शनिवार, 2 जनवरी 2016

दीवारों पर बस कैलेन्डर बदला बदला है

शाम वही थी, सुबह वही, नया-नया क्या है
दीवारों पर बस कैलेन्डर बदला बदला है

उजड़ी गली, उबलती नाली, कच्चे-कच्चे घर
कितना हुआ विकास लिखा है केवल पोस्टर पर
पोखर नायक के चरित्र सा गंदला गंदला है..
दीवारों पर बस कैलेंडर बदला बदला है..

दुनिया वही, और वही है दुनियादारी भी
सुखदुख वही,वही जीवन की मारामारी भी
लूटपाट, चोरी मक्कारी धोखा घपला है
दीवारों पर बस कैलेंडर बदला बदला है...

शाम खुशी लाया खरीदकर ओढ़-ओढ़ कर जी
किंतु सुबह ने शबनम सी चादर समेट रख दी
सजा प्लास्टिक के फूलों से हर इक गमला है..
दीवारों पर बस कैलेंडर बदला बदला है

भारतीयों, निष्क्रिय लोकतंत्र की नींद से जागो

 कलाम के जरिए सुकरात ने भेजा संदेश
         
फोटो-गूगल से साभार

दुनिया में कुछ ऐसे लोग आए हैं जिन्होंने अपने विचारों और कार्यो से समाज को नयी दिशा और नयी चेतना दी है. जीने का नया रास्ता दिखाया. नयी सोंच के जरिए चीजों को नयी पहचान और परिभाषा दी. लोग पहले उन पर हंसते और तंज कसते थे लेकिन अब उनमें से कई लोग पूजे जाते हैं. दोस्तों उनमें से कईयों के नाम आप भी जानते हैं...बापू, गौतम, कबीर, सुकरात, मोहम्मद, ईसा आदि आदि आदि..एक विशेष इंटरव्यू में देश के पूर्व राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम से सवाल किया गया था कि यदि वे दिवंगत  दार्शनिक सुकरात से मिलेंगे तो उनसे क्या पूछना चाहेंगे.कलाम का जवाब था -

   भारत में अलग-अलग मतों और जातियों वाला 100 करोड़ से अधिक लोगों का लोकतंत्र है. इनमें से लाखों लोग संसद और विधायिका में चुने जाने के तरीके में माहिर हो चुके हैं. उन्होंने सत्ता में सदैव बने रहने का तंत्र भी विकसित कर लिया है. इनमें देश के सामान्य लोगों के  जीवन में किसी वास्तविक बदलाव की अपेक्षा सत्ता की पुर्नप्राप्ति से ज्यादा लगाव हो गया है. जबकि साधारण लोगों के पास इस दायरे को तोडऩे का कोई विकल्प नहीं है. आम लोग अपने परिवारों के लिए दो वक्त का भोजन जुटाने में मशरूफ हैं. इसलिए वे बगावत का झंडा उठाने में कमजोर और दब्बू हैं. निराशावाद ने उनके दिमाग को कुंठित कर दिया है. मुझे क्या करना चाहिए?
मिसाइल मैन कलाम ने सुकरात के हवाले से जवाब भी दिया..
-सुकरात मुझसे कहेंगे-जाओ और भारत के नौजवानों को बताओ कि वे सामाजिक सामंजस्य के साथ विकसित देश में रहने का विजन पैदा करें.  दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र के प्रबुद्ध नागरिक के तौर पर उठ खड़े हों. स्वार्थी शासक वर्ग की गुलामी से बाहर निकलें, निष्क्रिय लोकतंत्र की नींद से जागें. विकसित राष्ट्र के रुप में भारत की नियति के आविर्भाव की दिशा में आगे बढ़ें और हिन्दुस्तान के वैभव और सौभाग्य को मूर्त रुप देने का उत्तरदायित्व निभाएं.

म मीडिया इन्टेलिजेंस नेटवर्क के माध्यम से सुकरात का यही संदेश आप सब तक पहुचाना चाहते हैं .आप को बताना चाहते हैं कि बस अब बहुत हो गया. उठिए और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने अपने सक्रिय और सकारात्मक योगदान में जुट जाइए. सावधान,क्योंकि आप का अपना देश भारत सम्प्रभुता और सुरक्षा के एक अदृश्य संकट से गुजर रहा है. इस संकट को दूर करने आप को सिपाही बनकर लडऩा है. हालात को ठीक करने का बीड़ा उठाना है. अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करनी है. मनमानी पर सवाल पूछना है. खोया हुआ हक मांगना है. मैं आह्वान करता हूं कि अब बैठें नहीं निकल पड़ो राष्ट्रचेतना के अभियान में मीडिया इन्टेलिजेंस के साथ, अपने यार-दोस्तों के साथ चमन के लिए -मादरे वतन के लिए..........

ऐसा मत सोंचो कि आप के एक अकेले करने से क्या होगा. बापू अहिंसा के मार्ग पर अकेले चले. मोहम्मद साहब ने नेकी के लिए अकेले कदम बढाया.  बाबा साहब आंबेडकर ने छुआछूत के खिलाफ अकेले लड़ाई शूरु की. फिर लोग आते गए और कारवां बढ़ता गया. उनमें और हममें सिर्फ एक अंतर है. उनमें हौसला था लडऩे का, आवाज उठाने का. उनमें हौसला था कुछ नया और बेहतर करने का. उन्होंने अपने हौसले पर संघर्ष किया. आप भी अपने हौसले को आजमा कर देखो. चमत्कार होने लगेगा. हौसले का सिर्फ एक दिया जलाकर तो देखो, चारो ओर रोशनी हो उठेगी. क्योंकि आप को देखकर कई और भी लोग होंगे जो अपने हौसले का दीया जलाएंगे. यकीन मानिए जैसे दिवाली में आप किसी को बोलने नहीं जाते कि छत पर दीया जला देना क्योंकि दिवाली हैं. फिर भी सब अपनी मुंडेर पर दिया खुद जला देते हैं और फिर आप देखते हैं कि पूरा मुहल्ला और पूरा शहर दिवाली की रोशनी में नहा जाता है.  मेरे कहने से एक बार हौसले का दिया जलाकर देखिए आप के आस-पास चारो ओर निर्भयता का उजियारा फैल जाएगा. जैसे ही हौसले का दिया जलेगा, मन में कुंठा और निराशा का जो अंधेरा भरा है वह छंट जाएगा. क्योंकि हौसले का दीया सिर्फ अंधेरा ही नहीं भगाता बल्कि आप को मजबूत भी करता है-आगे बढऩे के लिए, लडऩे के लिए, संकट और समस्याओं से मुकाबला करने के लिए. मीडिया इन्टेलिजेंस आप में हौसले का ऐसा ही दीया जलाने का एक प्रयास है. हम चाहते हैं कि आप भयभीत से निर्भीक बन जाएं. कमजोर से मजबूत बन जाएं. गंवार से होशियार बन जाएं. नागरिक से सिपाही बन जाएं...क्योंकि सिपाही केवल घर का नहीं होता, सिपाही तो वतन के लिए काम करता है. मुझे विश्वास है कि आज से आप ने मादरे वतन के लिए कुछ नया और बेहतर करने का संकल्प ले लिया है. मैं आपको इस साहसी अभियान की सफलता के लिए बधाई देता हूं..जयहिन्द. 

कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती

चश्मा उतारो, फिर देखो यारों

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे- बता तेरी रजा क्या है..यह से
गूगल से साभार
र अक्सर आप ने सुना होगा..मैं आप से कहता हूं कि एक बार इसे आजमा कर देखना..आप को अपने आप में एक ताकत का एहसास होने लगेगा. आप को लगेगा कि आप यूं ही इस दुनिया में नहीं आए हैं. आप के इस धरती पर आने के पीछे कोई खास मकसद है. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम अक्सर कहते थे कि मानव सभी प्राणियों से उत्कृष्ट है. तो फिर इस जीवन को जीने का तरीका भी उत्कृष्ट होगा. लेकिन हम इसे यूं ही गवां रहे हैं. आप कहेंगे कि क्या करें माहौल ऐसा है. तो फिर सवाल ये है कि आप उस माहौल को सुधारने-सवांरने के लिए कोई पहल क्यों नहीं करते . आप को नहीं लगता कि गलत और अपराधमय माहौल समाज के लिए, नयी पीढ़ी के लिए बड़ा खतरा है. ज्यादा कमाने और पाने की लालसा ही तो भ्रष्टाचार की ओर ले जाती है..यही लालसा हर क्षेत्र में बलवती होती जा रही.जाहिर है हमारे चारो तरफ जो घट रहा है, उस का असर हमारे रोज के जीवन पर पड़ता है. जैसे भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध और सामाजिक विकृतियां..अगर आप सोचते हैं कि इसे दूर करना आप का काम नहीं है तो इतना जरुर समझ लेना कि यही अनदेखी आप के बच्चों को बर्बाद करने के लिए काफी हो सकती है. लमहों ने खता की,सदियों ने सजा पाई ...क्यों कि बुराईयों के बीज भले ही हम न बोएं अगर हम उसे देखकर अनदेखी करते हैं तो वह एक दिन विषवेल बनकर हमारे युवा बच्चों को डंसने वाली है. तो वही बात हुई की गलती हम करें और नुकसान हमारी आने व?ली पीढ़ी उठाए. आप को नहीं लगता कि एक अपराध आप ने भी कर दिया है. शायद आप जैसे लोगों ने..तो क्या इसके समाधान के लिए आप को प्रयास नहीं करना चाहिए..जरुर, लेकिन इन मसलों को लेकर आप का नजरिया कुछ और होता है. क्योंकि आप सोंचते हैं कि यह काम मेरा या हमारा नहीं है.
सच्चाई ये है कि आप की आखों पर कायरता का चश्मा चढ़ा है. वाह्य परंपराओं का चश्मा चढ़ा है. इसलिए गंभीर समस्याएं भी आप को कुछ और दिखती हैं.आप अपराध और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर आप चीखते हुए नहीं थकते लेकिन जब उससे लडऩे या रोकने की बात आती है तब आप दूसरों की ओर देखने लगते हैं. ऐसा क्यों क्यों कि आप खुद से कुछ भी करना नहीं चाहते हैं. आखिर यह कब तक चलेगा. आप के इसी नजरिए का असर है कि जब आप के साथ कुछ बूरा होता है तभी आप को दुनिया में समस्याएं और संकट नजर आता है. आप जब घंटों राशन या बिजली बिल भरने के लिए कतार में खड़े होते हैं तो आप को तकलीफ होती है. आप इस पर सवाल उठाते हैं. शिकायत करते हंै. लेकिन जैसे ही आप का काम हो जाता है. आप इस ओर देखने की जरुरत नहीं समझते. तो अगर स्थितियों को बदलना है तो आपको अपनी आखों पर लगा वो चश्मा तो उतारना पड़ेगा.

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

नवी मुंबई में अवैध विदेशियों से बढ़ा खतरा

सर्वेक्षण दे रहे खतरे का अल्टीमेटम
अवैध वास्तव्य से सुरक्षा का खतरा

नवी मुंबई, सानपाड़ा की गुनीना बिल्डिंग में पकड़ा गया डेविड कोलमैन हेडली और ट्रेन ब्लास्ट का आरोपी का घणसोली से पकड़ा जाना इस बात के संकेत है कि नवी मुंबई अपराधियों के लिए सबसे सुरक्षित शरणगाह रही है.वर्तमान में तकरीबन 2000 विदेशी नागरिकों के अवैध वास्तव्य ने सुरक्षा को लेकर पुलिस के कान खड़े कर दिए हैं. सतर्कता संगठन मीडिया इन्टेलीजेंस नेटवर्क ने इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को खत लिखकर जांच और कार्रवाई की मांग की है. मीडिया इन्टेलीजेंस के सर्वेक्षण में विदेशी नागरिकों के अवैध वास्तव्य एवं उनके संदिग्ध क्रियाकलापों से जुड़े कई गंभीर तथ्य सामने आए हैं जो नवी मुंबई सहित राज्य की सुरक्षा के लिहाज से भी खतरे की घंटी हैं.

1-मीडिया इन्टेलिजेस नेटवर्क के आंकलन में इन विदेशियों के रहन-सहन एवं संदिग्ध क्रियाकलापों से जुड़े जो तथ्य सामने आए हैं वे शहर एवं देश की सुरक्षा और शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं. एपीएमसी, नेरुल, वाशी एवं कोपरखेरणे तथा बेलापुर पुलिस स्टेशनों में इनके अवैध कारनामों और बिना वीजा रहने के गंभीर मामले भी दर्ज हैं.
2- आशंका है कि ये देश की सुरक्षा से जुड़े स्थानों की रेकी या अन्य आतंकी गतिविधियों के लिए सूचना देने या अन्य जासूसी कार्यो में स्लीपर सेल की तरह भूमिका निभाते होंगे. शहर में रहने वाले अधिकांश विदेशी एक्सपायर्ड वीजा एवं पासपोर्ट पर नवी मुंबई में रह रहे हैं, जो संवैधाकि तौर पर अवैध है. उन्हें उनके देश भेज देने (डिपोर्ट) की कार्रवाई की जरुरत है.  
3-नवी मुंबई पुलिस के संबंधित पुलिस स्टेशनों द्वारा ऐसे विदेशी नागरिकों की निगरानी या मॉनिटरिंग के लिए कोई भी प्रभावी सिस्टम नहीं है, ताकि उनकी विजा वैधता, निवास और कामकाज के विस्तृत ब्यौरे का नियमित आकलन किया जा सके. ऐसी लापरवाही गंभीर खतरों की चेतावनी है.
4-तकरीबन 65 फीसदी से अधिक यूरोपियन, नाइजीरियन नागरिक जिस भाड़े के मकान या इमारतों में निवास करते हैं. उनके लिए घर-मकान भाड़े पर देते समय स्थानीय पुलिस थाने से एनओसी नहीं ली जाती है.अधिकांश मकान, फ्लैट मालिकों ने बिना पुलिस एनओसी के ही मोटा एवं मनमाना भाड़ा वसूलने की लालच में अपने मकानों या कमरों को इन विदेशियों को भाड़े पर दे देते हैं, जो चिंतनीय और गैर कानूनी है.  
5-सायबर क्राइम ,स्मगलिंग, फेक करेंसी और सेक्स रैकेट जैसी गतिविधियों में कई विदेशी नागरिकों का नाम के आने के बाद नवी मुंबई पुलिस इनके वास्तव्य, कामकाज, कारोबार, विजा एवं पासपोर्ट आदि की जांच को लेकर गंभीर नहीं है जिसे लेकर विशेष निर्देश की जरुरत है. 

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

मॅनी के लिए मेहनत करते मासूम

एक गाना याद आता है नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है,जवाब है, मुट्ठी में है तकदीर तुम्हारी..इस गाने से उलट शहर के गली-मुहल्लों में कचरा चुनते और भीख मांगते कुछ बच्चों को देखकर सवाल उठता है कि अगर मुट्टी में तकदीर है तो फिर देश के इन नौनिहालों को खेलने की उम्र में जीने के लिए यूं मशक्कत क्यों करनी पड़ रही...नेरुल का मोनू, सानपाड़ा की रोशनी और वाशी सिग्नल का छोटू, सब बेहाल हैं. ये वो मासूम हैं जिनके नाम भले अलग हैं लेकिन हालात एक जैसे. पुर्व प्रधानमंत्री चाचा नेहरू बच्चों को देश का भविष्य मानते थे. लेकिन आज इस देश में छोटू व मोनू जैसे न जाने कितने ही नौनिहाल हैं जो घर की गरीबी, पेट की भूख और बेबशी के लिए अपने भविष्य को बेचने के लिए मजबूर हैं. देश के कानून और कल्याण योजनाओं से अछूते. अपनी मजबूरी में, मुफलिसी में, बेबस मां-बाप और परिवार के साथ. ये दिन रात मेहनत करते हैं ताकि अंधेर रातों में घर का चूल्हा जल सके.


पढ़ लिया तो धंधे पर जाओ

CHHOTU (SIRAJ)

 अब जरा इस छोटू से मिल लिजिए. 13 साल का छोटू नेरूल के  मनपा स्कूल में पढ़ाई करता है, दूसरे बच्चों की तरह खेल-कूद, मौज-मस्ती उसे भी पसंद है लेकिन आर्थिक तंगी में कई भाई-बहनों की परवरिश कर रहे पिता शरीफ के लिए वह छोटे हाथ वाला मदद का मसीहा है. स्कू ल से लौटने पर बस्ता रखने के बाद संध्या पाली को घर लौटने वाले छात्रों के लिए स्कूल के पास कैन्डी बेचना उसका रोज का धंधा है. छोटू रुआंसा हो बतलाता है कि स्कूल से आने के बाद उसका बाप कहता है पढ़ के आ गया अब धंधे पे निकल जा...खेलने की चाहत और न जाने की मनसा के बावजूद भी परिजनों की परवरिश कर रहे बाप का फरमान मानकर निकलना उसकी मजबूरी है. भाड़े की खोली में मां-बाप का बनाया कैन्डी का पैकेट लिए  वह कभी नेरूल, शिरवणे तो कभी वाशी या सानपाड़ा के स्कूल-उद्यानों और गली-मुहल्लों की खाक छानता है.

रोटी के लिए भटकना पड़ता है साब!

          जमीन से 15 फूट उपर पतली रस्सी पर एक पांव पर झूलती हुई रोशनी किसी स्कूल में नहीं जाती लेकिन लोहे की रिंग और रस्सियों पर सर्कस का खेल दिखाकर अपने परिवार के लिए रोज सौ-दो सौ कमा लेती है. स्कूल क्यों नहीं जाती, इस सवाल पर वो खामोश हो जाती है लेकिन उसका बाप भगीरथ बोलता है- साब गरीब हैं, काम नहीं करेंगे तो घर कैसे चलेगा. जीने के लिए पैसे नहीं फिर बच्चे कैसे पढ़ाएं.  6 साल के मोनू की कहानी भी इससे जुदा नहीं. मोनू इलाहाबाद के संगम तट पर प्लास्टिक के  डिब्बे बेचते हुए मिला था. उसे पाठशाला का नहीं पता. ठीक से अपना नाम भी नहीं बोल पाता लेकिन यहां गंगा घाट पर पाप धोने आने वालों से कहता है-डिब्बा ले लो भाई, गंगा जल भर लेना. महीनों तक चले आस्था के महामेले में वह भीख नहीं मांगा  बल्कि मनी के लिए मेहनत करता रहा. हालांकि उससे अलग शहर की सड़कों पर ऐसे कितने ही मोनू रोज दिखते हैं जो हथेलियों पर 1-2 रूपए पाने भीख मांगते हैं,आने-जाने वाली गाडिय़ों का शीशा पोछते हैं. भूखे पेट को भरने के लिए मदद  की याचना करते हैं. नंगे बदन , फटे-फुटे चिथड़े में..ये आने वाले भारत के भविष्य हैं.....
आधा दिन: पूरे घर की कमाई
Kishan-Vishal-Rajesh
अब इन तीन और स्कूली बच्चों को भी देख लीजिये। ये हैं राजेश, किशन और विशाल। तीनों महानगर पालिका विद्यालय में पढ़ते हैं. स्कूल से निकलने के बाद घर आते-आते 12- से एक बज  जाते हैं.  आधे दिन के  बाद  इनकी जिन्दगी की असली जद्दोजहद शुरू होती है.  दोपहर बाद एपीएमसी मार्केट में आते हैं. बड़े व्यापारियों के यहाँ से सस्ती सब्जियां और फल चुनते हैं. एक साथ बजार के सामने दुकान लगाते  हैं. माल बिका तो 100 से 200 रूपए कमा लेते हैं.  स्कूल ड्रेस में धंधे का रोज यही वसूल चलता है. ये भी भीख नहीं मांगते , मेहनत करते हैं। आधे दिन में पूरे परिवार की कमाई का जरिया है, इनका कारोबार। सस्ता और बच्चा समझकर लोग फल सब्जियां खरीद लेते हैं. जिस पर परिवार की गाड़ी चलती है। नौनिहालों की यह  कहानी देश की  आजादी के ६५ साल बाद की है. बहरहाल रोशनी का सर्कस बड़े-बच्चों को खूब लुभाता है, छोटू की कैंडी सबको पसंद आती है, लेकिन इनके मेहनत के  पीछे  आधी सदी की आजादी का दिवालियापन, दिन-दिन भर भटकने का दर्द, मौज-मनोरंजन की बजाय मुफलिसी  और मजबूरी भी साफ झलकती है. कभी नजदीक से मनी के लिए मेहनत करते इन मासूमों से रुबरू होकर आप भी अंदाजा लगाइयेगा, तब शायद आपको भी हिन्दुस्तान की 67 सालों की स्वाधीनता पर कोफ्त आ जाए

मन कहे रुक जा रे रुक जा यहीं पे कहीं....


ये बात हवाओंं को बताए रखना, इस तिरंगे को अपने दिल में बसाए रखना..बेलापुर मनपा मुख्यालय के समीप से होकर पामबीच रोड से मुंबई-पुणे की ओर गुजरने वाले हर शख्स का दिल यहां से गुजरते हुए गुनगुनाने लगता है. रुक जा रे रुक जा दिल, तू मेरे यहीं, जो बात इस जगह है कहीं पे नहीं. सच में मन कहता है कुछ पलों के लिए यहीं ठहर जाएं, खड़े होकर खिंचवा लें एक तस्वीर ताकि यादगार बन जाए वह लम्हा कि हिन्दुस्तान के सबसे ऊंचे ध्वज स्तंभ पर तिरंगे को इतराते हुए देखा है. 225 फुट के ऊंचे ध्वज स्तंभ पर फहरते इस राष्ट्रीय ध्वज की लंबाई 70 फुट एवं चौड़ाई 50 फुट है.टेलीफैब्रिक क्लॉथ से निर्मित इस ध्वज का कुल वजन 40 किलोग्राम है.जी हां, मनपा मुख्यालय पर लहराता हुआ यही राष्ट्रध्वज नवी मुंबई की शान बन रहा है.
भर आती हैं आखें, उभर आता है देशप्रेम
 नवी मुंबई के बेलबूटे में सम्मान का यह नया सितारा है जिसे पूर्व सांसद संजीव नाईक ने जड़ा है. 19 फरवरी 2014 को तत्कालीन केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने इसका उद्घाटन करते हुए जब  ध्वजारोहण किया तब देशाभिमान से उनकी भी आंखें डबडबा गयी थी.यहां मौजूद हजारों लोगों के नैन भी राष्ट्रीय स्वाभिमान से छलक  उठे थे. उपर उठते झंडे के साथ मादरे-वतन को बुलंदियों पर देखने का अरमान भी ऊंचा उठता चला गया था. आज भी इसे देखकर स्वाधीनता के गर्व से सीना फूलता है.इस स्वाधीनता, संप्रभुता और उमड़ते राष्ट्रप्रेम का गवाह बन रही है नवी मुंबई. यह तिरंगा हजारों आगंतुकों के लिए प्रेरक बन रहा है. यकीनन आज जब भी इधर से गुजरेंगे, बुलंदियों पर इसे लहराते देख आप भी बरबश गुनगुना उठेंगे..विजयी विश्व तिरंगा प्यारा.झंडा ऊंचा रहे हमारा....

वतन वापसी के लिए छटपटा रहे कश्मीरी पंडित


 बुलंद हो रही कश्मीरी पंडितों की आ‍वाज
सरकार से मांग रहे अपना मादरे वतन 

अपने ही देश में रिफ्यूजी बन कर रहने का दंश झेल रहे  कश्मीरी पंडित एक बार फिर मादरे वतन के लिए अपनी आवाज बुलंद करने में जुट गए हैं.शनिवार को फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कालोनी, और पुनवर्सन की मांग कर उनकी आवाज को नया हौसला दे दिया है.अनुपम खेर खुद कश्मीरी पंडित हैं, उनकी पत्नी फिलहाल भाजपा की सांसद हैं. ऐसे में अनुपम खेर की मांग केन्द्र की भाजपा नित मोदी सरकार तक जाएगी ऐसा संकेत मिल रहा है. वे तो यहां तक कह गए कि कश्मीर से धारा 370 को हटाए बिना वादी का भला नहीं हो सकता. खेर धारा 370 को कश्मीर के विकास में बड़ी बाधा मानते हैं, जिससे कश्मीरी पंडितों को अपना वतन छोड़ कर आतंकी नासूर के कारण पलायन करना पड़ रहा है. 2015 के जुलाई माह में झमाझम बरसात के दौरान नवी मुंंबई के शिवाजी चौक पर धरना प्रदर्शन कर कुछ कश्मीरी पंडितों ने  केन्द्र सरकार से अपनी वतन वापसी का इंतजाम करने की मांग की थी. वे कहते हैं कि  जिस कश्मीर को खून से सींचा, वह कश्मीर हमारा है, हम होमलैंड लेकर रहेंगे . हम अपना होमलैंड छीन के रहेंगे. नारा भी गूंजता है कि मर के लेंगे होमलैंड, मार के लेंगे होमलैंड . कश्मीरी पंडित मानते हैं कि  अलगाववादी नेता यासिन मलिक तथा गिलानी को फांसी देकर कश्मीर को आजाद किया जा सकता है क्योंकि यही लोग कश्मीरी पंडितों का खून बहाने के लिए आतंकियों को उकसा रहे हैं. कश्मीरी पंडित एसोएिसशन एवं पणून कश्मीर संस्था के  महासचिव अश्विनी भट्ट ने कहा कि पिछले 25 सालों से 7 लाख से अधिक कश्मीरी पंडित अपने मादरे वतन से बिछड़े हैं. हमें वतन वापसी करनी है, लेकिन वहां अलगाववादी हुरियत नेताओं एवं राष्ट्रविरोधी लोगों ने कश्मीरी पंडितों के लिए मुसीबत खड़ी कर रखी है.
अपने ही वतन में हैं पराए कश्मीरी पंडित 
प्रदर्शनकारी कश्मीरी पंडितों ने कहा कि हम अपने ही प्रांत में दर-बदर हैं.  केन्द्र की मोदी सरकार ने हमारा वतन दिलाने का वादा किया था लेकिन पीडीपी के नेतृत्व वाली सरकार के कुछ नेताओं एवं राष्ट्रविरोधी ताकतों ने उसमें अडंगा लगा दिया है. यासिन मलिक तथा गिलानी को कश्मीर का दुश्मन बताते हुए अश्विनी भट्ट ने कहा कि वे कहते हैं कि कश्मीरी पंडित आएंगे तो वहां की जमीनों पर कब्जा कर लेंगे. जबकि सच्चाई ये है कि कश्मीर को हमने अपना खून पसीना लगाकर सींचा है, वो हमारी जमीन है. उस पर कब्जा जमाने का सवाल कहां से आया.  एक अन्य पदाधिकारी अनिल टीकू ने कहा, पहले जो मुस्लिम हमारे खेतों में मजदूरी करते थे, आज वे हमारी जमीनों के मालिक बन कर बैठ गए हैं , और हम लाखों कश्मीरी पंडित बेवतन होकर भटक रहे हैं. 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

साहित्यकारों, चलो दादरी जाकर आंसू पोछते हैं...


दादरी का दर्द ना जाने कोय
पुरस्कार लौटाने से क्या होगा यारों...

महज एक झूठी अफवाह के बाद दादरी में अखलाख की हत्या और उसके बाद फैली हिंसा हमारे सामाजिक सौहार्द्र पर गहरी चोट है.इस पर राजनीतिक रोटी सेंकनाए उससे भी ज्यादा दुखद है, लेकिन सबसे बड़ा दुखद पहलू 24 साहित्यकारों द्वारा अकादमी पुरस्कारों को लौटाने के रुप में सामने आया है. ये वे कलमकार हैं जो अपनी लेखनी से समाज को अमन और इंसानियत का पाठ पढ़ाते आए थे लेकिन आज अचानक बागी हो गए हैं. महज इसलिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने अखलाक की मौत और जलती दादरी पर क्यों नहीं बोला. हल्ला तो ये भी मचाया जा रहा है कि देश का सामाजिक सौहार्द्र खतरे में है. हालात अराजक हो गए हैं. परोक्ष तौर पर सबका संकेत मोदी सरकार की ओर है. पद्मश्री लौटाने वाली मशहूर पंजाबी लेखिका दलीप कौर तिवाना ने बयान में कहा है कि गुरुनानक  देव और गौतम बुद्ध की इस धरती पर 1984 में सिखों के साथ और हाल में मुसलमानों के साथ बढ़ती सांप्रदायिकता के कारण हो रहे अत्याचार समाज और देश के लिए शर्मनाक हैं.सच और न्याय के लिए खड़े होने वालों की हत्या हमें ईश्वर और दुनिया के सामने शर्मसार कर रहे हैं.दूसरे  कलमकारों ने भी कुछ ऐसे ही बयान दिए हैं,उनके बयान साहित्यिक या सामाजिक नहीं लगते.उनमें कहीं भी अखलाख,दादरी और समाज के प्रति संवेदना नहीं दिखती.बस वे दूसरों पर दोषारोपण का धर्म निभाने को लालायित दिखते हैं.जरुरी तो ये था वे खुद दादरी जाते,जहां वारदात के बाद नेताओं ने राजनीति की आग भड़कायी थी,वहां सौहार्द्र का पानी उड़ेल आते.सद्भावना का मरहम लगा आते.पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लेख और खत लिखते.शांति.सद्भावना की अपील करते ताकि हिंसा व साम्प्रदायिकता का जहर न फैले,लेकिन किसी ने भी ऐसा नहीं किया.सब धधक रही नफरत की आग में घी झोंक रहे हैं.सरकार की चुप्पी का नाम लेकर ठंडे हो रहे माहौल को राजनीतिक आंच से तपाने की कोशिश कर रहे हैं. जाहिर है सरकार के विरोध वाली कांग्रेस.सपा आदि पार्टियां अखलाक के साथ पुरस्कार लौटाने के नए मुद्दे पर भी हो हल्ला मचाएंगी और वे खुद को देश का असली संरक्षक और हमदर्द दिखाने की कोशिष करेंगी.ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या साहित्यकारों को धर्म केवल काल्पनिक कहानियों में ही सौहार्द्र दिखाना है.  अथवा केवल लेख और उपन्यासी कथाओं के जरिए ही राष्ट्रीयता का भोपू बजाने से उनका फर्ज पूरा हो जाता है. अगर साहित्य का मतलब समाज के हित से है तो वे उस हित को प्रत्यक्ष साधने की जिम्मेदारी क्यों नहीं उठा रहे. मुझे उन महान साहित्यकारों की  मानसिकता पर कोफ़्त हो रही है जो समझने लगे हैं कि उन्होंने अकादमी पुरस्कार लौटा कर बहुत बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य निभा दिया है. आखिर क्यों वे कानून व्यवस्था और जांच प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर किसी नेता, सरकार या समाज को दोषी ठहराने पर आमादा हैं. तिवाना को याद होना चाहिए कि अखलाक की हत्या सच और न्याय के लिए आवाज उठाने के कारण नहीं बल्कि एक झूठी अफवाह के कारण हूई. इसका फायदा कौन लोग उठा रहे हैं यह भी देखने वाली बात है. पुलिस ने कार्रवाई की. राज्य और केन्द्र की दोनों सरकारें इसे लेकर गंभीर भी दिखती हैं. ऐसे में एक वारदात के लिए पूरे देश में साम्प्रदायिक माहौल का हल्ला उड़ाना कितना जायज है. क्या पाकिस्तान, बंग्लादेश तथा अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में भारत के हालात वाकई इतने खराब हैं कि बड़े.बड़े साहित्यकार भी आजम खान की भाषा बोलने लगें. क्या ऐसा कहकर देश के सौहार्द्र को और बिगाड़ने तथा राजनीतिक द्वंद को हवा देने का काम नहीं किया जा रहा जबकि 60 सालों बाद देश एक अलग आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने को प्रतिबद्ध दिख रहा है. साहित्यकारों को चाहिए कि वे दादरी जाएं और उन उजड़े और लहुलुहान घरों में विश्वास का आसरा जगांए. प्यार और शांति का सद्भावना का माहौल बनाएं ताकि फिर कोई अखलाक न मरे.कुछ ऐसा करें जिससे  भयभीत परिवारों की जिन्दगी दुबारा पटरी पर लौट सके. मैं तो यही कहता हूं कि पुरस्कार लौटाने से क्या होगा साहित्यकारों, चलो दादरी जाकर पीड़ितों के आंसू पोछ कर आते हैं. आखिर अपुन का भी तो कुछ  फर्ज बनता है भाई....



सोमवार, 27 अप्रैल 2015

अनपढ़ नगरसेवक लिखेंगे नवी मुंबई की तकदीर


8 वीं से कम पढ़े हैं 31 नगरसेवक
7 नगरसेवकों को नहीं आती अंग्रेजी

सुधीर शर्मा
नवी मुंबई. सेटेलाइट सिटी नवी मुंबई में 23 अप्रैल को चुनकर आए 111 नगरसेवकों में से 50 फीसदी नगरसेवक 10वीं से कम पढ़े लिखे हैं. सूत्रों की मानें तो इन्हें इन्टरनेट एवं कम्प्यूटर चलाना भी नहीं आता ऐसे में आधुनिक बन रहे शहर में योजनाओं को लेकर ये कितना प्रभावी काम कर पाएंगे इस पर सवाल खड़े होने लगे हैं. बता दें कि  विजेता बने 31 नगरसेवक महज 8वीं से भी कम पढ़े लिखे हैं. एडीआर के आकलन के अनुसार जिन नगरसेवकों को जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना है उनमें से 40 प्रतिशत नगरसेवकों को ठीक से अंग्रेजी पढऩा-लिखना भी नहीं आता.
7 नगरसेवकों को पढऩे लिखने में मुश्किल
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 11 नगरसेवक केवल 5वीं तक पढ़े हैं, जबकि 7 नगरसेवक ऐसे हैं जो सामान्य तौर पर लिखने-पढऩे के अलावा कुछ भी नहीं जानते . 13 नगरसेवक महज 8 वीं पास हैं, वहीं 10वीं पास के नगरसेवकों की संख्या सबसे ज्यादा 25 है. 12 वीं पास नगरसेवकों की संंख्या 19 है जबकि  ग्रेजुएट के 16, पोस्ट ग्रेजुएट 6 एवं ग्रेजुएट प्रोफेशनल 4 को मिलाकर कुल 26 नगरसेवक उच्च शिक्षा प्राप्त हैं.  वहीं बेलापुर वार्ड नंबर 104 से राकां के टिकट पर चुने गए जयाजी नाथ अकेले डाक्टरेट नगरसेवक हैं. 3 नगरसेवकों ने अपने शिक्षण की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करायी है.
21 नगरसेवक 30 साल से कम 
कुल 105 नगरसेवकों पर किए गए आकलन के अनुसार 21 नगरसेवक 1 से 30 साल आयुवर्ग के अंदर के हैं. इनमें 7 नगरसेवक 25 आयु वर्ग से कम जबकि 14 नगरसेवक 25 से 30 साल के बीच के हैं. वहीं चुने गए नगरसेवकों में 31 से 40 आयुवर्ग के बीच के 26, वहीं 51 से 60 साल उम्र के 18 जबकि  61 से 70 वर्ष आयुवर्ग के एक नगरसेवक का समावेश है. सर्वाधिक 39 नगरसेवक युवा वर्ग यानी 41 से 50 आयु वर्ग के चुने गए हैं.जो महानगर पालिका में जनता के मुद्दों पर अपनी राय रखेंगे.बता दें कि यह आकलन 111 नगरसेवकों में से केवल 105 में किया गया था. बाकी 6 नगरसेवकों की उम्र आदि का परीक्षण इस आकलन में शामिल नहीं है. अपराधिक छवि वाले चुनकर आए 17 नगरसेवकों में से 2 के खिलाफ सामान्य जबकि 13 के खिलाफ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं. इनमें एनसीपी के 8,  शिवसेना के 3, वहीं भाजपा के 2 नगरसेवकों का नाम शामिल है.
62 नगरसेवक बनी महिलाएं 
नवी मुंबई महानगर पालिका चुनाव 2015 में इस बार 50 फीसदी यानी कुल 56 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं. इसके अलावा भी 6 सीटों पर महिलाओं ने शानदार जीत हासिल कर 111 वार्डों वाले मनपा में 62 के साथ पहले नंबर पर पहुंच गयी हैं. इनमें एनसीपी के 51 नगरसेवकों में से 32 महिलाएं, शिवसेना के 38 में 14 महिलाएं, कांग्रेस के 10 में से 9 महिलाएं जबकि भाजपा के 6 में से 3 महिलाएं एवं निर्दलीयों के 5 में से 4 महिलाएं भारी मतों से जीतने में सफल रही हैं. 

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

हत्या और अपहरणकर्ताओं के सहारे शहर का विकास


मनपा के 53 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले 
सुधीर शर्मा
नवी मुंबई,रा.सं. 22 अप्रैल को होने वाले मनपा के चुनावी महासंग्राम में 568 में से कुल 201 उम्मीदवार करोड़पति पाए गए हैं.वहीं 53 उम्मीदवार अपराधिक छवि वाले पाए गए हैं. इनमें से 13 के खिलाफ सामान्य जबकि 40 के खिलाफ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं. नामांकन के समय निर्वाचन विभाग को दिए गए प्रतिज्ञापत्र में खुद प्रत्याशियों ने अपने उपर दर्ज आपराधिक मामलों का खुलासा किया है. इनमें एनसीपी के 12, कांग्रेस के 11, शिवसेना के 7, वहीं भाजपा के 4 प्रत्याशियों के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास एवं अपहरण तथा सामाजिक सद्भाव बिगाडऩे के गंभीर मामले दाखिल हैं. हालांकि कई मामलों पर फैसला हो चुका है जबकि कई विचाराधीन हैं. ताज्जुब की बात है कि निर्वाचन विभाग सुधारों के तहत 3 से अधिक बच्चों वाले लोगों के चुनाव लडऩे की पाबंदी लगा चुका है, जबकि आपराधिक छवि वाले लोग आज भी खुलेआम चुनावों मे हिस्सा ले रहे हैं. रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि नए दौैर में वे लोग चुनाव में सबसे ज्यादा हिस्सा ले रहे हैं जो या तो अमीर हैं या दबंग अथवा आपराधिक छवि वाले हैं.बहरहाल लोकतंत्र की अदालत में जनता इन 40 फीसदी प्रत्याशियों के क्रिमीनल बैकग्राऊंड पर क्या फैसला लेती है देखना होगा.
201 मनपा उम्मीदवार करोड़पति
चुनाव लोकतंत्र की मजबूती का आधार हैं. हालांकि बढ़ते चुनावी खर्च, धन बल और बाहुबल का इस्तेमाल होने लगा है. सामान्य लोग इससे दूर हटते जा रहे हैं. ऐसे में राजनीति को कमाई का हथियार बनाने वाले प्रत्याशियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है.अधिकांश पैसे वाले लोग ही चुनाव में बतौर प्रत्याशी एक दूसरे से लड़ रहे हैं. बता दें कि 537 उम्मीदवारों में से कुल 37 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति हैं. निर्वाचन विभाग में जमा दस्तावेजों के अनुसार सबसे ज्यादा 59 करोड़पति उम्मीदवार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के हैं. इनकी औसतन संपत्ति 3.29 करोड़ की है. वहीं करोड़पति उम्मीदवारों की सूचि में शिवसेना के 38 के पास 4.20 करोड़, कांग्रेस के 27 के पास 4.21 करोड़, भाजपा के 24 के पास 3.51 करोड़ जबकि शेकाप के 33 में से 4 प्रत्याशियों की सकल संपत्ति करोड़ों के पार है. 172 निर्दलीयों में भी 48 प्रत्याशियों की संपत्ति 3 करोड़ के उपर है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्मस (एडीआर) एवं महाराष्ट्र इलेक्शन वॉच का यह आकलन नवी मुंबई के 568 में से 537 प्रत्याशियों के दस्तावेजों का विश्लेषण करने के पश्चात तैयार किया गया है.
संतोष शेट्टी नवी मुंबई के सबसे अमीर प्रत्याशी
आकलन रिपोर्ट के मुताबिक नेरुल प्रभाग 100 के कांग्रेस प्रत्याशी संतोष देवप्पा शेट्टी एवं उनकी पत्नी अनीता संतोष शेट्टी नवी मुंबई के सर्बाधिक अमीर उम्मीदवारों में शामिल हैं. संतोष शेट्टी के पास 110 करोड़ से अधिक की सकल संपत्ति है तो उनकी बीबी 110 करोड़ के साथ ही उनकी बराबरी में खड़ी हैं. इन दोंनों के पास कुल मिलाकर 220 करोड़ की संपत्ति है.  नेरुल के ही दीलीपराव तिड़के 63 करोड़ की सकल संपत्ति के साथ दूसरे नंबर पर हैं. वहीं 45.39 करोड़ के साथ शिवसेना के किशोर पाटकर चौथे नंबर पर और राकां की नेत्रा आशीष शिर्के 40 करोड़ की संपत्ति के साथ पांचवे नंबर पर हैं. आकलन के अनुसार कुल 37 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति प्रत्याशियों की सूचि में शामिल हैं. पार्टीनुसार 62 फीसदी शिवसेना में, 59 फीसदी राकां के जबकि 57 फीसदी बीजेपी के प्रत्याशी अमीर हैं.लायबिलिटीज के मामले में भी कांग्रेस के संतोष देवप्पा शेट्टी 8 करोड़ के साथ नंबर एक पर, भाजपा के रामचंद्र घरत 4 करोड़ के साथ दूसरे स्थान पर वहीं कांग्रेस की सुदर्शना अनिल कौशिक 2.92 करोड़ के साथ तीसरे स्थान पर हैं. प्रत्येक प्रत्याशी की औसतन संपत्ति तकरीबन 2.51 करोड़ है.

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

कांग्रेस का हाथ छोड़ शिवसेना के तीर धनुष के साथ

                                                               

नवी मुंबई के पाच नगरसेवको का शिवसेना में प्रवेश 
1) शिवराम पाटील ( राकांपा)
२) अनिता पाटील ( राकांपा)
३) विलास भोईर ( कांग्रेस)
४) रंगनाथ आवटी ( कांग्रेस)
५) रामाशेठ वाघमारे ( कांग्रेस)
६) अरविंद नाईक ( कांग्रेस - शिक्षण समिती सदस्य)
७) अंकुश सोनावणे ( कांग्रेस नगरसेविका पति )

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

नवभारत कार्यालय में ऐरोली के युवा विधायक श्री संदीपजी नाईक

ऐरोली के युवा विधायक  श्री संदीपजी नाईक ने 
मंगलवार को सुबह ठीक ११.०० बजे वादे  के मुताबिक नवभारत कार्यालय में सदिच्छा भेंट  दी.बतौर राजनीतिक प्रतिनिधि उनके स्वागत के बाद की तस्वीर।। बात-चीत में उनकी 
परिपक्वता ,जनता और समाज को समझने की परख, बदले हालात  में स्वयं की जिम्मेदारी का एहसास उनमे साफ़ नजर आया.नाईक परिवार में अलग छवि तैयार करते 
हुए जरुरत पड़ने पर प्रखर विरोध की 
मनसा भी दिखी।विजन और धैर्य दोनों साथ-साथ । काबिले तारीफ।।  


रविवार, 19 अक्टूबर 2014

ठाणे-रायगढ़ में चला मोदी का मैजिक


मंदा म्हात्रे ने बेलापुर में खिलाया कमल
ऐरोली से राकां के संदिप नाईक विजयी
सुधीर शर्मा

नवी मुंबई. लोकनेता गणेश नाईक का गढ़ कहलाने वाली नवी मुंबई की बेलापुर सीट राकां के हाथ से चली गयी जबकि ऐरोली सीट पर राकां का कब्जा बरकरार रहा. रविवार को आए चुनावी नतीजों के अनुसार भाजपा की मंदा म्हात्रे बेलापुर सीट से कमल खिलाने में कामयाब रहीं. मंदा को कुल 55316 मत मिले वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस के गणेश नाईक को 53,825 वोट प्राप्त हुए. 20वें राऊंड तक पीछे चल रही मंदा म्हात्रे 25वें चरण की गिनती में शिवसेना के विजय नाहटा और घड़ी को पीछे छोड़ते हुए राकां को 1491 मतों से हराने में सफल रहीं.जबकि आखिरी दौर तक राकां को कड़ी टक्कर दे रहे विजय नाहटा 50,983 वोट पाकर तीसरे नंबर पर चले गए.  हाथ के पंजे के साथ 15 साल बाद  चुनाव में उतरे नामदेव रामा भगत को कुल 16,604 वोट मिले जबकि मनसे के गजानन काले को सिर्फ 4193 वोटों से ही संतोष करना पड़ा. बहुजन समाज पार्टी के दीपक सावंत दलितों का वोट बटोरने में नाकाम रहे उन्हें केवल 2053 मत हासिल हुए. निर्दलीयों में प्रकल्पग्रस्तों की ओर से खड़े डॉ. राजेश पाटिल को सबसे ज्यादा 3722 वोट मिले. वहीं गौतम गायकवाड़ बेलापुर सीट से सबसे कम वोट पाने वाले कैंडिडेट रहे जिन्हें कुल 113 मत मिला. रविवार को वाशी सेक्टर 4 में स्थित सेक्रेट हार्ट हाईस्कूल प्रांगण में वोटों की गिनती सुबह 9 बजे से भारी पुलिस बंदोबस्त एवं सुरक्षा इंतजामों के बीच करायी गयी.यहां पुलिस आयुक्त के,एल प्रसाद सहित कई पुलिस उच्चाधिकारी गतिविधियों की स्वयं निगरानी में लगे थे. जीत के बाद अपनी प्रतिक्रिया में मंदाम्हात्रे ने राकां के गणेश नाईक को पराजित करने को बड़ी उपलब्धि माना और मोदी के मार्गदर्शन में विकास को आगे बढ़ाने का संकल्प दुहराया.

मोदी की लहर ने दिलाई विजय 
नवी मुंबई से भाजपा की मंदा म्हात्रे एवं पनवेल से प्रशांत ठाकुर की जीत को मोदी लहर का बड़ा असर माना जा रहा है. जानकारों की राय में सीधा प्रचार एवं ठाणे-मुंबई आदि ठिकानों पर हुई पीएम मोदी की सभा का असर ठाणे एवं रायगढ़ जिले के प्रत्याशियों का जनाधार बढ़ाने एवं जीत का इतिहास रचने में सबसे बड़ा जरिया बना.हालांकि विकास के मामले में देश में नंबर वन मानी जाने वाली नवी मुंबई महानगर पालिका के सलाहकार और राकां नेता गणेश नाईक को यहां से पराजय का मुंह देखना पड़ा है. 1999 में भी वे शिवसेना के सिताराम भोईर से पराजित हुए थे लेकिन इस बार उन्हें शिवसेना से नहीं बल्कि राकां छोड़कर भाजपा में आयी मंदाताई म्हात्रे से हारना पड़ा है.गणेश नाईक को नवी मुंबई के विकल्प के रुप में पहचाना जाता है, पिछले 25 सालों से लगातार उनके परिवार का राजनीतिक वर्चस्व बरकरार रहा है हालांकि उसमें दरार पडऩे लगी है. मई 2014 के लोकसभा चुनाव में संजीव नाईक की शिवसेना प्रत्याशी राजन विचारे के सामने हार तथा अब विधानसभा में पूर्व एमएलसी मंदाताई म्हात्रे के सामने पराजय राकां के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. जानकार मानते हैं कि किंग मेकर रहे गणेश नाईक के हारने से नवी मुंबई में दलगत विरोधियों की सक्रियता एवं मनपा में सत्ता के खिलाफ नये राजनीतिक समीकरण को बल दे सकता है जो उनके जनाधार के लिए खतरनाक बनेगा.
ऐरोली से संदिप नाईक दूसरी बार जीते
सतत संपर्क, विकास को प्राथमिकता एवं जन समस्याओं को लेकर सदैव आवाज बुलंद करने के कारण सबके चहेते रहे राकां प्रत्याशी संदिप नाईक ऐरोली से दूसरी बार विधायक बनने में सफल रहे. उन्होंने अपने पुराने प्रतिद्वंदी विजय चौगुले को 8725 मतों से हराकर शानदार जीत हासिल कर ली.2009 में भी उन्होंने शिवसेना को पराजित किया था. रविवार को संपन्न हुई मतगणना में संदिप नाईक को कुल 76,444 मत प्राप्त हुए वहीं शिवसेना के विजय चौगुले को कुल 67,719 वोट मिले. यहीं से भाजपा उम्मीदवार वैभव तुकाराम नाईक 46,405 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे. कांग्रेस के रमाकांत म्हात्रे को 8794 मत तथा मनसे के गजानन खबाले को 4111 वोट प्र्राप्त हुए. रिपाई के रिटेश भागे को सबसे कम 112 वोट जबकि निर्दलीयों में के.आर.गोपी को सर्वाधिक 907 वोट मिले. यहां अकेली महिला कैंडिडेट सुनीता मोहन तुपसौन्दर्या को 417 मत हासिल हुए.
विकास को देंगे नयी गति-संदिप
 जीत की घोषणा के बाद राकां विधायक संदिप नाईक ने कहा कि अपने पिता गणेश नाईक के मार्गदर्शन में विकास के विजन के साथ नवी मुंबई को बेहतरीन सेवा-सुविधाओं वाला आधुनिक शहर बनाने का अभियान हम आगे भी जारी रखेंगे. उन्होंने सभी नवी मुंबईकरों को बहुमत दिलाने पर आभार व्यक्त किया.
पनवेल में प्रशांत ठाकुर की शानदार जीत 
कांटे की टक्कर के बीच शेकाप उम्मीदवार बालाराम पाटिल को 13,224 मतों से हराते हुए भाजपा के प्रशांत ठाकुर पनवेल में कमल खिलाने में सफल रहे. 12 सिंतबर को टोलमाफी नहीं देने से नाराज प्रशांत ठाकुर ने विधायक पद से इस्तीफा देते हुए कांग्रेस से हाथ छुड़ा लिया था.और भाजपा के टिकट पर पनवेल से चुनाव लड़े थे. कांग्रेस खेमे को छोडऩे के बाद भाजपा उम्मीदवार के तौर पर उनकी जीत चुनौतियों से भरी थी हालांकि पनवेल में विकास को नया मुकाम दे चुके प्रशांत ठाकु र को जनता ने अपनाते हुए दो वे जीतने में सफल रहे. प्रशांत ठाकुर को कुल 1 लाख 24,817 वोट मिले जबकि शेकाप के बालाराम पाटिल को 1 लाख 11,647 मतों पर ही संतोष क रना पड़ा. शिवसेना के वासुदेव घरत 17,913 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे. कांग्रेस के आर.सी.घरत को 9263 मत प्राप्त हुए. 6566 वोटों के साथ मनसे प्रत्याशी केशरीनाथ पाटिल पांचवें नंबर पर रहे. यहां निर्दलीयों में सबसे कम वोट पाने वालों में महादेव पवार तथा सर्वाधिक मत पाने वाले बालूसेठ गजानन पाटिल रहे.
जनता का विश्वास कायम रखेंगे-प्रशांत
यह जीत जनता की है. विकास को समर्पित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सभी वर्गों को साथ लेकर पनवेल के सम्पूर्ण विकास के लिए काम करेंगे. जनता ने विजय दिलाकर जो विश्वास जताया है उसे हर संभव कायम रखेंगे.

उरण में शिवसेना के मनोहर भोईर जीते
नवी मुंबई में शिवसेना की दोनों सीटों पर हार से उलट शेकाप के  गढ़ उरण में शिवसेना के मनोहर भोईर ने कांग्रेस-बीजेपी को पीछे छोड़ते हुए जीत हासिल कर ली. यहां विधायक रहे शेकाप के विवेक पाटिल को 1349 मतों से हराकर मनोहर भोईर ने उरण में भगवा फहरा दिया.शिवसेना के भोईर को कुल 45,416 मत मिले जबकि शेकाप के विवेक पाटिल को 44,067 वोट प्राप्त हुए .कांग्रेस के महेन्द्र घरत यहां 28443 मतों के साथ तीसरे नंबर पर रहे. उरण में अन्य क्षेत्रों की बजाय मोदी मैजिक फेल रहा. यहां भाजपा के महेश बालदी को 27,152 वोट पाकर कांग्रेस से पीछे रहना पड़ा. वहीं मनसे के अतुल भगत को 2796, एनसीपी के प्रशांत पाटिल को 2691 एवं समाजवादी पार्टी के दीपक पाटिल को केवल 1474 वोटों पर ही सिमटने के कारण अपनी जमानत बचा पाने में भी नाकाम रहे.

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

नोट की लालच में लाखों ने डाला वोट

चुनाव में हर तरफ बोलता रहा पैसा 
symbolic photo from google
संविधान को सबसे ऊपर कहने वाले, देश की सेवा का ढोंग करने वाले ऐसे कितने ही अनगिन लोगों समाजसेवियों को इस बार के चुनाव ने बेईमान बना दिया। वोट के बदले नोट रोकने की तमाम फालतू कोशिशों के बीच नेताओं और प्रत्याशियों के समर्थकों ने  माई बाप मानकर खूब पैसा लुटाया।यह पैसा हारने पर हवा में गया लेकिन जीते तो हम जनता की कल्याणकारी योजनाओं से निकालेंगे ये उम्मीदवार जिनसे हमने प्यासे लेकर विकास की उम्मीद पाली है।  लोकतंत्र को लूटने में जो चोर लगे हैं हम उन्हें नेता कहते हैं ,जो लूट में हिस्सेदार बन रहे हैं उनमे जनता भी आ गयी है। तो हुए न चोर चोर मौसेरे भाई।फिर अब कोई लूट या घोटाला हो तो किसी नेता मंत्री को मत कोसना। …
गौर करें तो इस बार ठाणे एवं रायगढ़ दोनों ही जिलों में मतदान का प्रतिशत 2009 की अपेक्षा 5 से 6 फीसदी ज्यादा नजर आया. जानकारों की राय में वोटिंग परसेन्टेंज का बढऩे के पीछे गठबंधन की बजाय अलग चुनाव लडऩा, स्पर्धा में सबकी प्रतिष्ठा एवं वर्चस्व की लड़ाई का होना तथा सोसल मीडिया का इस्तेमाल के अलावा वोट के बदले जमकर नोट बांटना मुख्य कारण हैं.हालांंकि निर्वाचन विभाग एवं सुरक्षा एजेंसियां पारदर्शी एवं निष्पक्ष तथा शांतिपुर्ण चुनाव की सफलता पर अपनी पीठ थपथपा रहा है.
आंकड़ों के अनुसार 2009 के विधानसभा चुनाव में ठाणे में औसत 51.53 प्रश मतदान हुआ जिसमें इस बार 4 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है. वहीं नवी मुंबई की बेलापुर सीट पर पिछले साल 46.71 के बदले इस बार ४ प्रतिशत वृद्धि के साथ ५० फीसदी मतदान हुआ है. ऐरोली में में भी पिछले बार की तुलना में तरकरीबन 5 फीसदी अधिक मतदाताओं ने वोट डाला है.यहां इस बार 54 फीसदी मतदान दर्ज हुआ है. ग्रामीण इलाका होने के बावजूद उरण में वोटिंग के प्रति बढ़े रुझान के कारण 2009 में हुए 68.29 की तुलना में 4 प्रतिशत ज्यादा 72 फीसदी मतदान हुआ है.वहीं पनवेल में इस बार कुल 67 प्रतिशत वोटिंग हुई जो 2009 की 61.64 की तुलना में 6 फीसदी अधिक है.

बुधवार, 24 सितंबर 2014

गठबंधन टूटा तो कहां से लाएंगे प्रत्याशी


गठबंधन टूटा तो कहां से लाएंगे प्रत्याशी

नवी मुंबई. शिवसेना और बीजेपी में सीटों को लेकर चल रहे घमासान के बीच एक नया जिन्न पैदा हो गया है. यह विधान सभा के लिए योग्य उम्मीदवारों का वह जिन्न है. जो सवाल पूछने लगा है कि सीट बंटवारे पर मची तकरार के बाद अगर महायुति या आघाड़ी टूटती है तो राज्य की 288 सीटों के लिए योग्य और सक्षम उम्मीदवार कहां से आएंगे. उदाहरण के तौर पर नवी मुंबई की महज दो सीटों पर ही कांग्रेस और बीजेपी के पास योग्य प्रत्याशियों का अकाल है फिर अकेले चुनाव अखिर किसके दम पर लड़ा जााएगा. पड़ोस के पनवेल विधानसभा सीट का भी यही हाल है जहां विधायक प्रशांत ठाकुर के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के सामने नए उम्मीदवार की मुसीबत खड़ी हो गयी है. इस मामले में जहां महायुति में शिवसेना आगे है वहीं आघाड़ी में एनसीपी का पलड़ा भारी है. हालांकि गठबंधन तोड़कर अकेले लडऩे का हौसला दिखा रही कांग्रेस एवं भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां रेडीमेड कैंडिडेट में निठल्ली हैं. सच्चाई ये भी है कि नवी मुंबई के 89 वार्डो में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के पास किसी भी चुनाव में उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल सके हैं ऐसे मेंनॉमिनेशन प्रक्रिया के शेष बचे 3 दिनों के भीतर विधान सभा के लिए हर सीट के लिए योग्य प्रत्याशी कहां से मिलेंगे, यह बड़ा सवाल है.

 बीजेपी-कांग्रेस के पास उम्मीदवार नहीं
एनसीपी के कब्जे वाली नवी मुंबई की दो में से एक बेलापुर सीट पर पालकमंत्री गणेश नाईक एवं दूसरी ऐरोली सीट से उनके छोटे बेटे संदिप नाईक विधायक हैं. दोनों ही पिता-पुत्र अपनी पुरानी सीट से ही दुबारा चुनाव लडऩे वाले हैं. शिवसेना के पास ऐरोली से पिछली बार हारे विजय चौगुले एक बार फि र किस्मत आजमाने वाले हैं. लेकिन बीजेपी के  पास दोनों ही सीटों पर कोई सर्वमान्य प्रतिनिधि नहीं है.  बीजेपी 4 महीने पहले एनसीपी छोड़कर कमल थामने वाली मंदा म्हात्रे को बेलापुर से टिकट देने की तैयारी में है हालांकि भाजपा के पुराने व वरिष्ठ पदाधिकारी अडिय़ल एवं तानाशाही रवैए वाली मंदा को प्रत्याशी बनाने पर खुलेआम विरोध में आ गए हैं. यहीं से मारुती भोईर एवं सतिश निकम भी भावी प्रत्याशियों की लिस्ट में हैं. बीजेपी के पास ऐरोली के लिए एक भी चेहरा सामने नहीं है. शिवसेना के पास बेलापुर से बतौर प्रत्याशी कई चेहरे कतार में हैं जिनमें शिवसेना के उपनेता एवं रिटायर्ड आईएएस विजय नाहटा, उपजिला प्रमुख एड. मनोहर गायखे, नगरसेवक विट्ठल मोरे एवं युवा सेनाधिकारी वैभव नाईक प्रमुख हैं. कांग्रेस इस लिहाज से सबसे पिछडी पार्टी है.हालांकि पिछली बार निर्दलीय चुनाव लड़े नामदेव भगत और एनसीपी के साथ गठबंधन पर नाराजगी जता चुके वर्तमान जिलाध्यक्ष दशरथ भगत प्रत्याशियों की कतार में हैं.लेकिन ऐरोली में आज भी कांग्रेस के पास कोई सिंगल फेस उपलब्ध नहीं जिसे विधानसभा चुनाव में खड़ा किया जा सके. एनसीपी प्रत्याशियों के मामले में सबसे आगे और मजबूत स्थिति में है.
अधूरी कार्यकारिणी, कमजोर जनाधार
नवी मुंबई में शिवसेना की स्थानीय कार्यकारिणी सक्रिय और मजबूत है,जबकि बीजेपी कार्यकारिणी में चुनाव के दौरान तक अधिकांश पद योग्य पदाधिकारियों के अभाव में खाली पड़े हैं. ऐरोली में बीजेपी का विधानसभा अध्यक्ष या तालुका अध्यक्ष तक नहीं है.एनसीपी में पदाधिकारियों की भीड़ जरुर है परन्तु वहां कांग्रेस और शिवसेना जिलाप्रमुखों की तुलना में एनसीपी के जिलाध्यक्ष की पहचान जनता के बीच नदारद है. यहां एनसीपी की पहचान केवल गणेश नाईक एवं उनका राजनीतिक परिवार है. बहरहाल संगठनात्मक तौर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस अपेक्षित जनाधार मजबूत कर पाने में बिफल रही है. हालांकि  59 नगरसेवकों के साथ वह मनपा की सत्ता पर काबिज है. भाजपा के पास केवल 1 नगरसेवक है वहीं शिवसेना के पास 16 जबकि राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के 13 नगरसवेक हैं. शिवसेना को छोड़कर मुख्यत: कांग्रेस, बीजेपी, मनसे, सपा एवं रिपाई सहित सभी पार्टियों की कार्यकारिणी अधूरी है. जमीनी स्तर पर सक्रियता कम है और जनाधार बेहद कमजोर है.

गठबंधन के बावजूद बगावत की संभावना
 नवी मुंबई की दो सीटों पर चुनावी संघर्ष से पहले ही गठबंधन होने की दशा में बगावत की बू आने लगी है. कांग्रेस खुले तौर पर अपने वर्षों के सहयोगी एनसीपी के खिलाफ नारा बुलंद करन ेलगी है. कांग्रेस के जिलाध्यक्ष दशरथ भगत हो या उपाध्यक्ष संतोष शेट्टी साफ कहने लगे हैं कि गणेश नाईक के समर्थन में काम नहीं करना है. गठबंधन की सूरत में उनका कहना है कि कांग्रेस विरोधियों को समर्थन करेगी. जाहिर है ऐसा कहने का मतलब है शिवसेना को जिताने की कोशिश. सहयोगी पार्टी कांग्रेस की इस भूमिका पर एनसीपी नेता एवं पालकमंत्री गणेश नाईक का कहना था कि विकास के दम पर एनसीपी चुनाव में जनता के सामने जाने वाली है कांग्रेस का सपोर्ट मिले न  मिले हमें जनता का भरपुर सहयोग मिलेगा. गणेश नाईक ने दुाराया कि नवी मुंबई को अत्याधुनिक शहर बनाने, जनता के विकास एवं कल्याण के लिए हम प्रतिबद्ध हैं जनता ने पहले भी प्यार दिया है आगे भी प्यार देकर विजय दिलाएगी. हालांकि बावजूद इसके सीटों पर माथापच्ची के बाद अगर शिवसेना-बीजेपी अथवा एसीपी कांग्रेस में गठबंधन हो भी जाता है तो दलगत बगावत की संभावना ज्यादा है. पिछली बार की तरह गठबंधन के लोग ही निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए अपने सहयोगी पार्टी का वोट काट सकते हैं. 2009 में कांग्रेस नवी मुंबई की एक सीट मांग रही थी नहीं मिला तो कांग्रेस ने तत्कालीन जिलाध्यक्ष नामदेव भगत को बेलापुर से जबकि वसंत म्हात्रे को ऐरोली से निर्दलीय चुनाव लडवाया, लेकिन मुंह की खायी. गठबंधन के तहत ही जनाधार का अभाव होते हुए भी बीजेपी को नवी मुंबई की एक सीट बेलापुर से चुनाव लडऩे का मौका मिला ,लेकिन वह भी हार गयी. कांग्रेस इस बार भी यही चाहती है कि एनसीपी से उसे एक सीट मिल जाए वर्ना गठबंधन न रहे.लेकिन सवाल ये है कि जब उसे नगरसेवक के लिए प्रत्याशी नहीं मिलते हैं तब  वह विधान सभा सीट के  लिए जीतने वाला सर्वमान्य प्रत्याशी कहां से लाएगी. या पिछली बार 2009 की तरह ही कांग्रेस हार का वही फिर फार्मूला दुहराएगी..
गठबंधन पर देरी : दलबदल से बचने की नौटंकी 
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गठबंधन पर फैसले में देरी पार्टियों की सोची समझी राजनीतिक नौटंकी है. सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस एनसीपी दोनों ने अकेले लडऩे का फैसला कर लिया है लेकिन वे अपने दलगत विरोधियों को यह मौका नहीं देना चाहती कि वे टिकट पाने किसी दूसरी पार्टी में जा सके. नॉमिनेशन में महज 3 दिन बचे हैं जबकि प्रत्याशियों की घोषणा तक नहीं होना इसका ज्वलंत सबूत है. जीत की बजाय इन चारों पार्टियों के बीच सीट की लड़ाई बनकर रह गयी है जो खतरनाक है. शिवसेना बीजेपी को 130 की मांग पर 119 से ज्यादा नहीं देना चाह रही वहीं कांग्रेस भी 135 की मांग पर राकां को 124 से अधिक नही देने पर अड़ी है. 27 सितंबर को नॉमिनेशन की आखिरी तारीख है. गठबंधन नहीं होने की दशा में अगर कुछ लोग विरोध या बगावत कर टिकट के लिए दलबदल करते भी हैं तो भी उन्हें नॉमिनेशन खत्म होने के कारण चुनाव लडऩे का मौका नहीं मिल सकेगा. इस नौटंकी में छोटी पार्टियां स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं जो गठबंधन का हिस्सा हैं.

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

हिम्मत न हार, चल हो जा तैयार

हिम्मत न हार, चल हो जा तैयार 

चिन्ता न कर अपने मान-सम्मान का
चिन्ता न कर प्यारे भूत-वर्तमान का

बढ़ते चलो आगे , बोल जयकार...१
हिम्मत न हार,चल हो जा तैयार....

चिन्ता से मिलता न कोई समाधान है,
वन्दे फिर इतना क्यूं सोंच परेशान है

साहस की नौका, कराए बेड़ापार...2
हिम्मत न हार,चल हो जा तैयार.....

टाइम ही टीचर है संकट में शिक्षा ले,
अपने-परायों के  प्यार की परीक्षा ले

है जीवन संघर्ष, लड़ो भरके हुंकार ....3
हिम्मत न हार, चल हो जा तैयार....

स्वारथ की दुनिया,न दूजों की आस कर
अपने जमीर, हौसलों पे विश्वास कर

तकदीर तेरी भी बदलेगी यार...4
हिम्मत न हार, चल हो जा तैयार....                        

                          -सुधीर शर्मा

               

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

गांव-देश : बीजेपी में बेलापुर के लिए घमासान

गांव-देश : बीजेपी में बेलापुर के लिए घमासान: मंदा म्हात्रे को लेकर  विरोध /  कार्यकर्ता चाहते हैं अन्य उम्मीदवार नवी मुंबई,  लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली बीजेपी न...

बीजेपी में बेलापुर के लिए घमासान


मंदा म्हात्रे को लेकर  विरोधकार्यकर्ता चाहते हैं अन्य उम्मीदवार

नवी मुंबई,  लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली बीजेपी नवी मुंबई में विधान सभा चुनाव 2014 से पहले ही दो गुटों में बंट गयी है. खबर है कि राकां से बीजेपी का दामन थामने वाली मंदा म्हात्रे को बेलापुर से टिकट दिए जाने की संभावना है. हालांकि पुराने पदाधिकारी नहीं चाहते कि 2 महीने पहले पार्टी में आयी मंदा को टिकट दिया जाय. बताया जा रहा है कि वाशी के सत्रा प्लाजा में स्थित दीप भानुसाली के कार्यालय में  एक गुप्त बैठक मंदा को रोकने के लिए बुलाई गयी थी जिसमें प्रदेश सचिव वर्षा भोषले,सतीश निकम,मारुती भोईर सहित  कई स्थानीय पदाधिकारी एवं वरिष्ठ कार्यकर्ता मौजूद थे. कल्याण में इच्छुक प्रत्याशियों का जायजा लेने आए पर्यवेक्षक विपुल मेहता के सामने भी बेलापुर के लिए मंदाताई का विरोध साफ नजर आया, जब सतिश निकम के समर्थक उन्हें मंदा से बेहतर उम्मीदवार बताते नजर आए. बता दें कि नवी मुंबई बीजेपी के अधिकांश पदाधिकारी अपनी उपेक्षा एवं 15 सालों तक एनसीपी में टिकट के लिए तरसती रही मंदा म्हात्रे को बीजेपी में तत्काल टिकट दिए जाने के खिलाफ हैं.
विधान सभा टिकट के लिए मची होड़ 
फिलहाल 5 लाख की आबादी एवं 3.50 लाख मतदाताओं वाले बेलापुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की ओर से कुल 4 लोग स्वयं को भावी प्रत्याशी मान रहे हैं. इनमें प्रदेश सचिव प्रो. वर्षा भोसले, पूर्व उपाध्यक्ष मारुती भोईर, आरएसएस से आए सतिश निकम और हाल ही में राकां से आयी मंदा म्हात्रे प्रमुख हैं. हालांकि प्रांत कार्यालय से किसी के भी नाम की घोषणा नहीं होने के कारण वे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की होड़ में लगे हैं. सूत्रों की मानें तो इन्होंने अपने-अपने समर्थक भी तैयार किए गए हैं जो इनकी वकालत कर सकें. गौरतलब है कि एक गुट जहां राकां से भाजपा में आयी मंदा म्हात्रे के साथ है तो वहीं दूसरा गुट संघ कार्यकर्ता रहे सतिश निकम को अपना समर्थन दे रहा है.इनके निकम फ़िलहाल संघ से बहार हैं लेकिन पिछली पहचान के लोग उनके समर्थन में खड़े हैं. इनके अलावा एक तीसरा गुट भी सामने आया है जो बीजेपी की प्रदेश सचिव वर्षा भोसले के नेतृत्व में अपने लिए चुनाव की नयी जमीन तैयार कर रहा है.योन कहें तो जितने के दौर में एक बार फिर बीजेपी को अंतर्कलह का रोग लग गया है. गैर मराठी सीवी रेड्डी को जिलाध्यक्ष बनाए जाने के बाद से यह गुटबाजी और भी गहरा गयी है.
तो बीजेपी का जीतना होगा मुश्किल
2009 में बेलापुर से बिल्डर सुरेश हावरे चुनाव लड़े थे लेकिन गणेश नाईक से 12 हजार मतों से पराजित रहे. 2014 में प्रत्याशी किसे बनाया जाय, ऐसा कोई प्रभावी एवं सक्षम चेहरा नहीं दिख रहा जिस पर आम सहमति हो. ऐसे में चुनाव से पहले ही नवी मुंबई भाजपा का भविष्य खतरे में पड़ गया है. गौर करें तो गणेश नाईक के खिलाफ एन्टी इनकम्बैंसी होने के बावजूद नवी मुंबई में पालकमंत्री का तगड़ा वर्चस्व है. उनके खिलाफ बीजेपी की ओर से मंदा म्हात्रे के आने से मुकाबला भले ही रोमांचक हो लेकिन उसमें जीत की गुंजाईश कम ही दिखती है.  शिवसेना के आंतरिक सूत्र बताते हैं कि अधिकांश कार्यकर्ता मंदा म्हात्रे के लिए काम नहीं करना चाहते,वहीं खुद बीजेपी के अंदरखाने चल रही गुटबाजी भी उनके लिए दूसरी बड़ी चुनौती है. ऐसे में यदि मंदाताई चुनाव लड़ती हैं तो पार्टी का अंर्तकलह एवं शिवसेना की उदासीनता का फायदा सीधे तौर पर राकां के गणेश नाईक को जीत दिलाने में मददगार साबित हो सकता है.

गुरुवार, 15 मई 2014

मनी के लिए मेहनत करते मासूम


chhotu

एक गाना याद आता है नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है,जवाब है, मुट्ठी में है तकदीर तुम्हारी..इस गाने से उलट शहर के गली-मुहल्लों में कचरा चुनते और भीख मांगते कुछ बच्चों को देखकर सवाल उठता है कि अगर मुट्टी में तकदीर है तो फिर देश के इन नौनिहालों को खेलने की उम्र में जीने के लिए यूं मशक्कत क्यों करनी पड़ रही...नेरुल का मोनू, सानपाड़ा की रोशनी और वाशी सिग्नल का छोटू, सब बेहाल हैं. ये वो मासूम हैं जिनके नाम भले अलग हैं लेकिन हालात एक जैसे. पुर्व प्रधानमंत्री चाचा नेहरू बच्चों को देश का भविष्य मानते थे. लेकिन आज इस देश में छोटू व मोनू जैसे न जाने कितने ही नौनिहाल हैं जो घर की गरीबी, पेट की भूख और बेबशी के लिए अपने भविष्य को बेचने के लिए मजबूर हैं. देश के कानून और कल्याण योजनाओं से अछूते. अपनी मजबूरी में, मुफलिसी में, बेबस मां-बाप और परिवार के साथ. ये दिन रात
मेहनत करते हैं ताकि अंधेर रातों में घर का चूल्हा जल सके.
         पढ़ लिया तो धंधे पर जाओ
 अब जरा इस छोटू से मिल लिजिए. 13 साल का छोटू नेरूल के  मनपा स्कूल में पढ़ाई करता है, दूसरे बच्चों की तरह खेल-कूद, मौज-मस्ती उसे भी पसंद है लेकिन आर्थिक तंगी में कई भाई-बहनों की परवरिश कर रहे पिता शरीफ के लिए वह छोटे हाथ वाला मदद का मसीहा है. स्कू ल से लौटने पर बस्ता रखने के बाद संध्या पाली को घर लौटने वाले छात्रों के लिए स्कूल के पास कैन्डी बेचना उसका रोज का धंधा है. छोटू रुआंसा हो बतलाता है कि स्कूल से आने के बाद उसका बाप कहता है पढ़ के आ गया अब धंधे पे निकल जा...खेलने की चाहत और न जाने की मनसा के बावजूद भी परिजनों की परवरिश कर रहे बाप का फरमान मानकर निकलना उसकी मजबूरी है. भाड़े की खोली में मां-बाप का बनाया कैन्डी का पैकेट लिए  वह कभी नेरूल, शिरवणे तो कभी वाशी या सानपाड़ा के स्कूल-उद्यानों और गली-मुहल्लों की खाक छानता है.
रोशनी                               
     रोटी के लिए मेहनत जरुरी है
 जमीन से 15 फूट उपर पतली रस्सी पर एक पांव पर झूलती हुई रोशनी किसी स्कूल में नहीं जाती लेकिन लोहे की रिंग और रस्सियों पर सर्कस का खेल दिखाकर अपने परिवार के लिए रोज सौ-दो सौ कमा लेती है. स्कूल क्यों नहीं जाती, इस सवाल पर वो खामोश हो जाती है लेकिन उसका बाप भगीरथ बोलता है- साब गरीब हैं, काम नहीं करेंगे तो घर कैसे चलेगा. जीने के लिए पैसे नहीं फिर बच्चे कैसे पढ़ाएं.  6 साल के मोनू की कहानी भी इससे जुदा नहीं. मोनू इलाहाबाद के संगम तट पर प्लास्टिक के  डिब्बे बेचते हुए मिला था. उसे पाठशाला का नहीं पता. ठीक से अपना नाम भी नहीं बोल पाता लेकिन यहां गंगा घाट पर पाप धोने आने वालों से कहता है-डिब्बा ले लो भाई, गंगा जल भर लेना. महीनों तक चले आस्था के महामेले में वह भीख नहीं मांगा  बल्कि मनी के लिए मेहनत करता रहा. हालांकि उससे अलग शहर की सड़कों पर ऐसे कितने ही मोनू रोज दिखते हैं जो हथेलियों पर 1-2 रूपए पाने भीख मांगते हैं,आने-जाने वाली गाडिय़ों का शीशा पोछते हैं. भूखे पेट को भरने के लिए मदद  की याचना करते हैं. नंगे बदन , फटे-फुटे चिथड़े में..ये आने वाले भारत के भविष्य हैं.....

आधा दिन: पूरे घर की कमाई
Kishan-Vishal-Rajesh
इन तीन और स्कूली बच्चों को भी देख लीजिये। ये हैं राजेश, किशन और विशाल। तीनों महानगर पालिका विद्यालय में पढ़ते हैं. स्कूल से निकलने के बाद घर आते-आते 12- से एक बज  जाते हैं.  आधे दिन के  बाद  इनकी जिन्दगी की असली जद्दोजहद शुरू होती है.  दोपहर बाद एपीएमसी मार्केट में आते हैं. बड़े व्यापारियों के यहाँ से सस्ती सब्जियां और फल चुनते हैं. एक साथ बजार के सामने दुकान लगाते  हैं. माल बिका तो 100 से 200 रूपए कमा लेते हैं.  स्कूल ड्रेस में धंधे का रोज यही वसूल चलता है. ये भी भीख नहीं मांगते , मेहनत करते हैं। आधे दिन में पूरे परिवार की कमाई का जरिया है, इनका कारोबार। सस्ता और बच्चा समझकर लोग फल सब्जियां खरीद लेते हैं. जिस पर परिवार की गाड़ी चलती है। नौनिहालों की यह  कहानी देश की  आजादी के ६५ साल बाद की है. बहरहाल रोशनी का सर्कस बड़े-बच्चों को खूब लुभाता है, छोटू की कैंडी सबको पसंद आती है, लेकिन इनके मेहनत के  पीछे  आधी सदी की आजादी का दिवालियापन, दिन-दिन भर भटकने का दर्द, मौज-मनोरंजन की बजाय मुफलिसी  और मजबूरी भी साफ झलकती है. कभी नजदीक से मनी के लिए मेहनत करते इन मासूमों से रुबरू होकर आप भी अंदाजा लगाइयेगा, तब शायद आपको भी हिन्दुस्तान की 67 सालों की स्वाधीनता पर कोफ्त आ जाए.




बुधवार, 7 मई 2014

कुमार बाबू कविता सुनाओ न



जीत हार के घनचक्कर में फंसे और अमेठी से किस्मत आजमा रहे कुमार विश्वास का दिमाग डग्गम डग्ग हो रहा है. पहले राहुल आए थे तो अमेठीकरों को रिश्तों की कसमें खिला कर गए थे ,अभी वो भूला भी नहीं था कि नमो ने अपने जादुई भाषण का ऐसा पलीता लगाया कि अब अमेठीवासियों को केवल नमो नमो दिखता है. जैसे कभी कृष्ण के मथुरा से लौटने के बाद भी गोपियों को केवल हर जगह कृष्ण नजर आते थे वैसे ही अमेठी में जन-जन की जुबान पर मोदी छा गए हैं. कभी राहुल को भैया कहने वाले अमेठी के नौजवान भी अब नमो मंत्र जपने लगे हैं. क्या टीवी क्या अखबार क्या रेडियो हर तरफ मोदी के भाषणों की धूम है, चर्चा है, विश्लेषण चल रहा है. समझ नहीं आ रहा है कि अमेठी से मोदी लड़ रहे हैं या भाजपा की स्मृति इरानी. दांव पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की इज्जत लगी है. क्योंकि खोने को उन्हीं के  पास सबसे ज्यादा है. स्मृति इरानी तो यहां बाहर से गयी हैं. स्थानीय कांग्रेसी उन्हें आयातित और पैराशूट प्रत्याशी कहते हैं. चारो और राहुल और स्मृति इरानी के मुकाबले की चर्चा है. ऐसे में त्रिकोणीय मुकाबले के बीच रहे आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास अचानक सूर्खियों से आऊट हो गए हैं. उनकी चिंता बढऩा लाजमी है. वे कोश रहे हैं अरविंद केजरीवाल को जिन्होंने बिना सोचे समझे मीडिया से दुश्मनी मोल ले ली. उस मीडिया से जिसने अपने पेट की कमाई को दांव पर लगाकर बिना कुछ लिए ही केजरी को बड़ा बनाया. लेकिन जैसे ही कुछ पावर आया केजरीवाल उन्हें ही जेल में डालने की योजना बनाने लगे. खैर केजरीवाल की उस नादानी का नुकसान कर्मठ  कुमार विश्वास को भोगना पड़ेगा, ऐसा किसी ने सोचा तक नहीं था वो भी ऐसे दौर में जब जनता के बीच अपनी बात पहुंचाने के लिए मीडिया ही एकमात्र माध्यम हो. बहरहाल कुमार विश्वास केजरीवाल से खफा हैं. चिंता इस बात की भी है कि अमेठी में उनका शुरुआती दौर जिस जोश में चला वह 7 मई आते आते धारशाई हो गया. चिंता इस बात की भी है कि आखिर राहुल के अरमानों पर आखिरी दौर में पानी फेर गए और मतदाताओं को भाजपा को वोट देने के लिए जगा गए मोदी ने उनका भी खेल बिगाड़ दिया. जीत हार की इस उहापोह में कुमार का विश्वास डगमगाना लाजमी है. आखिर कौन ऐसा नहीं होगा कि अपनी इज्जत दांव पर हो और न चिंता करे. बुधवार 7 मई को उन्होंने आनन फानन में भगवान देवी देवताओं को मनाया, शीश झुकाए, पांव पड़े , मन्नत मानी की जीत जाएं. पोलिंग बूथ पर आए खुद के लिए जिन्दगी में पहली बार वोट डाला. खुद की जीत के लिए दुआ मांगी. जैसे ही बाहर निकले एक आम आदमी यानी समर्थक ने फरमाइश कर डाली. भैया जी कविता सुनाओ न? अब उस समर्थक को क्या पता कि जब इंसान चिंता में हो तो कविता नहीं खीझ निकलती है. और बात जब विरोधियों के जीतने की हो तो गुस्सा आता है. भैया ऐसे में कोई कविता सुनाने की फरमाईश करे तो गाली आती है. लेकि न क्या करे समर्थक को लगा कि कवि,लेखक किसी और दुनिया के लोग होते हैं जो दुख में हंसते हैं. शायद उसे कविता की परिभाषा मालूम होगी.वियोगी होगा पहला कवि आह से निकला होगा गान...समर्थक कविता कहने की फरमाईश कर रहा था. जैसे ही आम आदमी ने कुमार को कविता सुनाने की गुजारिश की विश्वास भड़क गए. भूल गए ऐसे ही आम लोगों ने उन्हें नेता बनाया और अमेठी में जिताने के लिए जीतोड़ मेहनत की. लेकिन कुमार ने उलटा समझा. अपने नाम की तरह. नाम विश्वास कुमार होता तो शायद सीधा समझ जाते लेकिन भावनाओं की कद्र किए बिना ही समर्थक का विश्वास तोड़कर कुमार आगे बढ़ गए..शायद उनके दिमाग में राहुल और मोदी के साथ समर्थक एक नई चिंता बनकर समा गया था.