो-गूगल से साभार

दुनिया में कुछ ऐसे लोग आए हैं जिन्होंने अपने विचारों और कार्यो से समाज को नयी दिशा और नयी चेतना दी है. जीने का नया रास्ता दिखाया. नयी सोंच के जरिए चीजों को नयी पहचान और परिभाषा दी. लोग पहले उन पर हंसते और तंज कसते थे लेकिन अब उनमें से कई लोग पूजे जाते हैं. दोस्तों उनमें से कईयों के नाम आप भी जानते हैं...बापू, गौतम, कबीर, सुकरात, मोहम्मद, ईसा आदि आदि आदि..एक विशेष इंटरव्यू में देश के पूर्व राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम से सवाल किया गया था कि यदि वे दिवंगत  दार्शनिक सुकरात से मिलेंगे तो उनसे क्या पूछना चाहेंगे.कलाम का जवाब था -

   भारत में अलग-अलग मतों और जातियों वाला 100 करोड़ से अधिक लोगों का लोकतंत्र है. इनमें से लाखों लोग संसद और विधायिका में चुने जाने के तरीके में माहिर हो चुके हैं. उन्होंने सत्ता में सदैव बने रहने का तंत्र भी विकसित कर लिया है. इनमें देश के सामान्य लोगों के  जीवन में किसी वास्तविक बदलाव की अपेक्षा सत्ता की पुर्नप्राप्ति से ज्यादा लगाव हो गया है. जबकि साधारण लोगों के पास इस दायरे को तोडऩे का कोई विकल्प नहीं है. आम लोग अपने परिवारों के लिए दो वक्त का भोजन जुटाने में मशरूफ हैं. इसलिए वे बगावत का झंडा उठाने में कमजोर और दब्बू हैं. निराशावाद ने उनके दिमाग को कुंठित कर दिया है. मुझे क्या करना चाहिए?
मिसाइल मैन कलाम ने सुकरात के हवाले से जवाब भी दिया..
-सुकरात मुझसे कहेंगे-जाओ और भारत के नौजवानों को बताओ कि वे सामाजिक सामंजस्य के साथ विकसित देश में रहने का विजन पैदा करें.  दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र के प्रबुद्ध नागरिक के तौर पर उठ खड़े हों. स्वार्थी शासक वर्ग की गुलामी से बाहर निकलें, निष्क्रिय लोकतंत्र की नींद से जागें. विकसित राष्ट्र के रुप में भारत की नियति के आविर्भाव की दिशा में आगे बढ़ें और हिन्दुस्तान के वैभव और सौभाग्य को मूर्त रुप देने का उत्तरदायित्व निभाएं.

म मीडिया इन्टेलिजेंस नेटवर्क के माध्यम से सुकरात का यही संदेश आप सब तक पहुचाना चाहते हैं .आप को बताना चाहते हैं कि बस अब बहुत हो गया. उठिए और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने अपने सक्रिय और सकारात्मक योगदान में जुट जाइए. सावधान,क्योंकि आप का अपना देश भारत सम्प्रभुता और सुरक्षा के एक अदृश्य संकट से गुजर रहा है. इस संकट को दूर करने आप को सिपाही बनकर लडऩा है. हालात को ठीक करने का बीड़ा उठाना है. अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करनी है. मनमानी पर सवाल पूछना है. खोया हुआ हक मांगना है. मैं आह्वान करता हूं कि अब बैठें नहीं निकल पड़ो राष्ट्रचेतना के अभियान में मीडिया इन्टेलिजेंस के साथ, अपने यार-दोस्तों के साथ चमन के लिए -मादरे वतन के लिए..........

ऐसा मत सोंचो कि आप के एक अकेले करने से क्या होगा. बापू अहिंसा के मार्ग पर अकेले चले. मोहम्मद साहब ने नेकी के लिए अकेले कदम बढाया.  बाबा साहब आंबेडकर ने छुआछूत के खिलाफ अकेले लड़ाई शूरु की. फिर लोग आते गए और कारवां बढ़ता गया. उनमें और हममें सिर्फ एक अंतर है. उनमें हौसला था लडऩे का, आवाज उठाने का. उनमें हौसला था कुछ नया और बेहतर करने का. उन्होंने अपने हौसले पर संघर्ष किया. आप भी अपने हौसले को आजमा कर देखो. चमत्कार होने लगेगा. हौसले का सिर्फ एक दिया जलाकर तो देखो, चारो ओर रोशनी हो उठेगी. क्योंकि आप को देखकर कई और भी लोग होंगे जो अपने हौसले का दीया जलाएंगे. यकीन मानिए जैसे दिवाली में आप किसी को बोलने नहीं जाते कि छत पर दीया जला देना क्योंकि दिवाली हैं. फिर भी सब अपनी मुंडेर पर दिया खुद जला देते हैं और फिर आप देखते हैं कि पूरा मुहल्ला और पूरा शहर दिवाली की रोशनी में नहा जाता है.  मेरे कहने से एक बार हौसले का दिया जलाकर देखिए आप के आस-पास चारो ओर निर्भयता का उजियारा फैल जाएगा. जैसे ही हौसले का दिया जलेगा, मन में कुंठा और निराशा का जो अंधेरा भरा है वह छंट जाएगा. क्योंकि हौसले का दीया सिर्फ अंधेरा ही नहीं भगाता बल्कि आप को मजबूत भी करता है-आगे बढऩे के लिए, लडऩे के लिए, संकट और समस्याओं से मुकाबला करने के लिए. मीडिया इन्टेलिजेंस आप में हौसले का ऐसा ही दीया जलाने का एक प्रयास है. हम चाहते हैं कि आप भयभीत से निर्भीक बन जाएं. कमजोर से मजबूत बन जाएं. गंवार से होशियार बन जाएं. नागरिक से सिपाही बन जाएं...क्योंकि सिपाही केवल घर का नहीं होता, सिपाही तो वतन के लिए काम करता है. मुझे विश्वास है कि आज से आप ने मादरे वतन के लिए कुछ नया और बेहतर करने का संकल्प ले लिया है. मैं आपको इस साहसी अभियान की सफलता के लिए बधाई देता हूं..जयहिन्द. 

कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती

चश्मा उतारो, फिर देखो यारों

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे- बता तेरी रजा क्या है..यह से
गूगल से साभार
र अक्सर आप ने सुना होगा..मैं आप से कहता हूं कि एक बार इसे आजमा कर देखना..आप को अपने आप में एक ताकत का एहसास होने लगेगा. आप को लगेगा कि आप यूं ही इस दुनिया में नहीं आए हैं. आप के इस धरती पर आने के पीछे कोई खास मकसद है. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम अक्सर कहते थे कि मानव सभी प्राणियों से उत्कृष्ट है. तो फिर इस जीवन को जीने का तरीका भी उत्कृष्ट होगा. लेकिन हम इसे यूं ही गवां रहे हैं. आप कहेंगे कि क्या करें माहौल ऐसा है. तो फिर सवाल ये है कि आप उस माहौल को सुधारने-सवांरने के लिए कोई पहल क्यों नहीं करते . आप को नहीं लगता कि गलत और अपराधमय माहौल समाज के लिए, नयी पीढ़ी के लिए बड़ा खतरा है. ज्यादा कमाने और पाने की लालसा ही तो भ्रष्टाचार की ओर ले जाती है..यही लालसा हर क्षेत्र में बलवती होती जा रही.जाहिर है हमारे चारो तरफ जो घट रहा है, उस का असर हमारे रोज के जीवन पर पड़ता है. जैसे भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध और सामाजिक विकृतियां..अगर आप सोचते हैं कि इसे दूर करना आप का काम नहीं है तो इतना जरुर समझ लेना कि यही अनदेखी आप के बच्चों को बर्बाद करने के लिए काफी हो सकती है. लमहों ने खता की,सदियों ने सजा पाई ...क्यों कि बुराईयों के बीज भले ही हम न बोएं अगर हम उसे देखकर अनदेखी करते हैं तो वह एक दिन विषवेल बनकर हमारे युवा बच्चों को डंसने वाली है. तो वही बात हुई की गलती हम करें और नुकसान हमारी आने व?ली पीढ़ी उठाए. आप को नहीं लगता कि एक अपराध आप ने भी कर दिया है. शायद आप जैसे लोगों ने..तो क्या इसके समाधान के लिए आप को प्रयास नहीं करना चाहिए..जरुर, लेकिन इन मसलों को लेकर आप का नजरिया कुछ और होता है. क्योंकि आप सोंचते हैं कि यह काम मेरा या हमारा नहीं है.
सच्चाई ये है कि आप की आखों पर कायरता का चश्मा चढ़ा है. वाह्य परंपराओं का चश्मा चढ़ा है. इसलिए गंभीर समस्याएं भी आप को कुछ और दिखती हैं.आप अपराध और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर आप चीखते हुए नहीं थकते लेकिन जब उससे लडऩे या रोकने की बात आती है तब आप दूसरों की ओर देखने लगते हैं. ऐसा क्यों क्यों कि आप खुद से कुछ भी करना नहीं चाहते हैं. आखिर यह कब तक चलेगा. आप के इसी नजरिए का असर है कि जब आप के साथ कुछ बूरा होता है तभी आप को दुनिया में समस्याएं और संकट नजर आता है. आप जब घंटों राशन या बिजली बिल भरने के लिए कतार में खड़े होते हैं तो आप को तकलीफ होती है. आप इस पर सवाल उठाते हैं. शिकायत करते हंै. लेकिन जैसे ही आप का काम हो जाता है. आप इस ओर देखने की जरुरत नहीं समझते. तो अगर स्थितियों को बदलना है तो आपको अपनी आखों पर लगा वो चश्मा तो उतारना पड़ेगा.

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

नवी मुंबई में अवैध विदेशियों से बढ़ा खतरा

सर्वेक्षण दे रहे खतरे का अल्टीमेटम
अवैध वास्तव्य से सुरक्षा का खतरा

नवी मुंबई, सानपाड़ा की गुनीना बिल्डिंग में पकड़ा गया डेविड कोलमैन हेडली और ट्रेन ब्लास्ट का आरोपी का घणसोली से पकड़ा जाना इस बात के संकेत है कि नवी मुंबई अपराधियों के लिए सबसे सुरक्षित शरणगाह रही है.वर्तमान में तकरीबन 2000 विदेशी नागरिकों के अवैध वास्तव्य ने सुरक्षा को लेकर पुलिस के कान खड़े कर दिए हैं. सतर्कता संगठन मीडिया इन्टेलीजेंस नेटवर्क ने इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को खत लिखकर जांच और कार्रवाई की मांग की है. मीडिया इन्टेलीजेंस के सर्वेक्षण में विदेशी नागरिकों के अवैध वास्तव्य एवं उनके संदिग्ध क्रियाकलापों से जुड़े कई गंभीर तथ्य सामने आए हैं जो नवी मुंबई सहित राज्य की सुरक्षा के लिहाज से भी खतरे की घंटी हैं.

1-मीडिया इन्टेलिजेस नेटवर्क के आंकलन में इन विदेशियों के रहन-सहन एवं संदिग्ध क्रियाकलापों से जुड़े जो तथ्य सामने आए हैं वे शहर एवं देश की सुरक्षा और शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं. एपीएमसी, नेरुल, वाशी एवं कोपरखेरणे तथा बेलापुर पुलिस स्टेशनों में इनके अवैध कारनामों और बिना वीजा रहने के गंभीर मामले भी दर्ज हैं.
2- आशंका है कि ये देश की सुरक्षा से जुड़े स्थानों की रेकी या अन्य आतंकी गतिविधियों के लिए सूचना देने या अन्य जासूसी कार्यो में स्लीपर सेल की तरह भूमिका निभाते होंगे. शहर में रहने वाले अधिकांश विदेशी एक्सपायर्ड वीजा एवं पासपोर्ट पर नवी मुंबई में रह रहे हैं, जो संवैधाकि तौर पर अवैध है. उन्हें उनके देश भेज देने (डिपोर्ट) की कार्रवाई की जरुरत है.  
3-नवी मुंबई पुलिस के संबंधित पुलिस स्टेशनों द्वारा ऐसे विदेशी नागरिकों की निगरानी या मॉनिटरिंग के लिए कोई भी प्रभावी सिस्टम नहीं है, ताकि उनकी विजा वैधता, निवास और कामकाज के विस्तृत ब्यौरे का नियमित आकलन किया जा सके. ऐसी लापरवाही गंभीर खतरों की चेतावनी है.
4-तकरीबन 65 फीसदी से अधिक यूरोपियन, नाइजीरियन नागरिक जिस भाड़े के मकान या इमारतों में निवास करते हैं. उनके लिए घर-मकान भाड़े पर देते समय स्थानीय पुलिस थाने से एनओसी नहीं ली जाती है.अधिकांश मकान, फ्लैट मालिकों ने बिना पुलिस एनओसी के ही मोटा एवं मनमाना भाड़ा वसूलने की लालच में अपने मकानों या कमरों को इन विदेशियों को भाड़े पर दे देते हैं, जो चिंतनीय और गैर कानूनी है.  
5-सायबर क्राइम ,स्मगलिंग, फेक करेंसी और सेक्स रैकेट जैसी गतिविधियों में कई विदेशी नागरिकों का नाम के आने के बाद नवी मुंबई पुलिस इनके वास्तव्य, कामकाज, कारोबार, विजा एवं पासपोर्ट आदि की जांच को लेकर गंभीर नहीं है जिसे लेकर विशेष निर्देश की जरुरत है. 

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

मॅनी के लिए मेहनत करते मासूम

एक गाना याद आता है नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है,जवाब है, मुट्ठी में है तकदीर तुम्हारी..इस गाने से उलट शहर के गली-मुहल्लों में कचरा चुनते और भीख मांगते कुछ बच्चों को देखकर सवाल उठता है कि अगर मुट्टी में तकदीर है तो फिर देश के इन नौनिहालों को खेलने की उम्र में जीने के लिए यूं मशक्कत क्यों करनी पड़ रही...नेरुल का मोनू, सानपाड़ा की रोशनी और वाशी सिग्नल का छोटू, सब बेहाल हैं. ये वो मासूम हैं जिनके नाम भले अलग हैं लेकिन हालात एक जैसे. पुर्व प्रधानमंत्री चाचा नेहरू बच्चों को देश का भविष्य मानते थे. लेकिन आज इस देश में छोटू व मोनू जैसे न जाने कितने ही नौनिहाल हैं जो घर की गरीबी, पेट की भूख और बेबशी के लिए अपने भविष्य को बेचने के लिए मजबूर हैं. देश के कानून और कल्याण योजनाओं से अछूते. अपनी मजबूरी में, मुफलिसी में, बेबस मां-बाप और परिवार के साथ. ये दिन रात मेहनत करते हैं ताकि अंधेर रातों में घर का चूल्हा जल सके.


पढ़ लिया तो धंधे पर जाओ

CHHOTU (SIRAJ)

 अब जरा इस छोटू से मिल लिजिए. 13 साल का छोटू नेरूल के  मनपा स्कूल में पढ़ाई करता है, दूसरे बच्चों की तरह खेल-कूद, मौज-मस्ती उसे भी पसंद है लेकिन आर्थिक तंगी में कई भाई-बहनों की परवरिश कर रहे पिता शरीफ के लिए वह छोटे हाथ वाला मदद का मसीहा है. स्कू ल से लौटने पर बस्ता रखने के बाद संध्या पाली को घर लौटने वाले छात्रों के लिए स्कूल के पास कैन्डी बेचना उसका रोज का धंधा है. छोटू रुआंसा हो बतलाता है कि स्कूल से आने के बाद उसका बाप कहता है पढ़ के आ गया अब धंधे पे निकल जा...खेलने की चाहत और न जाने की मनसा के बावजूद भी परिजनों की परवरिश कर रहे बाप का फरमान मानकर निकलना उसकी मजबूरी है. भाड़े की खोली में मां-बाप का बनाया कैन्डी का पैकेट लिए  वह कभी नेरूल, शिरवणे तो कभी वाशी या सानपाड़ा के स्कूल-उद्यानों और गली-मुहल्लों की खाक छानता है.

रोटी के लिए भटकना पड़ता है साब!

          जमीन से 15 फूट उपर पतली रस्सी पर एक पांव पर झूलती हुई रोशनी किसी स्कूल में नहीं जाती लेकिन लोहे की रिंग और रस्सियों पर सर्कस का खेल दिखाकर अपने परिवार के लिए रोज सौ-दो सौ कमा लेती है. स्कूल क्यों नहीं जाती, इस सवाल पर वो खामोश हो जाती है लेकिन उसका बाप भगीरथ बोलता है- साब गरीब हैं, काम नहीं करेंगे तो घर कैसे चलेगा. जीने के लिए पैसे नहीं फिर बच्चे कैसे पढ़ाएं.  6 साल के मोनू की कहानी भी इससे जुदा नहीं. मोनू इलाहाबाद के संगम तट पर प्लास्टिक के  डिब्बे बेचते हुए मिला था. उसे पाठशाला का नहीं पता. ठीक से अपना नाम भी नहीं बोल पाता लेकिन यहां गंगा घाट पर पाप धोने आने वालों से कहता है-डिब्बा ले लो भाई, गंगा जल भर लेना. महीनों तक चले आस्था के महामेले में वह भीख नहीं मांगा  बल्कि मनी के लिए मेहनत करता रहा. हालांकि उससे अलग शहर की सड़कों पर ऐसे कितने ही मोनू रोज दिखते हैं जो हथेलियों पर 1-2 रूपए पाने भीख मांगते हैं,आने-जाने वाली गाडिय़ों का शीशा पोछते हैं. भूखे पेट को भरने के लिए मदद  की याचना करते हैं. नंगे बदन , फटे-फुटे चिथड़े में..ये आने वाले भारत के भविष्य हैं.....
आधा दिन: पूरे घर की कमाई
Kishan-Vishal-Rajesh
अब इन तीन और स्कूली बच्चों को भी देख लीजिये। ये हैं राजेश, किशन और विशाल। तीनों महानगर पालिका विद्यालय में पढ़ते हैं. स्कूल से निकलने के बाद घर आते-आते 12- से एक बज  जाते हैं.  आधे दिन के  बाद  इनकी जिन्दगी की असली जद्दोजहद शुरू होती है.  दोपहर बाद एपीएमसी मार्केट में आते हैं. बड़े व्यापारियों के यहाँ से सस्ती सब्जियां और फल चुनते हैं. एक साथ बजार के सामने दुकान लगाते  हैं. माल बिका तो 100 से 200 रूपए कमा लेते हैं.  स्कूल ड्रेस में धंधे का रोज यही वसूल चलता है. ये भी भीख नहीं मांगते , मेहनत करते हैं। आधे दिन में पूरे परिवार की कमाई का जरिया है, इनका कारोबार। सस्ता और बच्चा समझकर लोग फल सब्जियां खरीद लेते हैं. जिस पर परिवार की गाड़ी चलती है। नौनिहालों की यह  कहानी देश की  आजादी के ६५ साल बाद की है. बहरहाल रोशनी का सर्कस बड़े-बच्चों को खूब लुभाता है, छोटू की कैंडी सबको पसंद आती है, लेकिन इनके मेहनत के  पीछे  आधी सदी की आजादी का दिवालियापन, दिन-दिन भर भटकने का दर्द, मौज-मनोरंजन की बजाय मुफलिसी  और मजबूरी भी साफ झलकती है. कभी नजदीक से मनी के लिए मेहनत करते इन मासूमों से रुबरू होकर आप भी अंदाजा लगाइयेगा, तब शायद आपको भी हिन्दुस्तान की 67 सालों की स्वाधीनता पर कोफ्त आ जाए

मन कहे रुक जा रे रुक जा यहीं पे कहीं....


ये बात हवाओंं को बताए रखना, इस तिरंगे को अपने दिल में बसाए रखना..बेलापुर मनपा मुख्यालय के समीप से होकर पामबीच रोड से मुंबई-पुणे की ओर गुजरने वाले हर शख्स का दिल यहां से गुजरते हुए गुनगुनाने लगता है. रुक जा रे रुक जा दिल, तू मेरे यहीं, जो बात इस जगह है कहीं पे नहीं. सच में मन कहता है कुछ पलों के लिए यहीं ठहर जाएं, खड़े होकर खिंचवा लें एक तस्वीर ताकि यादगार बन जाए वह लम्हा कि हिन्दुस्तान के सबसे ऊंचे ध्वज स्तंभ पर तिरंगे को इतराते हुए देखा है. 225 फुट के ऊंचे ध्वज स्तंभ पर फहरते इस राष्ट्रीय ध्वज की लंबाई 70 फुट एवं चौड़ाई 50 फुट है.टेलीफैब्रिक क्लॉथ से निर्मित इस ध्वज का कुल वजन 40 किलोग्राम है.जी हां, मनपा मुख्यालय पर लहराता हुआ यही राष्ट्रध्वज नवी मुंबई की शान बन रहा है.
भर आती हैं आखें, उभर आता है देशप्रेम
 नवी मुंबई के बेलबूटे में सम्मान का यह नया सितारा है जिसे पूर्व सांसद संजीव नाईक ने जड़ा है. 19 फरवरी 2014 को तत्कालीन केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने इसका उद्घाटन करते हुए जब  ध्वजारोहण किया तब देशाभिमान से उनकी भी आंखें डबडबा गयी थी.यहां मौजूद हजारों लोगों के नैन भी राष्ट्रीय स्वाभिमान से छलक  उठे थे. उपर उठते झंडे के साथ मादरे-वतन को बुलंदियों पर देखने का अरमान भी ऊंचा उठता चला गया था. आज भी इसे देखकर स्वाधीनता के गर्व से सीना फूलता है.इस स्वाधीनता, संप्रभुता और उमड़ते राष्ट्रप्रेम का गवाह बन रही है नवी मुंबई. यह तिरंगा हजारों आगंतुकों के लिए प्रेरक बन रहा है. यकीनन आज जब भी इधर से गुजरेंगे, बुलंदियों पर इसे लहराते देख आप भी बरबश गुनगुना उठेंगे..विजयी विश्व तिरंगा प्यारा.झंडा ऊंचा रहे हमारा....

वतन वापसी के लिए छटपटा रहे कश्मीरी पंडित


 बुलंद हो रही कश्मीरी पंडितों की आ‍वाज
सरकार से मांग रहे अपना मादरे वतन 

अपने ही देश में रिफ्यूजी बन कर रहने का दंश झेल रहे  कश्मीरी पंडित एक बार फिर मादरे वतन के लिए अपनी आवाज बुलंद करने में जुट गए हैं.शनिवार को फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कालोनी, और पुनवर्सन की मांग कर उनकी आवाज को नया हौसला दे दिया है.अनुपम खेर खुद कश्मीरी पंडित हैं, उनकी पत्नी फिलहाल भाजपा की सांसद हैं. ऐसे में अनुपम खेर की मांग केन्द्र की भाजपा नित मोदी सरकार तक जाएगी ऐसा संकेत मिल रहा है. वे तो यहां तक कह गए कि कश्मीर से धारा 370 को हटाए बिना वादी का भला नहीं हो सकता. खेर धारा 370 को कश्मीर के विकास में बड़ी बाधा मानते हैं, जिससे कश्मीरी पंडितों को अपना वतन छोड़ कर आतंकी नासूर के कारण पलायन करना पड़ रहा है. 2015 के जुलाई माह में झमाझम बरसात के दौरान नवी मुंंबई के शिवाजी चौक पर धरना प्रदर्शन कर कुछ कश्मीरी पंडितों ने  केन्द्र सरकार से अपनी वतन वापसी का इंतजाम करने की मांग की थी. वे कहते हैं कि  जिस कश्मीर को खून से सींचा, वह कश्मीर हमारा है, हम होमलैंड लेकर रहेंगे . हम अपना होमलैंड छीन के रहेंगे. नारा भी गूंजता है कि मर के लेंगे होमलैंड, मार के लेंगे होमलैंड . कश्मीरी पंडित मानते हैं कि  अलगाववादी नेता यासिन मलिक तथा गिलानी को फांसी देकर कश्मीर को आजाद किया जा सकता है क्योंकि यही लोग कश्मीरी पंडितों का खून बहाने के लिए आतंकियों को उकसा रहे हैं. कश्मीरी पंडित एसोएिसशन एवं पणून कश्मीर संस्था के  महासचिव अश्विनी भट्ट ने कहा कि पिछले 25 सालों से 7 लाख से अधिक कश्मीरी पंडित अपने मादरे वतन से बिछड़े हैं. हमें वतन वापसी करनी है, लेकिन वहां अलगाववादी हुरियत नेताओं एवं राष्ट्रविरोधी लोगों ने कश्मीरी पंडितों के लिए मुसीबत खड़ी कर रखी है.
अपने ही वतन में हैं पराए कश्मीरी पंडित 
प्रदर्शनकारी कश्मीरी पंडितों ने कहा कि हम अपने ही प्रांत में दर-बदर हैं.  केन्द्र की मोदी सरकार ने हमारा वतन दिलाने का वादा किया था लेकिन पीडीपी के नेतृत्व वाली सरकार के कुछ नेताओं एवं राष्ट्रविरोधी ताकतों ने उसमें अडंगा लगा दिया है. यासिन मलिक तथा गिलानी को कश्मीर का दुश्मन बताते हुए अश्विनी भट्ट ने कहा कि वे कहते हैं कि कश्मीरी पंडित आएंगे तो वहां की जमीनों पर कब्जा कर लेंगे. जबकि सच्चाई ये है कि कश्मीर को हमने अपना खून पसीना लगाकर सींचा है, वो हमारी जमीन है. उस पर कब्जा जमाने का सवाल कहां से आया.  एक अन्य पदाधिकारी अनिल टीकू ने कहा, पहले जो मुस्लिम हमारे खेतों में मजदूरी करते थे, आज वे हमारी जमीनों के मालिक बन कर बैठ गए हैं , और हम लाखों कश्मीरी पंडित बेवतन होकर भटक रहे हैं. 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

साहित्यकारों, चलो दादरी जाकर आंसू पोछते हैं...


दादरी का दर्द ना जाने कोय
पुरस्कार लौटाने से क्या होगा यारों...

महज एक झूठी अफवाह के बाद दादरी में अखलाख की हत्या और उसके बाद फैली हिंसा हमारे सामाजिक सौहार्द्र पर गहरी चोट है.इस पर राजनीतिक रोटी सेंकनाए उससे भी ज्यादा दुखद है, लेकिन सबसे बड़ा दुखद पहलू 24 साहित्यकारों द्वारा अकादमी पुरस्कारों को लौटाने के रुप में सामने आया है. ये वे कलमकार हैं जो अपनी लेखनी से समाज को अमन और इंसानियत का पाठ पढ़ाते आए थे लेकिन आज अचानक बागी हो गए हैं. महज इसलिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने अखलाक की मौत और जलती दादरी पर क्यों नहीं बोला. हल्ला तो ये भी मचाया जा रहा है कि देश का सामाजिक सौहार्द्र खतरे में है. हालात अराजक हो गए हैं. परोक्ष तौर पर सबका संकेत मोदी सरकार की ओर है. पद्मश्री लौटाने वाली मशहूर पंजाबी लेखिका दलीप कौर तिवाना ने बयान में कहा है कि गुरुनानक  देव और गौतम बुद्ध की इस धरती पर 1984 में सिखों के साथ और हाल में मुसलमानों के साथ बढ़ती सांप्रदायिकता के कारण हो रहे अत्याचार समाज और देश के लिए शर्मनाक हैं.सच और न्याय के लिए खड़े होने वालों की हत्या हमें ईश्वर और दुनिया के सामने शर्मसार कर रहे हैं.दूसरे  कलमकारों ने भी कुछ ऐसे ही बयान दिए हैं,उनके बयान साहित्यिक या सामाजिक नहीं लगते.उनमें कहीं भी अखलाख,दादरी और समाज के प्रति संवेदना नहीं दिखती.बस वे दूसरों पर दोषारोपण का धर्म निभाने को लालायित दिखते हैं.जरुरी तो ये था वे खुद दादरी जाते,जहां वारदात के बाद नेताओं ने राजनीति की आग भड़कायी थी,वहां सौहार्द्र का पानी उड़ेल आते.सद्भावना का मरहम लगा आते.पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लेख और खत लिखते.शांति.सद्भावना की अपील करते ताकि हिंसा व साम्प्रदायिकता का जहर न फैले,लेकिन किसी ने भी ऐसा नहीं किया.सब धधक रही नफरत की आग में घी झोंक रहे हैं.सरकार की चुप्पी का नाम लेकर ठंडे हो रहे माहौल को राजनीतिक आंच से तपाने की कोशिश कर रहे हैं. जाहिर है सरकार के विरोध वाली कांग्रेस.सपा आदि पार्टियां अखलाक के साथ पुरस्कार लौटाने के नए मुद्दे पर भी हो हल्ला मचाएंगी और वे खुद को देश का असली संरक्षक और हमदर्द दिखाने की कोशिष करेंगी.ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या साहित्यकारों को धर्म केवल काल्पनिक कहानियों में ही सौहार्द्र दिखाना है.  अथवा केवल लेख और उपन्यासी कथाओं के जरिए ही राष्ट्रीयता का भोपू बजाने से उनका फर्ज पूरा हो जाता है. अगर साहित्य का मतलब समाज के हित से है तो वे उस हित को प्रत्यक्ष साधने की जिम्मेदारी क्यों नहीं उठा रहे. मुझे उन महान साहित्यकारों की  मानसिकता पर कोफ़्त हो रही है जो समझने लगे हैं कि उन्होंने अकादमी पुरस्कार लौटा कर बहुत बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य निभा दिया है. आखिर क्यों वे कानून व्यवस्था और जांच प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर किसी नेता, सरकार या समाज को दोषी ठहराने पर आमादा हैं. तिवाना को याद होना चाहिए कि अखलाक की हत्या सच और न्याय के लिए आवाज उठाने के कारण नहीं बल्कि एक झूठी अफवाह के कारण हूई. इसका फायदा कौन लोग उठा रहे हैं यह भी देखने वाली बात है. पुलिस ने कार्रवाई की. राज्य और केन्द्र की दोनों सरकारें इसे लेकर गंभीर भी दिखती हैं. ऐसे में एक वारदात के लिए पूरे देश में साम्प्रदायिक माहौल का हल्ला उड़ाना कितना जायज है. क्या पाकिस्तान, बंग्लादेश तथा अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में भारत के हालात वाकई इतने खराब हैं कि बड़े.बड़े साहित्यकार भी आजम खान की भाषा बोलने लगें. क्या ऐसा कहकर देश के सौहार्द्र को और बिगाड़ने तथा राजनीतिक द्वंद को हवा देने का काम नहीं किया जा रहा जबकि 60 सालों बाद देश एक अलग आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने को प्रतिबद्ध दिख रहा है. साहित्यकारों को चाहिए कि वे दादरी जाएं और उन उजड़े और लहुलुहान घरों में विश्वास का आसरा जगांए. प्यार और शांति का सद्भावना का माहौल बनाएं ताकि फिर कोई अखलाक न मरे.कुछ ऐसा करें जिससे  भयभीत परिवारों की जिन्दगी दुबारा पटरी पर लौट सके. मैं तो यही कहता हूं कि पुरस्कार लौटाने से क्या होगा साहित्यकारों, चलो दादरी जाकर पीड़ितों के आंसू पोछ कर आते हैं. आखिर अपुन का भी तो कुछ  फर्ज बनता है भाई....



सोमवार, 27 अप्रैल 2015

अनपढ़ नगरसेवक लिखेंगे नवी मुंबई की तकदीर


8 वीं से कम पढ़े हैं 31 नगरसेवक
7 नगरसेवकों को नहीं आती अंग्रेजी

सुधीर शर्मा
नवी मुंबई. सेटेलाइट सिटी नवी मुंबई में 23 अप्रैल को चुनकर आए 111 नगरसेवकों में से 50 फीसदी नगरसेवक 10वीं से कम पढ़े लिखे हैं. सूत्रों की मानें तो इन्हें इन्टरनेट एवं कम्प्यूटर चलाना भी नहीं आता ऐसे में आधुनिक बन रहे शहर में योजनाओं को लेकर ये कितना प्रभावी काम कर पाएंगे इस पर सवाल खड़े होने लगे हैं. बता दें कि  विजेता बने 31 नगरसेवक महज 8वीं से भी कम पढ़े लिखे हैं. एडीआर के आकलन के अनुसार जिन नगरसेवकों को जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना है उनमें से 40 प्रतिशत नगरसेवकों को ठीक से अंग्रेजी पढऩा-लिखना भी नहीं आता.
7 नगरसेवकों को पढऩे लिखने में मुश्किल
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 11 नगरसेवक केवल 5वीं तक पढ़े हैं, जबकि 7 नगरसेवक ऐसे हैं जो सामान्य तौर पर लिखने-पढऩे के अलावा कुछ भी नहीं जानते . 13 नगरसेवक महज 8 वीं पास हैं, वहीं 10वीं पास के नगरसेवकों की संख्या सबसे ज्यादा 25 है. 12 वीं पास नगरसेवकों की संंख्या 19 है जबकि  ग्रेजुएट के 16, पोस्ट ग्रेजुएट 6 एवं ग्रेजुएट प्रोफेशनल 4 को मिलाकर कुल 26 नगरसेवक उच्च शिक्षा प्राप्त हैं.  वहीं बेलापुर वार्ड नंबर 104 से राकां के टिकट पर चुने गए जयाजी नाथ अकेले डाक्टरेट नगरसेवक हैं. 3 नगरसेवकों ने अपने शिक्षण की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करायी है.
21 नगरसेवक 30 साल से कम 
कुल 105 नगरसेवकों पर किए गए आकलन के अनुसार 21 नगरसेवक 1 से 30 साल आयुवर्ग के अंदर के हैं. इनमें 7 नगरसेवक 25 आयु वर्ग से कम जबकि 14 नगरसेवक 25 से 30 साल के बीच के हैं. वहीं चुने गए नगरसेवकों में 31 से 40 आयुवर्ग के बीच के 26, वहीं 51 से 60 साल उम्र के 18 जबकि  61 से 70 वर्ष आयुवर्ग के एक नगरसेवक का समावेश है. सर्वाधिक 39 नगरसेवक युवा वर्ग यानी 41 से 50 आयु वर्ग के चुने गए हैं.जो महानगर पालिका में जनता के मुद्दों पर अपनी राय रखेंगे.बता दें कि यह आकलन 111 नगरसेवकों में से केवल 105 में किया गया था. बाकी 6 नगरसेवकों की उम्र आदि का परीक्षण इस आकलन में शामिल नहीं है. अपराधिक छवि वाले चुनकर आए 17 नगरसेवकों में से 2 के खिलाफ सामान्य जबकि 13 के खिलाफ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं. इनमें एनसीपी के 8,  शिवसेना के 3, वहीं भाजपा के 2 नगरसेवकों का नाम शामिल है.
62 नगरसेवक बनी महिलाएं 
नवी मुंबई महानगर पालिका चुनाव 2015 में इस बार 50 फीसदी यानी कुल 56 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं. इसके अलावा भी 6 सीटों पर महिलाओं ने शानदार जीत हासिल कर 111 वार्डों वाले मनपा में 62 के साथ पहले नंबर पर पहुंच गयी हैं. इनमें एनसीपी के 51 नगरसेवकों में से 32 महिलाएं, शिवसेना के 38 में 14 महिलाएं, कांग्रेस के 10 में से 9 महिलाएं जबकि भाजपा के 6 में से 3 महिलाएं एवं निर्दलीयों के 5 में से 4 महिलाएं भारी मतों से जीतने में सफल रही हैं. 

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

हत्या और अपहरणकर्ताओं के सहारे शहर का विकास


मनपा के 53 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले 
सुधीर शर्मा
नवी मुंबई,रा.सं. 22 अप्रैल को होने वाले मनपा के चुनावी महासंग्राम में 568 में से कुल 201 उम्मीदवार करोड़पति पाए गए हैं.वहीं 53 उम्मीदवार अपराधिक छवि वाले पाए गए हैं. इनमें से 13 के खिलाफ सामान्य जबकि 40 के खिलाफ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं. नामांकन के समय निर्वाचन विभाग को दिए गए प्रतिज्ञापत्र में खुद प्रत्याशियों ने अपने उपर दर्ज आपराधिक मामलों का खुलासा किया है. इनमें एनसीपी के 12, कांग्रेस के 11, शिवसेना के 7, वहीं भाजपा के 4 प्रत्याशियों के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास एवं अपहरण तथा सामाजिक सद्भाव बिगाडऩे के गंभीर मामले दाखिल हैं. हालांकि कई मामलों पर फैसला हो चुका है जबकि कई विचाराधीन हैं. ताज्जुब की बात है कि निर्वाचन विभाग सुधारों के तहत 3 से अधिक बच्चों वाले लोगों के चुनाव लडऩे की पाबंदी लगा चुका है, जबकि आपराधिक छवि वाले लोग आज भी खुलेआम चुनावों मे हिस्सा ले रहे हैं. रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि नए दौैर में वे लोग चुनाव में सबसे ज्यादा हिस्सा ले रहे हैं जो या तो अमीर हैं या दबंग अथवा आपराधिक छवि वाले हैं.बहरहाल लोकतंत्र की अदालत में जनता इन 40 फीसदी प्रत्याशियों के क्रिमीनल बैकग्राऊंड पर क्या फैसला लेती है देखना होगा.
201 मनपा उम्मीदवार करोड़पति
चुनाव लोकतंत्र की मजबूती का आधार हैं. हालांकि बढ़ते चुनावी खर्च, धन बल और बाहुबल का इस्तेमाल होने लगा है. सामान्य लोग इससे दूर हटते जा रहे हैं. ऐसे में राजनीति को कमाई का हथियार बनाने वाले प्रत्याशियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है.अधिकांश पैसे वाले लोग ही चुनाव में बतौर प्रत्याशी एक दूसरे से लड़ रहे हैं. बता दें कि 537 उम्मीदवारों में से कुल 37 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति हैं. निर्वाचन विभाग में जमा दस्तावेजों के अनुसार सबसे ज्यादा 59 करोड़पति उम्मीदवार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के हैं. इनकी औसतन संपत्ति 3.29 करोड़ की है. वहीं करोड़पति उम्मीदवारों की सूचि में शिवसेना के 38 के पास 4.20 करोड़, कांग्रेस के 27 के पास 4.21 करोड़, भाजपा के 24 के पास 3.51 करोड़ जबकि शेकाप के 33 में से 4 प्रत्याशियों की सकल संपत्ति करोड़ों के पार है. 172 निर्दलीयों में भी 48 प्रत्याशियों की संपत्ति 3 करोड़ के उपर है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्मस (एडीआर) एवं महाराष्ट्र इलेक्शन वॉच का यह आकलन नवी मुंबई के 568 में से 537 प्रत्याशियों के दस्तावेजों का विश्लेषण करने के पश्चात तैयार किया गया है.
संतोष शेट्टी नवी मुंबई के सबसे अमीर प्रत्याशी
आकलन रिपोर्ट के मुताबिक नेरुल प्रभाग 100 के कांग्रेस प्रत्याशी संतोष देवप्पा शेट्टी एवं उनकी पत्नी अनीता संतोष शेट्टी नवी मुंबई के सर्बाधिक अमीर उम्मीदवारों में शामिल हैं. संतोष शेट्टी के पास 110 करोड़ से अधिक की सकल संपत्ति है तो उनकी बीबी 110 करोड़ के साथ ही उनकी बराबरी में खड़ी हैं. इन दोंनों के पास कुल मिलाकर 220 करोड़ की संपत्ति है.  नेरुल के ही दीलीपराव तिड़के 63 करोड़ की सकल संपत्ति के साथ दूसरे नंबर पर हैं. वहीं 45.39 करोड़ के साथ शिवसेना के किशोर पाटकर चौथे नंबर पर और राकां की नेत्रा आशीष शिर्के 40 करोड़ की संपत्ति के साथ पांचवे नंबर पर हैं. आकलन के अनुसार कुल 37 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति प्रत्याशियों की सूचि में शामिल हैं. पार्टीनुसार 62 फीसदी शिवसेना में, 59 फीसदी राकां के जबकि 57 फीसदी बीजेपी के प्रत्याशी अमीर हैं.लायबिलिटीज के मामले में भी कांग्रेस के संतोष देवप्पा शेट्टी 8 करोड़ के साथ नंबर एक पर, भाजपा के रामचंद्र घरत 4 करोड़ के साथ दूसरे स्थान पर वहीं कांग्रेस की सुदर्शना अनिल कौशिक 2.92 करोड़ के साथ तीसरे स्थान पर हैं. प्रत्येक प्रत्याशी की औसतन संपत्ति तकरीबन 2.51 करोड़ है.

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

कांग्रेस का हाथ छोड़ शिवसेना के तीर धनुष के साथ

                                                               

नवी मुंबई के पाच नगरसेवको का शिवसेना में प्रवेश 
1) शिवराम पाटील ( राकांपा)
२) अनिता पाटील ( राकांपा)
३) विलास भोईर ( कांग्रेस)
४) रंगनाथ आवटी ( कांग्रेस)
५) रामाशेठ वाघमारे ( कांग्रेस)
६) अरविंद नाईक ( कांग्रेस - शिक्षण समिती सदस्य)
७) अंकुश सोनावणे ( कांग्रेस नगरसेविका पति )

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

नवभारत कार्यालय में ऐरोली के युवा विधायक श्री संदीपजी नाईक

ऐरोली के युवा विधायक  श्री संदीपजी नाईक ने 
मंगलवार को सुबह ठीक ११.०० बजे वादे  के मुताबिक नवभारत कार्यालय में सदिच्छा भेंट  दी.बतौर राजनीतिक प्रतिनिधि उनके स्वागत के बाद की तस्वीर।। बात-चीत में उनकी 
परिपक्वता ,जनता और समाज को समझने की परख, बदले हालात  में स्वयं की जिम्मेदारी का एहसास उनमे साफ़ नजर आया.नाईक परिवार में अलग छवि तैयार करते 
हुए जरुरत पड़ने पर प्रखर विरोध की 
मनसा भी दिखी।विजन और धैर्य दोनों साथ-साथ । काबिले तारीफ।।